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क़यामत और उसकी निशानियां (Qayamat Or Uski Nishaniyan)

क़यामत और उसकी निशानियां (Qayamat Or Uski Nishaniyan)

क़यामत का मतलब वह दिन जिस दिन पूरी दुनिया ख़त्म हो जाएगी। आज हम दुनिया की रंगो रौनक में ऐसे खो गए हैं की अपनी मौत और आख़िरत को भूल बैठे है। आज इंसान सिर्फ उसी के बारे में सोचता हैं जो उसके सामने हो रहा हैं। या जो चल रहा हैं। और जो हकीकत आँखों से ओझल हैं उन्हें भूल बैठा हैं। कहने का मतलब ये हैं की इंसान सिर्फ दुनियावी मौज मस्ती में मगन हैं। उसे अपनी आख़िरत का बिलकुल ख्याल नहीं हैं। इंसान की यही भूल और लापरवाही इंसान को जहन्नम के रास्ते तक ले जाती हैं। हमें जिन जिन हकीकतों पर ईमान लाना ज़रूरी हैं उनमें से एक क़यामत भी एक हक़ीक़त हैं और जो क़यामत की हकीकत को ना माने वो मुसलमान नहीं। 

कभी आपने सोचा के आखिर क़यामत हैं क्या? क्या आपने इसके बारे में कभी जानने की कोशिश की? अल्लाह ने हमारी हिदायत के लिए क़ुरान मजीद नाज़िल फ़रमाया। उसमें जगह जगह अलग अलग अंदाज़ में क़यामत के बयान मौजूद हैं। हमें वक़्त निकालकर क़ुरान में मौजूद क़यामत के बारे में जो बयान मौजूद हैं उन्हें पढ़कर समझना चाहिए की आखिर क़यामत के दिन हमारा क्या हाल होगा।

सुरह ज़िलजाल में अल्लाह ने फ़रमाया ! जब ज़मीन पूरी ताकत से हिला दी जाएगी और ज़मीन पर से पल पल में उसमें मौजूद सारी चीज़े ख़त्म होने लगेगी। उस क़यामत के दिन इंसान कहेगा यह क्या हो रहा हैं? ज़मीन को क्या हो गया? उस दिन अल्लाह पाक के हुक्म से ज़मीन अपनी सारी खबरे बयान कर देगी। लोग अपनी अपनी कब्रों से निकल कर एक जगह जमा होंगे वहां उनके आमाल दिखाए जायेंगे। जो उन्होंने दुनिया में किये होंगे। उस दिन हर चीज़ का हिसाब होगा। हर नेकी और बदी का हिसाब होगा। मतलब यह के इंसान यह न समझ बैठे की दुनिया में जो चाहे कर गुज़रों कोई हिसाब किताब लेने वाला कोई नहीं। मगर क़यामत के दिन हर काम जो अपने दुनिया में किये उसका हिसाब होगा। 

क़यामत के बारे में सूरए हज में फ़रमाया ! क़यामत का दिन बड़ा खौफनाक होगा। उस दिन इतनी घबराहट होगी की दूध पिलाने वाली अपने प्यारे दूध पीते बच्चे को भी भूल जाएगी। यहाँ तक की पेट में से बच्चे गिर जायेंगे। लोग मदहोश दिखाई देंगे, लेकिन वह किसी नशे में नहीं होंगे बल्कि क़यामत के झटके से उनके दिल पर ऐसा असर होगा की वह सब कुछ भूल जायेंगे। उस दिन अल्लाह का ऐसा अज़ाब देखने को मिलेगा जिसके बारे में सोचते ही रोंगटे खड़े हो जाये। 

सूरए हाक्क में फ़रमाया जब पहली बार सूर (एक सींग) फूंका जायेगा तो एक ही चोट में ज़मीन और पहाड़ टूट टूट कर बिखर जायेंगे और क़यामत आ जाएगी। आसमान फट जायेगा और बिखर जायेगा। उसके किनारो पर फ़रिश्ते होंगे। उस दिन 8 फ़रिश्ते अल्लाह के अर्श को उठाये होंगे। उस दिन सभी अल्लाह के सामने पेश किये जायेंगे। तुम्हारा कोई राज़ अल्लाह से छुपा ना रहेगा। 

दूसरी बार जब सूर फूंका जायेगा तो रूहें अपने अपने बदन में वापिस आ जाएगी। लोग ज़िंदा होकर खड़े हो जायेंगे। नबियों और गवाहों को लाया जायेगा और सब के फैसले सुनाई दिए जायेंगे जिसने जैसा दुनिया में किया उसका वैसा अंजाम होगा।

