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चालीसवां(चेहल्लुम) की फातेहा के खाने का असली हक़दार कौन?

चालीसवां(चेहल्लुम) की फातेहा का खाना किन लोगों के लिए?

इस्लामी अक़ीदा हैं की बदन से आज़ाद होने के बाद भी रूह ज़िंदा रहती हैं अज़ाब व सवाब की सजा और जज़ा उसी को भुगतनी होती हैं नेक लोगो की रूहें जन्नत की हक़दार होती हैं तो दूसरी तरफ गुनाहगारो की रूहें सज़ायें झेलती हैं।

इस्लामी अक़ीदा हैं की अगर किसी नेक काम का सवाब मरने वाले की रूह को पहुँचाया जाये तो वह ज़रूर पहुचंता हैं। अल्लाह तआला उसकी बरकत से मुर्दे का मर्तबा बुलंद करता हैं और उसकी सज़ा में भी कमी फ़रमा देता हैं और दरियाए रहमत जोश में आ जाये तो बख्श भी देता हैं। इसी अक़ीदे के तहत हम मुसलमानो में क़ुरआन ख्वानी, फातेहा, मीलाद वगैरह का दस्तूर कायम हुआ। यही रस्में बदलते बदलते अब दसवां, बिसवां, चालीसवां के नाम से मशहूर हो गयी। बेशक ऐसे खानो का सवाब भी मुर्दो को पहुँचता हैं। जब तक वह सवाब की नियत से हक़दारो को खिलाया जाये। समाज के डर से या खानदान का नाम ख़राब न हो इस वजह से ऐसे खिलाना पिलाना गलत हैं। उससे न तो कोई सवाब मिलता हैं और न ही मुर्दे तक पहुंचता हैं। बिरादरी या रिश्तेदारों को चेहल्लुम का खाना खिलाना किसी भी ऐतबार से मुनासिब नहीं। हम इसे नाजाइज़ नहीं कह सकते लेकिन जो इस फातेहा के खाने के असली हक़दार हैं बेहतर हैं उन्ही को खाना खिलाया जाये।

इसाले सवाब के हिसाब से दसवां, बिसवां, चालीसवां का खाना सिर्फ गरीबो और मिस्कीनों के लिए ही हैं अगर मालदार खाते हैं तो यकीनन वह गरीबो का हक़ खाते हैं। मौजूदा दौर में चालीसवें का जो अंदाज़ हैं वह किसी भी ऐतबार से फायदेमंद नहीं बल्कि नुकसान देह हैं। आजकल देखा जाता हैं की गरीब को न बुलाकर मालदार रिश्तेदारों को चालीसवें का न्योता भेजा जाता हैं। ज़्यादातर लोग ऐसे मौकों पर गरीबो को अनदेखा कर देते हैं।  तमाम रिश्तेदार लोग इस तरह भर कर आते हैं जैसे किसी शादी में आये हों। खाना अच्छा लगा तो तारीफ कर देते हैं नहीं लगा तो घर जाकर बोलते हैं सही नहीं बनाया और तरह तरह की बेमतलब की बातें करते हैं। जिसका कोई मतलब नहीं। ऐसे रिश्तेदार व लोग इकठ्ठा होकर एक दूसरी की ग़ीबत में लग जाते हैं। ऐसे लोगों को बुलाना बेमतलब हैं।

दूसरी तरफ कई घरो में ऐसा होता हैं बाप अकेला कमाने वाले होता हैं और बच्चो के पास इतना पैसा नहीं होता की इतना बड़ा खाना कर सके फिर होता यूँ हैं की दसवां, बिसवां, चालीसवां के खाने के लिए बाप की बचाई रकम या कोई ज़मीन बेच कर खाने का इंतेज़ाम करते हैं क्यूंकि ज़्यादातर लोग कम आमदनी होने या पैसा न होने की वजह से एक दूसरे पर खाने का खर्च ढोल देते हैं। जिससे आपस में भाईओं के रिश्तों में कड़वाहट आ जाती हैं। भाई भाई आपस में ऐसे मौकों पर ज़मीन जायदाद के लिए लड़ जाते हैं। इससे बेहतर हैं आप कम लोगो गरीब और मिस्कीन को बुलाकर जितना आपकी हैसियत हो उस हिसाब से खाना खाना खिला दें। रूह को अज़ाब से बचाने या कम करने के लिए क़ुरान ख्वानी कर दें। गरीबों को पहनने का कपडा दे दें। यह बेहतर तरीका हैं इसाले सवाब करने का। जब भी आपके पास पैसा हो जितना हों आप यह काम उतने पैसो के हिसाब से कर दें।