सुरह यासीन में फ़रमाया की क़यामत के दिन लोगो के मुँह बंद कर दिए जायेंगे। वह कुछ बोल न सकेंगें सिर्फ उनके हाथ पैर बात करेंगे और गवाही देंगे की हमने ज़मीन पर यह काम किये। 

इस आयत से पता चलता हैं की आदमी अपने गुनाह लोगो से छुपा सकता हैं लेकिन अपने आप से नहीं छुपा सकता। यही वजह हैं की उसके बदन का हर हर हिस्सा उसके खिलाफ क़यामत में गवाही देगा। सब गवाही उसके खिलाफ होगी। इंसान के हर गुनाह का हिसाब अल्लाह के पास रहेगा भले ही उसने दुनिया में कितने ही लोगो से अपना गुनाह छुपाया हो।  

क़यामत आने से पहले हमें उसकी कई निशानियां दुनियां में देखने को मिल जाएगी। जो बहुत ही खौफनाक होगी। कुछ निशानियां आज भी हम दुनिया में देख रहे हैं। लेकिन लोग अपनी हरकतों से बाज़ नहीं आ रहे और गुनाह पर गुनाह किये जा रहे हैं। उन्हें अपनी आख़िरत का बिलकुल भी खौफ नहीं। उनका अंजाम आख़िरत में इतना दर्दनाक होगा की अगर वह सपने में भी वह देख ले तो सदमे में आ जाये। 

बहरहाल हमें चाहिए की आज हम जो भी गलत चीज़े हमारे आस पास देख रहे हैं या हम खुद ही उसे कर रहे हैं तो हम उसे रोकने की कोशिश करें। गुनाहो से बचे। अपने आस पास हो रही गलत चीज़ो घटनाओं को रोके और अल्लाह से अपने गुनाहो की माफ़ी मांगे ताकि आप हम अपनी आख़िरत सुधर सके। क्यूंकि दुनियावी ज़िन्दगी तो एक न एक दिन ख़त्म हो जाएगी। कोई दुनिया में अमर नहीं रह सकता, लेकिन उसके बाद की जो ज़िंदगी हैं वही इंसान की असली ज़िन्दगी हैं। इसलिए अल्लाह से दुआ करते रहे, नमाज़ कायम रखे और गुनाहो से बचे अल्लाह हाफिज ।

दफ़न के बाद कब्र पर अज़ान पढ़ना (Dafan Ke Baad Kabr Par Azan Padhna)

दफ़न के बाद कब्र पर अज़ान पढ़ना

इमाम अहमद, इमाम तबरानी और इमाम बेहकी रहमतुल्लाह अलैह ने जब हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्लाह से रवायत बयान की के जब हज़रत सअद बिन मआज़ रदियल्लाहो अन्हो कब्र में उतर दिए गए और कब्र दुरस्त कर दी गयी तो अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम काफी देर तक सुभानअल्लाह सुभानअल्लाह पढ़ते रहे। जिसे सुनकर वहां मौजूद सहाबा भी पढ़ते रहे। थोड़ी देर के बाद अल्लाह के रसूल ने अल्लाहो अकबर अल्लाहो अकबर पढ़ना शुरू कर दिया तो यह सुनकर सहाबा भी अल्लाहो अकबर अल्लाहो अकबर पढ़ने लगे। फिर आप सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम तस्बीह (सुभानअल्लाह) और तकबीर(अल्लाहो अकबर) पढ़कर खामोश हुए। थोड़ी देर बाद एक सहाबा ने अर्ज़ किया या रसूलल्लाह ! आप तस्बीह और तकबीर क्यों पढ़ रहे थे? आप रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने उन्हें जवाब दिया की इस नेक आदमी की कब्र तंग हो गयी थी और अल्लाह ने तस्बीह और तकबीर की बरकत से उसकी कब्र को लम्बा और चौड़ा कर दिया।  

इस हदीस से यह साबित हुआ की खुद अल्लाह के रसूल ने मुर्दे की आसानी के लिए दफन के बाद कब्र पर अल्लाहो अकबर का विर्द फ़रमाया हैं। चूँकि यह कलमा अज़ान में 6 बार आया हैं इसलिए यह सुन्नत हैं। यहीं नहीं बल्कि अज़ान में तो इस के अलावा कुछ और भी ऐसे कलमें हैं जो मुर्दे को नकीरैन (मुन्कर और नकीर नाम के 2 फ़रिश्ते जो कब्र में मुर्दो से सवाल जवाब करते हैं) इन दोनों फ़रिश्ते को जवाब देने में आसानी पैदा करते हैं। इसलिए कब्र पर अज़ान पढ़ना मुस्तहब हैं।

जब बंदा कब्र में रखा जाता हैं और दफ़न होने के बाद लोग कब्रिस्तान से निकल जाते हैं तब मुन्कर और नकीर मुर्दे से सवाल करने आ पहुंचते हैं। उस वक़्त शैतान भी वहाँ आ जाता हैं और मुर्दे को गुमराह करने की कोशिश करता हैं। अल्लाह तआला अपने हबीब के सदके में हर मोमिन को शैतान के शर से बचाये। जब फ़रिश्ते मुर्दे से पूछते हैं तेरा रब कौन हैं? तो शैतान मुर्दे को देखकर इशारा करता हैं की तेरा रब में हूँ। इसलिए हुक्म हैं की मुर्दे को दफन करने के बाद उसके लिए दुआ करना चाहिए की अल्लाह उसे शैतान के शर से बचाये। इसी मकसद के लिए दफ़्न के बाद अज़ान पढ़ी जाती हैं क्यूंकि जब अज़ान पढ़ी जाती हैं तो शैतान 36 मील दूर भाग जाता हैं।

अबू दाऊद शरीफ की हदीस हैं अपने मरने वाले दीनी भाई के लिए कलमें की तिलावत करो क्यूंकि खात्मा बिल खैर उसी वक़्त होगा जब मोमिन कलमा पढता हुआ दुनिया से जायेगा इस वक़्त भी शैतान मौजूद होता हैं और मरने वाले को बहकाता हैं। मरने के बाद मुर्दे के लिए क़ुरान,कलमा की तिलवात की और सख्त ज़रूरत होती हैं ताकि रूह शैतानी साये से बच जाये और कब्र से अज़ाब से बच सके। चूँकि ला इलाहा इल्लल्लाह अज़ान में 3 मर्तबा आता हैं, इसलिए दफ़्न के बाद तलकीन की नियत से अज़ान पढ़ना मुफीद और मुस्तहब हैं। अज़ान में कब्र के तीनों सवालों के जवाब मौजूद हैं की मेरा रब अल्लाह हैं, मेरा दीन वह हैं जिसमे नमाज़ दीन का सुतून हैं और अल्लाह के रसूल की रिसालत की गवाही भी अज़ान में मौजूद हैं।

हज़रत सईद बिन मुसैइब फरमाते हैं की मै एक मर्तबा हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रदियल्लाहो अन्हो क़े साथ एक जनाज़े मे शरीक हुआ। जब मुर्दा कब्र मे रखा गया तो आपने फ़रमाया बिसमिल्लाह व फ़ी सबिलिल्लाह ! जब कब्र की मिट्टी बराबर की जाने लगी तो आपने फ़रमाया इलाही ! इसे शैतान से बचा और कब्र क़े अज़ाब से महफूज़ रख। अबू दाऊद शरीफ की हदीस हैं, अल्लाह क़े रसूल जब दफ़्न से फ़ारिग होते तो थोड़ी देर बाद कब्र क़े पास ठहरे रहते और लोगो से फरमाते अपने भाई क़े लिए दुआ करो उसकी बख्शीश की दुआ माँगो दुआ करो की फरिश्तों से सवाल जवाब क़े वक़्त मुर्दा शैतान क़े बहकावे में न आये और सारे सवालो क़े जवाब सही से दे दे।

कब्र पर अज़ान देने से मुर्दे को पाँच फायदे नसीब होते हैं।

शैतान क़े शर से हिफाज़त मिलती हैं।

तकबीर की बरकत से आग क़े अज़ाब से निजात मिलती हैं।

सवालों क़े जवाब देने मे आसानी होती हैं।

अज़ान की बरकत से मुर्दा कब्र क़े अज़ाब से सुकून पाता हैं।

अज़ान की बरकत से कब्र की वहशत दूर होती हैं।


इसलिए आप हज़रात से गुज़ारिश हैं हैं जब भी मुर्दे को दफ़न करे तो दफ़न करने बाद अज़ान ज़रूर दे और मुर्दे की बख्शीश क़े लिए अल्लाह से दुआ करे। 