कुछ बिरादरियों में दस्तूर हैं की चालीसवें के खाने के बाद सब घर वाले रिश्तेदार वगैरह जमा होते हैं और जिस तरह शादी के मौके पर घर वालों को रिश्तेदार अपने अपने रिश्ते के हिसाब से कपड़े पहनाते हैं उसी तरह चालीसवें के खाने के बाद पहनाते हैं अफ़सोस हैं की ऐसी ऐसी गलत और गैर इस्लामी हरकतें हाजियों और नमाज़ियों के सामने होती हैं लेकिन कोई टोकता नहीं।

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने हज्जतुल विदा के मौके पर मैदाने अरफ़ात में अपने ख़ुत्बे के दौरान फ़रमाया था की मैं सारी गैर इस्लामी रस्मों को अपने पैरों से कुचल रहा हूँ। अल्लाह ने तुम्हारे लिए इस्लाम पसंद फ़रमा लिया हैं। लेकिन आजकल कुछ जाहिल लोगों ने अवाम को जहालत की ऐसी ही गैर इस्लामी रस्मों में इतना उलझा दिया हैं की लोग उन रस्मों को ही इस्लाम समझते हैं। कुछ आलिम लोग इस तरह बताते हैं की इतना नज़राना दो इस तरह यह करो इससे यह होगा उससे वह होगा जिससे आदमी उनकी बातों में आ जाता हैं और गैर इस्लामी रस्मों को अपना लेता हैं।

अल्लाह तआला हमें इस्लाम पर अमल करने की तौफीक दे आमीन 

या लतिफु की फ़ज़ीलत (ya latifu ki fazilat)

या लतिफु की फ़ज़ीलत (ya latifu ki fazilat)

"या लतिफु " यह वह इस्मे पाक हैं जिसके फायदे और बरकते बेपनाह हैं। एक हदीस हैं की एक मर्तबा एक बुज़ुर्ग बड़े परेशान और बदहाल थे। एक अजीब सा खौफ उनके दिमाग पर छाया हुआ था। उनके दिल में हर वक़्त एक खौफ सा रहता था। जिसकी वजह से उन्हें कभी आराम नहीं मिलता। उन बुज़ुर्ग ने एक दिन सोचा की हर दर्द की दवा हैं मुहम्मद के शहर में है तो फिर क्यों न मक्का मुअज़्ज़मा का सफर किया जाये। इससे हज का फ़र्ज़ भी अदा हो जायेगा और दरबारे रसूले पाक में हाज़री भी हो जाएगी और अपने मर्ज़ का इलाज भी हो जायेगा। लेकिन फिर वह सोचने लगे आखिर सफर करें तो कैसे? न सफर के खर्चे के लिए कोई पैसा है और न ही इतना खाने पीने का सामान जो पुरे सफर में चल जाये। लेकिन वह (बुज़ुर्ग) किसी भी हाल में वहां (मक्का मुअज़्ज़मा) जाना चाहते थे। उन्हें बस एक धुन सवार थी की मक्का मुअज़्ज़मा का सफर करना हैं। फिर क्या था उन्होंने खुदा का नाम लिया और चल पड़े मक्का मुअज़्ज़मा के सफर के लिए यह भी नहीं सोचा के आगे उनके साथ क्या होगा। कैसे बिना पैसे और खाने के सफर होगा।

सफर शुरू होते ही पहले दिन उन्होंने काफी गर्मजोशी से सफर किया, लेकिन दूसरे दिन भूक प्यास से उनकी हालत ख़राब हो गयी। फिर सफर के चौथे दिन तो हाथ पैरों ने पूरी तरह से जवाब दे दिया। उन्हें महसूस हुआ की अब वह अब कुछ ही देर के मेहमान हैं। फिर उन्होंने काबा शरीफ की तरफ रुख किया और बैठ गए और सोचा की अगर मर भी गया तो मुँह तो काबा शरीफ की तरफ रहेगा। इतने में उन्हें कमज़ोरी से नींद आ गयी। सपने में आपने (उस बुज़ुर्ग) ने देखा की एक नूरानी चेहरे वाले बुज़ुर्ग आपके करीब आये जिन्होंने अपना नाम खिज्र बताया और उन्होंने आपसे मुसाफहा किया और बशारत दी की तुम बहुत जल्द मक्का मुअज़्ज़मा पहुँच जाओगे और तुम्हारी जो भी ख़्वाहिशें है वो भी पूरी होगी। बस तुम मेरी बताई एक दुआ को दिल से तीन मर्तबा पढ़ लो। यह दुआ मेरी जानिब से तुम्हारे लिए एक तोहफा हैं। जब भी तुम्हें कोई मुश्किल पेश आये तुम इसे तीन मर्तबा पढ़ लेना। इंशाल्लाह तुम्हारी हर मुश्किल आसान हो जाएगी। दुआ इस तरह हैं या लतीफ़म बिखलकेहि या अलिमन या ख़बीर" इस तरह आपने नींद में ही हज़रते खिज्र अलैहिस्सलाम  के साथ यह दुआ दुहराई और उसके फ़ौरन बाद किसी शख्स ने आपको नींद से जगा दिया वह शख्स ऊंट पर सवार था और हज के लिए जा रहा था। एक दूसरे की हालत जानने के बाद उस शख्स ने बुज़ुर्ग शख्स को अपने साथ ले लिया। खाने पीने के सामान के अलावा आपको ऊंट की सवारी भी मिल गयी। इस तरह वह बुज़ुर्ग मक्का मुअज़्ज़मा पहुँच गए।