इमाम अहमद रज़ा खां फ़ाज़िले बरैलवी रहमतुल्लाह अलैह (आला हज़रत) की ज़िन्दगी

इमाम अहमद रज़ा खां फ़ाज़िले बरैलवी रहमतुल्लाह अलैह (आला हज़रत) की ज़िन्दगी

हमारे मुल्क हिंदुस्तान के बरैली शहर में 14 जून 1856 ईस्वी में सनीचर के दिन ज़ोहर के वक़्त हमारे आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खां फ़ाज़िले बरैलवी रहमतुल्लाह अलैह पैदा हुए। जिन्होंने इस्लाम को एक नयी ज़िन्दगी बख्शी। उनके किरदार उनके इल्म उनकी किताबों को पढ़कर आप इस्लाम के रास्ते पर चल सकते हैं। आपने ऐसी खूबियां मौजूद थी की आपके सामने दुनिया की बातिल ताकतें भी मात खा गयी। 14 साल की उम्र में आपमें इल्म का ऐसा दरिया था की उस वक़्त के बड़े बड़े आलिमों ने आपके इल्म का लोहा माना। आपने अपनी किसी खिदमत का कभी पैसा नहीं माँगा और मांगते भी क्यों? वह तो अपने आका के ऐसे गुलाम थे की दीन को फैलाना ही उनकी ज़िन्दगी का मकसद था। आपकी इल्मी व अमली काबिलियत को देखकर उस वक़्त के मशहूर बुज़ुर्ग हज़रत वारिस अली शाह आपके लिए बोल पड़े इसका मर्तबा अपने वक़्त के आलिमो और वलियों में आला हैं फिर तो आप आला हज़रत बनकर ही दुनिया में चमके।

आपने ज़िन्दगी भर दीन के दुश्मनो से कभी समझौता नहीं फ़रमाया। गुमराही फ़ैलाने वाली जमाअतों की नापाक हरकतों से हमेशा अवाम को खबरदार फरमाते रहे। आप ऐसी जमाअतों के गलत प्रचारों और अक़ीदों के जवाब में किताबें व रिसाले लिखते रहे। जब महात्मा गाँधी ने आपके मिलने की खवाहिश ज़ाहिर की तो आपने उनको पैगाम भिजवाया की मेरे यहाँ अगर आप दीनी मालूमात हासिल करना चाहते हो तो आ सकते हो सियासी मामलात पर बात करने के लिए आप तैयार नहीं। आपने कभी किसी दुनियादार, हाकिम, नवाब की कभी खुशामद नहीं की।

आपने महज़ 4 साल की उम्र में क़ुरान शरीफ पढ़ लिया था। छह साल की उम्र में आप पंजगाना नमाज़ के साथ साथ तहज्जुद की नमाज़ के भी पाबंद हो गए थे। 4 साल की उम्र के बाद आप कभी मदीना शरीफ और बगदाद शरीफ की तरफ पैर करके न सोये।

आप कितने ज़हीन और दीन के अलीम थे, यह आपके बचपन के वाक़ेआत से अंदाज़ा लगाया जा सकता हैं। आप बहुत छोटे ही थे की एक दीन आपके घर में कुछ मेहमान आये। उनमे काफी आलिम भी थे। आप के वालिद हज़रत नक़ी अली खां ने उन मेहमानों की मेजबानी फ़रमाई। एक मौलाना साहब को वज़ू के लिए पानी की ज़रूरत महसूस हुई। आप वही पास खड़े थे। मौलाना साहब ने फ़रमाया मियाँ ! वज़ू के लिए पानी ला दीजिये आपने फ़रमाया हज़रत ! पहले मुझे चवन्नी दीजिये फिर मैं पानी लाऊंगा। मौलाना साहब को यह बात अच्छी नहीं लगी और हज़रत नक़ी अली खां से आपकी शिकायत कर दी की आपका बच्चा वज़ू का पानी लाने के बदले पैसे मांग रहा हैं। जब मौलाना साहब आपकी शिकायत आपके वालिद से कर रहे थे तब आप भी वहां मौजूद थे। मौलाना साहब के मुँह से शिकायत सुनकर आप (आला हज़रत) बोले हज़रत मैं नाबालिग हूँ और नाबालिग से बिला उजरत या उसके वालेदैन की इजाज़त के बगैर खिदमत लेना मना हैं। आपकी बात सुनकर मौलाना साहब को अपनी गलती और हज़रत की इल्मी काबिलियत का अंदाज़ा हो गया।

हमारे आला हज़रत आशिके रसूल थे। कई बार ख़्वाब में मुस्तफा जाने रहमत सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम का दीदार फ़रमाया। यही नहीं आप हर जुमेरात को मदीना शरीफ पहुँच कर रोज़ए अक़दस पर हाजरी देते और वापिस तशरीफ़ लाया करते। यह बात हैरान करने थी की बरैली से मदीना हर जुमेरात को जाना और थोड़ी देर में हाजरी देकर आना कैसे मुमकिन हैं, लेकिन यह बात बिलकुल सच हैं। आप आला हज़रत में ऐसी करिश्माई ताकतें थी की आप हर जुमेरात को थोड़ी देर के लिए अचानक से गायब हो जाते और मदीना शरीफ पर हाजरी देकर वापिस आ जाते।

मौलाना हमीदुर्रहमान साहब बयां फरमाते हैं की एक वक़्त की बात हैं जब में बहुत छोटा था और बरैली शरीफ हाज़िर हुआ। जुमेरात की बात हैं जब में आला हज़रत के घर पर ही था। अचानक कोई साहब आये और हज़रत से मिलने की खवाहिश ज़ाहिर की। मैं यानि मौलाना हमीदुर्रहमान साहब जैसे ही आपको (आला हज़रत) को किसी के आने का पैगाम देने पहुंचे तो आपने देखा की आपके खास कमरे में कोई नहीं था। आपने आला हज़रत को बहुत तलाश किया लेकिन वह कही नज़र न आएं। मौलाना हमीदुर्रहमान साहब हैरान रह गए और सोचने लगे की अभी कुछ देर पहले तो यहाँ थे अचानक कहाँ गायब हो गए? अचानक कुछ देर बाद कमरे से आप आला हज़रत बाहर निकले। आपको देखकर सभी लोग हैरान रह गए और उनसे फरमाने लगे की आप कमरे में तो थे नहीं फिर आप कैसे तशरीफ़ ला रहे हैं? हम तो इसी कमरे के बाहर खड़े हैं और थोड़ी देर पहले हमने कमरे को देखा लेकिन वहां आप नहीं थे इसमें क्या राज़ हैं? आपने फ़रमाया अल्हम्दुलिल्लाह ! मैं हर जुमेरात को इस वक़्त अपने इसी कमरे से बरैली से मदीना मुनव्वरा हाजरी देता हूँ। यह बात सुनकर सभी लोगो के मुँह से एक ही अल्फ़ाज़ निकला सुभानअल्लाह सुभानअल्लाह ! आप आला हज़रत में ऐसी खूबियां थी की आप हर जुमेरात चंद लम्हो में आँखों से ओझल हो जाते और कुछ देर बाद वापिस अचानक नज़र आ जाते। अल्लाहो अकबर ऐसी शान वाले हैं हमारे आला हज़रत।

अल्लाह तआला हमें उनके नक़्शे कदम पर चलने और मुस्तफा जाने आलम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम की सुन्नतों पर अमल करने की तौफीक अता फरमाए आमीन। 

अल्लाह के वलियों की करामातें (Allah Ke Waliyon Ki Karamaten)

अल्लाह के वलियों की करामातें (Allah Ke Waliyon Ki Karamaten)


अल्लाह पाक ने अपने बन्दों की हिदायत के लिए दुनिया में हज़ारों नबी व रसूल भेजे। अलग अलग कौमों की तरफ अलग अलग ज़मानो में अलग अलग नबी तशरीफ़ लाये। उन नबियों को अल्लाह पाक ने एक खास कमाल अता फ़रमाया जिसे मोज़ेज़ा कहा जाता हैं। उन सभी नबियों रसूलों को देखकर या कहे उनकी हिदायतों और नसीहतों को सुनकर अलग अलग ज़माने में काफी लोग ईमान लाएं और काफी लोग ऐसे भी थे जो मोज़ेज़ा देखकर भी ईमान ना लाएं। ऐसे लोगों ने नबियों की करामातों उनके कमाल को जादू कह कर ठुकरा दिया। ऐसे लोगों ने एक खुदा को मानने से इंकार कर दिया और नबियों रसूलों की बताई नसीहतों को नहीं माना। ऐसे लोग आगे जाकर अल्लाह पाक की तरफ से तरह तरह की सज़ाओं और अज़ाब से मुबतला किये गए। 