मक्का में पहुंचते ही कोई शख्स आया और उसने रूपए से भरी थैली आपको दी और फ़रमाया की मेरी तरफ से घर वापसी के लिए आप यह रख लीजिये गोया आपकी वापसी के लिए खुदा ने इंतज़ाम फरमा दिया था। उसके बाद बुज़ुर्ग आदमी मदीना मुनव्वरा तशरीफ़ ले गए। रौज़ए रसूले पाक की ज़ियारत की और अपने हर मर्ज़ के इलाज की दुआ के साथ वापिस घर वापिस आ गए। कुछ दिन के बाद आपकी जितनी भी परेशानियां थी वह दूर हो गयी। सुभानअल्लाह।

एक और किस्सा सुनिए ! सैरुल आरिफ़िन में हज़रत शेख औहदुद्दीन किरमानी रहमतुल्लाह अलैहि ने भी एक रिवायत में फ़रमाया हैं की एक दिन वह हज़रत शेख जलालुद्दीन तबरेज़ी रहमतुल्लाह अलैहि के हमराह काबा शरीफ के ज़ियारत के लिए जा रहे थे। साथ में उनका काफिला भी था। रेगिस्तान की गर्मी अपनी इंतेहा पर थी। पहाड़ी रास्ते और पानी की किल्लत क़यामत बरपा रही थी। नतीजा यह हुआ की काफिले वालों के तमाम ऊँटो ने दम तोड़ दिया। पहाड़ी लोगो को पता चला तो वह इस मौके का फ़ायदा उठाने की गरज़ से अपने ऊंटों के साथ वहां आ पहुंचे और मुहमांगे दामों में ऊंट बेचने लगे। जो अमीर लोग थे उन्होंने बेझिझक ऊंट खरीदना शुरू कर दिया लेकिन गरीब लोग मायूसी और बेबसी से हाथ मलने लगे। हज़रत शेख जलालुद्दीन तबरेज़ी रहमतुल्लाह अलैहि से यह देखा न गया। आप आगे तशरीफ़ लाये और अपने कपड़ो में से एक थैली निकाली, फिर "या लतीफो पढ़ा" फिर थैली में हाथ डाला और अशरफियां निकल कर ऊंट वालो को देना शुरू कर दी। इसी अमल से आपने एक एक करके पांच सौ ऊंट ख़रीदे और गरीबों में तकसीम फरमा दिए लेकिन खुद पैदल बैतुल्लाह तक तशरीफ़ ले गए।

इस इस्मे पाक (या लतिफु) की ख़ैरो बरकत का ज़िक्र कई और हदीसों में मौजूद हैं। पाबन्दी के साथ इसे पढ़ना कई बलाओं से महफूज़ रखता हैं और कई मुराद पूरी करता हैं। अगर कोई बेरोज़गार हो या तंगदस्ती और फाकाकशी (भूक से मर रहा हो) या किसी और मुसीबत से परेशान हो तो हर नमाज़ के ख़तम होने के बाद 100 मर्तबा "या लतिफु" और 21 मर्तबा दुरुद शरीफ पढ़कर दुआ मांगे। इंशाअल्लाह दुआ कबूल होगी। शर्त यह हैं की जब तक मकसद पूरा न हो तब तक पुरे यकीन और ऐतमाद के साथ यह अमल जारी रखा जाये।

अल्लाह हम सबको इस्लाम में बताये रास्तो पर चलने की तौफीक अता फरमाए आमीन 

ज़ालिमों के ज़ुल्म का अंजाम (Zalimo Ke Zulm Ka Anjaam)

ज़ालिमों के ज़ुल्म का अंजाम (Zalimo Ke Zulm Ka Anjaam)