इसी तरह नबियों व रसूलों का सिलसिला बंद हो जाने के बाद अल्लाह पाक ने अपने जिन बन्दों को इस्लाह व तबलीग़ की ज़िम्मेदारियाँ दी उन्हें वली कहा जाता हैं। अल्लाह ने अपने इन वलियों को भी कुछ खास ताकतें अता फ़रमाई जिन्हे करामात कहा जाता हैं। ज़रूरत पड़ने पर अल्लाह के इन नेक बन्दों ने अल्लाह की बख़्शी हुई इस ताकत का इस्तेमाल फ़रमाया। आपने दूर व नज़दीक के सैकड़ों वलियों की करामातें देखी सुनी होगी। 

सुल्तानुल हिन्द, हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ रहमतुल्ला अलैह की बहुत सी करामातें आपने सुनी होगी। आप अपने प्यारे रसूल के फरमान के मुताबिक तबलीग़ व इस्लाह के लिए हिंदुस्तान तशरीफ़ लाये और अजमेर को अपना तबलीग़ मरकज़ बनाया। 

अजमेर पहुँचते ही आप आराम करने के लिए जिस पेड़ के नीचे बैठे, वहां उस वक़्त के राजा के जानवर(राजा के पले हुए ऊंट) बैठा करते थे। राजा के सिपाहियों ने जब आपको बैठे देखा तो राजा के सिपाहियों ने आपसे कहा यहाँ से उठ जाओ। यहाँ हमारे राजा के ऊंट बैठा करते हैं।  आप (हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ रहमतुल्ला अलैह) ने फ़रमाया ऊंट तो कहीं और भी बैठ सकते हैं। यह सुनकर राजा की सिपाहियों ने आपको तेज़ आवाज़ में उठने को कहा। आप उसी वक़्त वहाँ से उठ गए और चल दिए। अगले दिन एक अजीब से वाक़ेया हुआ। जब राजा के सिपाहियों ने बैठे ऊंट को अपनी जगह से उठाना चाहा तो ऊंट तमाम कोशिशों के बावजूद नहीं उठे। यह देखकर सिपाही दंग रह गए और सारी बात अपने राजा को बताई। राजा ने सिपाहियों को हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ रहमतुल्ला अलैह से माफ़ी मांगने को कहा और कहा की उन्हें ढुंढो और उनसे माफ़ी मांगो। राजा के ऐसा कहते ही सिपाहियों ने आप हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ रहमतुल्ला अलैह को ढूंढ कर आपसे उनके किये बर्ताव की माफ़ी मांगी। हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ रहमतुल्ला अलैह ने उसी वक़्त उन्हें माफ़ कर दिया और कहा की तुम जाओ तुम्हारे ऊंट अब खड़े हो जायेंगे। सिपाहियों ने जब वापिस जाकर ऊंट को उठाना चाहा तो ऊंट उसी वक़्त उठ गए। सुभानअल्लाह ! यह हैं हमारे ख्वाजा गरीब नवाज़ का मर्तबा। 

हज़रत ख्वाजा उस्मान हारूनी रहमतुल्ला अलैह हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ के पीर मुर्शिद थे। यह वही बुज़ुर्ग हैं जिनकी खिदमत में हमारे ख्वाजा गरीब नवाज़ ने अपनी जवानी के 20 साल गुज़ारे। एक बार की बात हैं एक दिन आप अपने पीर हज़रत ख्वाजा उस्मान हारूनी रहमतुल्ला अलैह के साथ सफर में थे। सफर पर चलते चलते आप दजला नदी के किनारे पहुंचे। नदी पार करने के लिए कोई कश्ती नहीं थी। हज़रत ने फ़रमाया मोईनुद्दीन ! अपनी आंखे बंद कर लो फिर थोड़ी देर बाद फ़रमाया आँखे खोल दो। जब ख्वाजा गरीब नवाज़ ने अपनी आंखे खोली तो आप देखते हैं की दोनों दजला नदी के पार पहुँच चुके हैं। आपने हज़रत ख्वाजा उस्मान हारूनी रहमतुल्ला अलैह से पूछा हम दोनों नदी के पार कैसे आ गए? हज़रत ने फ़रमाया मैंने सिर्फ 5 मर्तबा सुरह फातेहा पढ़ी थी, उसकी बरकत से अल्लाह पाक ने हम दोनों को खैरियत के साथ दरिया के पार पहुंचा दिया। 

यह मक़ाम और मर्तबा उन्ही को नसीब होता हैं जो अपनी ज़िन्दगी अल्लाह की मर्ज़ी के मुताबिक ढाल लेते हैं और फिर उसी के हो जाते हैं। इसलिए अल्लाह पाक उनकी ज़बानों में ऐसी तासीर अता फ़रमा देता हैं की वह जो कहते हैं वह हो जाता हैं। यह ताकत हर किसी को नहीं मिलती यह सिर्फ अल्लाह के खास बन्दों को दी जाती हैं। जिसने अपने आप को अल्लाह के हवाले कर दिया समझो उसने अपनी ज़िन्दगी में सब कुछ पा लिया। बहरहाल ऐसे कैसे कई वली और पीर पैगम्बर की कहानियां हदीसों में मौजूद हैं, जिनके कारनामे हैरान करने वाले हैं। हम कोशिश करेंगे आगे भी ऐसे वलियों के करामातों की जानकारी आगे भी देते रहेंगे। 

अल्लाह हाफिज   

हर परेशानी और मुश्किल की इस्लामी दुआएं और वज़ीफ़ा (Har Pareshani Ki Duayen)

हर परेशानी और मुश्किल की इस्लामी दुआएं और वज़ीफ़ा

हर परेशानी और मुसीबत से निजात की इस्लामी दुआयें। आज हर शख्स तरह तरह की परेशानियों और मुसीबतों में मुब्तला हैं। आज के इस आर्टिकल में हम कुछ खास दुआओं के बारे में बातएंगे। जिस पर अमल करके आप इन परेशानियों को ख़त्म कर सकते हो।      

 

बीमारी से परेशानी के लिए 

अगर आप किसी बीमारी से परेशान हैं और काफी इलाज कराने के बावजूद बीमारी जा नहीं रही हैं तो इस अमल को करने से इंशाल्लाह बीमारी खत्म हो जाएगी। 

11 मर्तबा दुरुद शरीफ पढ़कर 41 बार सूरह फातेहा पढ़े। फिर दोबारा 11 मर्तबा दुरुद शरीफ पढ़े। फिर उसे पानी पर दम करके वह पानी पियें हो सके तो उसमें थोड़ा आबे ज़म ज़म का पानी भी मिला ले। सात दिन तक उसका पानी थोड़ी थोड़ी देर में जब भी प्यास लगे एक एक घूंट वह पानी पीते रहें। सांतवे दिन शाम को औलियाँ और अम्बियां, पैग़म्बरों के नाम पर फातेहा लगाकर अल्लाह से दुआ करें और अपने गुनाहों की माफ़ी मांगे और कुछ खाना गरीबों, ज़रूरतमंदों में तकसीम कर दें इंशाअल्लाह ये अमल करने से आपकी बीमारी दूर हो जाएगी। 


कामयाबी के लिए वज़ीफ़ा- 

अगर आपको अपनी ज़िन्दगी में कामयाबी नहीं मिल पा रही हैं तो ये अमल ज़रूर करें।  

11 बार दुरूदे ताज पढ़कर 2 रकात नफ़्ल नमाज़ पढ़े हर रकात में सूरह फातेहा के बाद सूरह नस्र 3 बार पढ़े। सलाम फेरने के बाद 11 मर्तबा दुरूदे जुमा पढ़कर अपनी कामयाबी के लिए दुआ मांगे और सुबह शाम यह दुआ पढ़े "अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मदीव व आलिही व असहाबिहि बि-अदा-दी मा-फ़ी जमीइल क़ुरआनी हरफन हरफव्वा बि अदा दी कुल्लि हर्फिन अलफ़न अलफ़न

ये पढ़ने से इंशाल्लाह आपको ज़बरदस्त कामयाबी हासिल होगी


रोज़ी में बरकत के लिए 

जो शख्स हमेशा अपनी रोज़ी में बरकत चाहता और चाहता हैं की उसका माल बढ़ जायें तो वह सुबह शाम पाबन्दी से यह दुआ पढ़े।  

"अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मदिन अब्दिक़ा व रसूलिका व सल्लि अलल- मुअमिनिना वल मुअ मिनाती वल मुस्लीमीना वल मुस्लिमाती" इंशाल्लाह आपके माल में और बरकत होगी और कभी तंगी नहीं आएगी। 


नौकरी में तरक्की के लिए 

फज्र की नमाज़ के बाद 100 मर्तबा दुरुद शरीफ और 100 बार कुल्हुवल्लाह शरीफ साथ ही साथ दुआ "अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मदीव व आलिही व असहाबिहि बि-अदा-दी मा-फ़ी जमीइल क़ुरआनी हरफन हरफव्वा बि अदा दी कुल्लि हर्फिन अलफ़न अलफ़न" पाबन्दी से पढ़े। बेशक आपको अपनी नौकरी में तरक्की हासिल होगी। 