इंसान कितना ही बड़ा अमीर, वज़ीर, बादशाह बन जाये, वह हमेशा इंसान ही रहेगा खुदा नहीं हो सकता। इंसान को अल्लाह पाक ने बेपनाह इल्म व ताकत से नवाज़ा हैं। फिर भी वह मजबूर हैं। ज़िन्दगी में कदम कदम पर उसे अल्लाह के दरबार में हाथ फैलाना पड़ता हैं। इंसान न तो अपनी खुद की मर्ज़ी और खुशी से इस दुनिया में आया हैं और न ही अपनी मर्ज़ी से जा सकता हैं। अल्लाह जब चाहता हैं पैदा फ़रमा देता हैं और जब चाहता हैं उसे उठा लेता हैं। किसको कैसी मौत देनी हैं और किसको कैसी ज़िन्दगी सब अल्लाह के हाथ में हैं। कोई अचानक खड़े खड़े मर जाता हैं कोई बरसों तक बिस्तर पर एड़ियां रगड़ कर मरता हैं। किसी की मौत अस्पताल के आई सी यु में होती हैं जहाँ उसके पास कोई नहीं होता और किसी की मौत इस तरह होती हैं की सोच कर भी डर लग जाये।

अल्लाह पाक ने क़ुरान पाक में सब को इस हक़ीक़त से आगाह फ़रमा दिया हैं की हर पैदा होने वाले को किसी न किसी दिन मरना हैं और यह बात कोई नहीं जानता की कब कौन कहाँ और कैसे मरेगा। इस ज़मीन पर ऐसे भी ज़ालिम भी गुज़रे हैं जिन्होंने अपनी दौलत और हुकूमत के नशे में खुदाई होने का दावा किया और लोगो से अपनी पूजा करवाई। उनका जो भयानक अंजाम हुआ उसके कई वाकेआत क़ुरान मजीद में मौजद हैं।

नमरूद ने अपनी हुकूमत और ताकत में नशे में चूर होकर खुदाई होने का दावा किया तो उसे समझाने के लिए अल्लाह पाक ने हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम को भेजा। आपने उसे बहुत समझाया बरसों तक समझाते रहे वह नहीं माना तो अल्लाह पाक ने उसे हलाक (ख़त्म करके) उसका नामो निशान मिटा दिया।

फ़िरऔन का घमंड खाक में मिलाने के लिए अल्लाह ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को भेजा आपने उसे समझाया-फ़िरऔन ! तू खुदा नहीं हैं बल्कि खुदा का बंदा हैं। तेरा खुदा तो वह हैं जिसने तुझे पैदा फ़रमाया हैं लेकिन हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की बातें उसको समझ में न आयी वह लगातार लोगो से अपनी पूजा करवाता रहा और हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम और आपके साथियों को तरह तरह से सताने लगा। जब हद हो गयी तब अल्लाह पाक ने उसे उसकी फौज समेत समुन्दर में बहा दिया।

इसी तरह शद्दाद को भी अपनी दौलत पर बड़ा नाज़ और घमंड था। उस नादान ने तो खुदा से टक्कर लेने के लिए बेपनाह दौलत खर्च करके दुनिया में ही जन्नत बनवा डाली लेकिन अफ़सोस वह अपनी बनवाई जन्नत में कदम भी न रख सका। वह दाखिल होना ही चाहता था की एक मच्छर ने उसकी सारी हसरतों पर पानी फेर दिया और वह अपनी बनावटी जन्नत में कदम न रख सका। कारून भी अपनी दौलत के नशे में चूर हो गया था। अल्लाह पाक ने उसे भी उसके ख़ज़ानों समेत ज़मीन में धंसा दिया।

खुदाई का दावा करने वाले दौलतमंदो बादशाहो को अल्लाह पाक ने इसलिए ऐसी भयानक सज़ा दी ताकि दुसरो को सबक हासिल करने का मौका मिले और लोग अपनी दौलत और हुकूमत के नशे में खुदा बनने की भूल न करें, लेकिन अफ़सोस आज भी वह पुराना सिलसिला जारी हैं। दुनिया में चारों तरफ ऐसे ज़ालिमों के ज़ुल्म से अल्लाह के बन्दे तबाह और परेशान हो रहे हैं। आज भी ऐसे ज़ालिम लोग अपने रुतबे और दबंगई से लोगो के साथ ज़ुल्म कर रहे हैं। आज जवान लड़कियों के साथ ऐसे ज़ालिम और दबंग लोग गलत काम करते हैं और दौलत और पैसो के दम पर सब को उनके खिलाफ बोलने से चुप करवा देते हैं। दौलत के दम पर गरीबों के साथ ज़ुल्म करते हैं। गरीबों के बच्चो और औरतो को एक खिलौना समझते हैं। ऐसे लोगो के खिलाफ कोई आवाज़ नहीं उठाता। यह हम लोगों की कमज़ोरी हैं की हम ऐसे दौलत मंद और दबंग लोगो से डरते हैं। आज हम अगर मज़बूत हो जाये और हिम्मत करके ऐसे लोगो को ख़त्म कर दे तो दुनिया में कभी ऐसे ज़ालिम लोग पैदा नहीं होंगे।

बहरहाल हमें चाहिए की हम किसी भी इंसान को खुदा न समझ कर सिर्फ अल्लाह की इबादत करें। किसी ऐसे शख्स के चक्कर में न आये जो खुदा होने का दावा करता हो। जो भी मांगना हैं अल्लाह से मांगे और किसी के सामने हाथ न फैलाये बेशक अल्लाह बड़ा मेहरबान और रहम करने वाला हैं।

इस्लामी आदाब व तालीमात (Islami Adab and Taleemat)


इस्लामी आदाब व तालीमात (Islami Adab and Taleemat)

शायद लोग यही मानते हैं की इस्लाम तो मुसलमानों को नमाज़, रोज़े वगैरह जैसी इबादत की तालीम देकर उन्हें दुनिया व दुनियादारी से दूर रखने की तालीम देता हैं। यही तो हमारी सबसे बड़ी भूल हैं। हम इस्लाम के रूहानी पैगाम को समझने की कोशिश नहीं करते। इस्लाम हमें पाक साफ़,भाईचारा और अमन से ज़िन्दगी जीने की तालीम देता हैं ताकि हम दुनिया में एक इज़्ज़तदार इंसान की हैसियत से ज़िंदा रहे और हमारी पाक साफ़ ज़िन्दगी दुसरो के लिए एक मिसाल बने।

पाक साफ़ और इज़्ज़तदार ज़िन्दगी जीने की तालीम देते हुए अल्लाह पाक ने फ़रमाया ! ऐ ईमान वालो अपने घरो के अलावा दूसरे के घरों में घर वालो की इजाज़त के बगैर अन्दर न जाओ और जब तक उन्हें सलाम न कर लो तब तक घर के अन्दर दखिल न हो। यही तरीका तुम्हारे लिए बेहतर हैं। अगर घर में कोई न हो तो भी बिना इजाज़त के अन्दर न जाओ और अगर तुम्हे लौट जाने के लिए कहा जाये तो तुम लौट जाओ यही तुम्हारे लिए अच्छा हैं। तुम जो कुछ भी करते हो अल्लाह सब कुछ जनता हैं। अगर कोई घर आबाद न हो मतलब किसी घर का कोई मालिक न हो वहां बिना इजाज़त के जाया जा सकता हैं।

आबाद या रहने वाले वाले घर चार तरह के हो सकते हैं।  

1.हमारे अपने घर जिसमे हम अकेले रहते हैं उसमें जाने के लिए किसी से इजाज़त लेने की ज़रूरत नहीं।
2.दूसरे लोगों के घर। ऐसे घरों में जाने के लिए सब से पहले बाहर से ही सलाम करें। फिर घर के अन्दर आने के लिए घर वालों से इजाज़त लें। इजाज़त मिलें तो अन्दर जाये अगर इजाज़त न मिलें या मना कर दिया जाएं तो वापिस लौट जाएं।
3.ऐसे घर जो खाली पड़े हों या वहां कोई मौजूद नहीं हैं ऐसे घरों में भी घुसने की इजाज़त नहीं हैं। किसी को किसी की जायदाद में दखल देने का कोई हक़ नहीं।
4.वह घर जो आम लोगों के इस्तेमाल के लिए होते हैं जैसे रेलवे स्टेशन, स्कूल, होटल, रेस्टोरेंट वगैरह इन जगहों पर हम बिना इजाज़त के जा सकते हैं, लेकिन कानूनी तौर पर उसका किराया देना या पास हासिल करना हमारा इस्लामी फ़र्ज़ हैं।

हज़रत अता बिन यसार रदियल्लाहो अन्हो का बयान हैं, एक सहाबी दरबारे रसूल में हाज़िर होकर कहने लगें या रसूलल्लाह ! मैं अपनी माँ के साथ घर में रहता हूँ तो क्या मैं भी अन्दर जाने के लिए अपनी माँ से इजाज़त लूँ? आपने फ़रमाया तुम्हे इजाज़त लेकर ही अन्दर जाना चाहिए। उन सहाबी ने फिर रसूलल्लाह से फ़रमाया की उस घर में मैं और मेरी माँ ही रहते हैं तो फिर मुझे अपनी माँ से इजाज़त लेने की क्या ज़रूरत हैं? रसूलल्लाह ने सहाबी को समझाते हुए फ़रमाया ! तुम्हें इजाज़त लेकर ही अन्दर जाना चाहिए। क्या तुम अपनी माँ को ऐसी वैसी हालत में देखना पसंद करते हो जो तुम्हें पसंद नहीं? उसने कहा या रसूलल्लाह मुझे यह गवारा नहीं। आपने फ़रमाया ! इसीलिए तो इस्लाम इजाज़त लेकर घर के अन्दर दाखिल होने की तालीम देता हैं।

इबने कसीर का कहना हैं की अगर घर में सिर्फ तुम्हारी बीवी रहती हैं तो इजाज़त की कोई ज़रूरत नहीं। फिर भी अपने आने का इशारा कर दिया जाये तो बेहतर हैं। हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद की बीवी फरमाती हैं ! मेरे शौहर घर में आने से पहले दरवाज़ा खटखटा दिया करते थे। इसलिए उन्होंने मुझे कभी ऐसी हालत में नहीं देखा जिसमे वह मुझे देखना पसंद न करते थे। 

किसी की घर जाये तो सलाम करें अगर अन्दर से कोई जवाब न मिलें तो दरवाज़ा खटखटाने के बाद किसी के आने के इंतज़ार करें अगर फिर भी कोई न आये या कोई जवाब न मिलें तो हरगिज़ अन्दर न जाएं। दूसरी तरफ अगर किसी के घर में कोई मुसीबत आ जाये जैसे घर में आग लग जाये या कोई और हादसा हो जाएं जिससे जान माल का खतरा हो, ऐसे हालात में बिना इजाज़त के घर में घुसकर घर वालों की मदद करना इंसानियत और इस्लाम का पैगाम हैं।

बहरहाल हमारे लिए ज़रूरी हैं की हम इस्लामी उसूलों की पाबन्दी करें ताकि कोई दूसरा इंसान हम पर कोई गलत इल्ज़ाम न लगा सके की इस्लाम इन्हे कोई गलत काम सिखाता हैं। अल्लाह हमें इस्लाम पर चलने और उस पर अमल करने की तौफीक दें आमीन । 

मोमिन का आख़िरत का सफर (Momin Ka Akhirat Ka Safar)

मोमिन का आख़िरत का सफर (Momin Ka Akhirat Ka Safar)

एक दिन अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम एक अन्सारी सहाबी के जनाज़े में कब्रिस्तान तशरीफ़ ले गए। कब्र के पास पहुंचे तो कब्र तैयार नहीं थी इसलिए आप वहाँ बैठ गए। साथ जाने वाले सहाबा भी आप के गिर्द इस तरह खामोश बैठ गए जैसे की उनके सरो पर परिंदे बैठे हो। आप के हाथ में छड़ी थी आप उससे ज़मीन कुरेदने लगे फिर सहाबा से फरमाने लगे ! कब्र के अज़ाब से बचने के लिए अल्लाह से पनाह मांगो

फिर फ़रमाया ! मोमिन का जब आखरी वक़्त करीब आता हैं और आख़िरत का सफर सामने होता हैं तो उसके पास आसमान से फ़रिश्ते नाज़िल होते हैं। जिनके चेहरे सफ़ेद होते हैं जैसे की सूरज चमक रहा हो उनके पास जन्नती कफ़न और जन्नती खुशबु होती हैं। वह फ़रिश्ते मरने वाले के पास बैठ जाते है। मरने वाले की नज़र जहाँ तक जाती हैं वहाँ तक फ़रिश्ते ही फ़रिश्ते नज़र आते हैं। फिर मलकुल मौत अलैहिस्लाम तशरीफ़ लाते हैं और उनके सिरहाने बैठ कर फरमाते हैं ! एक पाक जान अल्लाह की मगफिरत और रिज़वान की तरफ चल। फिर मोमिन की रूह इस तरह बहती हुई बदन से निकलती हैं जैसे मशक से पानी निकलता हैं। मलकुल मौत उस रूह को ले लेते हैं। उनके लेते ही दूसरे फ़रिश्ते फ़ौरन उस रूह को लेकर जन्नती कफ़न व खुशबु में डाल देते हैं। उस रूह से मुश्क की तरफ खुशबु निकलती हैं।

फिर फ़रिश्ते उस रूह को लेकर आसमान की तरफ बढ़ते हैं। उस खुशबूदार महकती रूह को देखकर आसमान के फ़रिश्ते पूछते है किस की रूह हैं? रूह ले जाने वाले फ़रिश्ते जवाब देते हैं, यह फलां इंसान की रूह हैं। इस तरह फ़रिश्ते उसे लेकर सातवें आसमान पर पहुँच जाते हैं उसके बाद अल्लाह का हुक्म आता हैं इस बन्दे के कामों का हिसाब किताब इल्लीइन में लिखो और रूह को वापिस ज़मीन पर ले जाओ क्यूंकि मैंने उसे ज़मीन से पैदा किया हैं वहीं लौटाऊंगा और फिर वहीँ से उठाऊंगा।

चुनांचे उसकी रूह वापिस लाकर उसके बदन में डाल दी जाती हैं। मुन्कर-नकीर उससे 3 सवाल करते हैं वह तीनो सवालो के सही जवाब देता हैं तो अल्लाह का हुक्म होता हैं ऐ फ़रिश्तो ! इसके लिए जन्नती फर्श बिछा दो इसे जन्नती जोड़ा पहना दो और इसके लिए जन्नत का एक दरवाज़ा खोल दो। इस तरह एक मोमिन का आख़िरत का सफर खत्म होता हैं।

अल्लाह तआला हमें इस्लामी ज़िदगी जीने की तौफीक दे और हमें अपने ईमान पर चलने की तौफीक अता फरमाए और ऊपर बयान हदीस के मुताबिक हमारा आखरी सफर आसान करके अंजाम बेहतर कर दे आमीन।

ईदुल फ़ित्र की इबादतें (Eid Ul Fitr Ki Ibadaten)

ईदुल फ़ित्र की इबादतें (Eid Ul Fitr Ki Ibadaten)

शौवाल इस्लामी साल का दसवां महीना हैं। इस महीने का चाँद देखकर सुरह फतह पढ़ कर हरा कपड़ा देखे या सुरह लहब पढ़ कर रंगीन कपड़ा देखे।
जो इंसान ईद की रात 4 रकात नफ़्ल नमाज़ पढ़े हर रकात में अल्हम्दो शरीफ के बाद 21 बार कुल हुवल्लाह शरीफ पढ़ेगा तो अल्लाह पाक उसके लिए जन्नत के आठों दरवाज़े खोल देगा।

इस महीने की पहली रात 4 रकात नफ़्ल नमाज़ पढ़े। अल्हम्दो शरीफ के बाद कुल हुवल्लाह, सुरह फ़लक, सुरह नास एक एक बार पढ़े तो अल्लाह पाक 6 महीने की इबादत का सवाब अता फरमाएगा। जो इंसान शौवाल की पहली रात में 20 रकात नफ़्ल नमाज़ पढ़े, हर रकात में अल्हम्दो शरीफ के बाद 5 बार कुल हुवल्लाह पढ़े।  अल्लाह पाक उसके आमाल नामे में एक साल की इबादत का सवाब लिखवाएगा।

जो इंसान इस महीने की पहली रात या दिन में 8 रकात नफ़्ल नमाज़ पढ़ेगा। हर रकात में सुरह फातेहा के बाद 25 बार कुल हुवल्लाह पढ़े, नमाज़ से फारिग होने के बाद 70 बार सुब्हानल्लाह,70 बार अस्तग़्फ़िरुल्लाह और 70 बार दुरुद शरीफ पढ़ेगा तो अल्लाह पाक इसकी बरकत से उसकी 70 ज़रूरते पूरी फरमाएगा और जन्नत में बेहतरीन मक़ाम अता फरमाएगा।

ईद के दिन ईद की नमाज़ के बाद घर पर आकर 4 रकात नफ़्ल नमाज़ पढ़े। पहली रकात में अल्हम्दो के बाद सुरह अअला दूसरी में सुरह शम्स तीसरी में सुरह वद दुहा और चौथी में कुल्हुवल्लाह पढ़ेगा तो अल्लाह पाक हज़ारो साल की इबादत का सवाब अता फरमाएगा।

जो गरीब इंसान ईद की नमाज़ के बाद घर आने पर 2 रकात नफ़्ल पढ़ेगा। हर रकात में अल्हम्दो शरीफ के बाद एक बार सुरह माऊन और तीन बार कुल्हुवल्लाह शरीफ पढ़ेगा तो उसे सदक़ए फ़ित्र अदा करने का सवाब मिलेगा। जो इंसान ईद के बाद 6 रोज़ा रखे जिसे शश ईद की रोज़े कहा जाता हैं।अल्लाह ऐसे इंसान को एक साल के रोज़े का सवाब अता फरमाएगा और उस पर दोज़ख की आग हराम कर देगा।

घर के ज़िम्मेदार को अपनी तरफ और अपने बीवी बच्चो की तरफ से ईद से पहले सदक़ए फ़ित्र (फ़ितरा) अदा करना वाजिब हैं। यह रकम रमज़ान के महीने में भी दी जा सकती हैं। फ़ितरा अदा करने वाले को एक दाने के बदले एक साल की इबादत का सवाब मिलता हैं। जो हैसियतदार होते हुए भी फ़ितरा ज़कात अदा न करे गरीबो का हक़ न दें, ऐसे लोग क़यामत में वह गरीबो का दामन पकड़ेंगे।

ईद के दिन ग़ुस्ल करे। हैसियत के ऐतबार से नए और साफ़ कपड़े पहनें, खुशबु लगाएं। ईदगाह जाकर नमाज़ अदा करें। नमाज़ के लिए जाने से पहले कुछ मीठी चीज़ खा ले। ईद का खुत्बा सुनना वाजिब हैं इसलिए नमाज़ पढ़ते ही घर न आये बल्कि खुत्बा सुनकर आये। लोगो से सलाम व मुसाफहा करें, ईद की मुबारकबाद पेश करें और क़ब्रिस्तान जाकर मुर्दो के लिए दुआएं मग़फ़ेरत करें। 

कब्र और गुनाह से जुड़ा एक बूढी औरत और एक आदमी का किस्सा

कब्र और गुनाह से जुड़ा एक बूढी औरत और एक आदमी का किस्सा

एक गांव में एक औरत रहा करती थी। वह पाबन्दी से पांचो वक़्त की नमाज़ पढ़ती थी, और मोहल्ले वालो को दीन की बातें बताया करती थी। एक दिन वह रात को कब्रिस्तान के करीब से गुज़री तो उसने कब्रिस्तान की निगरानी करने वाले आदमी को देखा की वह किसी मुर्दे का कफ़न चुरा कर ला रहा था। यह देख कर वह दंग रह गयी और सोचने लगी की जब मै मरूंगी तो यह आदमी मेरा कफ़न भी चुरा लेगा। यह सोच कर वह अपने घर गयी और अगले दिन पांच रुपये लेकर वापिस उसी जगह लोटी। उसने कब्रिस्तान की निगरानी करने वाले आदमी को पांच रूपए देते हुए कहने लगी! की देखो यह रूपए रख लो और मेरे मरने के बाद मेरा कफ़न मत चुराना। यह सुनकर वह आदमी चौंक गया और बड़ा शर्मिंदा हुआ की उसका पर्दाफाश हो गया। औरत ने कहा तुम इत्मीनान रखो मै इस बारे में किसी से नहीं कहूँगी। क्यूंकि किसी का ऐब छुपाना भी एक इबादत हैं। यह सुनकर उस आदमी को बड़ा अफ़सोस हुआ। उसने तौबा की और इक़रार किया की वह अब किसी का कफ़न नहीं चुरायेगा।

कुछ दिनों तक वह अपने वादे का पाबंद रहा लेकिन फिर उसने कफ़न चुराने वाला पुराना धंधा शुरू कर दिया। इसके कुछ दिनों बाद उस औरत का भी इंतेक़ाल हो गया। लोग जब उसे दफ़न करके कब्रिस्तान से चले गए तब रात को वही कब्रिस्तान की निगरानी करने वाला आदमी उस औरत की कब्र की और आया और आकर सोचने लगा की इस औरत का कफ़न निकालू या न निकालू। सोचते सोचते काफी देर हो गयी। आखिरकार उस आदमी को उसकी लालच ने फिर मजबूर कर दिया और वह उस औरत का कफ़न चुराने के लिए कब्र के और करीब पहुंचा। उसने उसी वक़्त उस औरत की कब्र खोदी कब्र खोदने के बाद जैसे ही उस औरत की लाश नज़र आयी तो वह डर के मारे काँप गया। उसने देखा की उस औरत के सीने पर एक काला खतरनाक साँप बैठा हुआ हैं। उसकी घबराहट देख कर एक आवाज़ आयी ! ऐ इंसान तूने वादे के बावजूद फिर ऐसी हरकत की एक साँप देख कर तू डर गया। क्या तुझे मालूम हैं की यह साँप मेरे सीने पर क्यों बैठा हैं? सुन एक बार मैंने अपने दाँत साफ़ करने के लिए बिना पूछे अपने पड़ोसी के घर पर लगे एक पेड़ से एक छोटी लकड़ी तोड़ दी थी। ज़िन्दगी में कभी यह ख्याल भी न आया की यह भी कोई गुनाह हैं। लेकिन आज उस चोरी की मुझे यह सज़ा मिल रही हैं। ज़रा तुम सोचो तुमने अपनी ज़िन्दगी में न जाने कितनी चोरियां की हैं। तुम्हारा क्या हाल होगा। इतना सुनते ही उसने उस औरत की कब्र बंद कर दी और सच्चे दिल से अपने गुनाहो से तौबा कर ली।

आज हम भी कुछ चीज़ो को मामूली गुनाह समझ कर उसे कर लेते हैं और उसका एहसास भी नहीं करते की हमने कुछ गलत किया हैं। आज का मुसलमान ग़ीबत कर रहा हैं, बेवजह नमाज़ छोड़ रहा हैं, लड़ाई झगडे कर रहा हैं, दीन की बातें कम फिल्मो गानो की बातें ज़्यादा कर रहा हैं। आज की पीढ़ी यह सोचती हैं की गुनाह कर लेते हैं जब हिसाब होगा तब देखा जायेगा और उसे मज़ाक में ले लेते हैं। आज हमे बड़े से बड़ा गुनाह करने पर रद्दी भर भी अफ़सोस नहीं होता तो फिर कब्र में हमारा क्या होगा ये सोचने वाली बात हैं। बहरहाल अल्लाह से हर वक़्त अपने किये गुनाहो की माफ़ी मांगो और कोई भी गुनाह चाहे छोटा हो या बड़ा वह करने से बचो।  

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