शैतानी ख़यालात दूर करने के लिए- 

जिन लोगों के दिमाग में हर वक़्त बुरे और शैतानी ख़यालात चलते रहे हैं वह ये अमल ज़रूर करें।  

हर नमाज़ के बाद दुरुद शरीफ पढ़कर 13 -13 बार सूरह फलक पढ़ लिया करें आखिर में दोबारा दुरुद शरीफ पढ़कर ऐसे खयालातों से छुटकारा पाने के लिए अल्लाह से दुआ करें। अल्लाह ने चाहा तो आप शैतानी वसवसों से महफूज़ रहेंगे।


कान में दर्द के लिए 

कान में दर्द से छुटकारा पाने के लिए 3 बार सूरह फ़लक पढ़ कर पानी में दम करके पियें इंशाल्लाह कान का दर्द दूर हो जायेगा। 


क़र्ज़ अदा करने के लिए 

जो शख्स कर्ज़दार हैं और क़र्ज़ चूका पाने में अपने आप को लाचार और कमज़ोर महसूस कर रहा हैं। वह सूरह आले इमरान सुबह शाम रोज़ाना 7 मर्तबा पाबन्दी से पढ़े। अल्लाह के करम से उसका क़र्ज़ अदा हो जायेगा और खुद के लिए रोज़ी के इंतेज़ाम भी हो जायेगा। 


कैंसर से निजात ( छुटकारे) की दुआ  

क़ुरान में हर बीमारी में इलाज हैं। जो लोग कैंसर की बीमारी की चपेट में आ चुके हैं या कहे जिनको कैंसर की बीमारी हैं या जो इस बीमारी से बचना चाहते हैं। वो निचे दिए गए फोटो में दी गयी दुआ को ज़रूर देखें इंशाल्लाह आपको इस बीमारी से निजात मिलेगी।

कैंसर के इलाज की दुआ


डिप्रेशन से छुटकारे के लिए दुआ 

अगर आप डिप्रेशन के शिकार हो गए हैं और उससे निकल नहीं पा रहे तो पाबन्दी से ये 2 दुआएँ पढ़े इंशाल्लाह बहुत जल्द आप इस बीमारी से निकल जायेंगे। 

या हय्यू या कय्यूम बिन रहमतिका अस्तगीसु शयन 

दूसरी दुआ "अल्लाहु अल्लाहु रब्बी ला उशरिकु बिहि शिआ (اللَّهُ اللَّهُ رَبِّي لا أُشْرِكُ بِهِ شَيْئًا)"


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नमाज़ और आजकल के मुसलमानो के हालात (Namaz or Musalman)

नमाज़ और आजकल के मुसलमानो के हालात (Namaz or Musalman)

आज कल देखा जाता हैं की लोगो के पास नमाज़ पढ़ने के लिए बिलकुल वक़्त नहीं हैं। सब के पास खाने का वक़्त हैं, घूमने का वक़्त हैं, रिश्तेदारों के यहाँ जाने का वक़्त हैं, फिल्मे गाने सुनने का वक़्त हैं लेकिन नमाज़ के लिए वक़्त नहीं। अफ़सोस आजकल के मुसलमान और पहले के ज़माने के पंज वक्ता नमाज़ी मुसलमान दोनों में कितना फर्क हैं। हालाँकि ऐसे काफी मुसलमान आज भी हैं जो आज भी नमाज़ो को पाबन्दी से अदा कर रहे हैं और नेक अमल कर रहे हैं। यह उन लोगो की बात हो रही हैं जो ऐसा नहीं कर रहे हैं। 

जिस तरह आप अपने कारोबार को सँभालने के वक़्त अगर कोई खरीददार (ग्राहक) आ जाये। उससे काफी देर तक बहस करने के बाद आप अपना सामान बेचते हैं और कुछ रुपया कमाते हैं। ग्राहक कुछ खरीदने में ज़िद करता हैं मोल भाव करता हैं उसके लिए भी तो आप वक़्त निकाल लेते हैं, अगर कुछ दूसरा काम आ जाये तो आप दुकान छोड़कर 10 मिनट के लिए और उससे ज़्यादा वक़्त के लिए उस काम को करने चले जाते हैं तो अज़ान की आवाज़ सुनकर सब कुछ छोड़कर अल्लाह के दरबार में कुछ वक़्त इबादत करने में क्या हर्ज़ हैं। अगर आप ऐसा कर लेते हैं तो बेशक आप के कारोबार में और बरकत होगी क्यूंकि रोज़ी देने वाला और उसमे बरकत देने वाला सिर्फ अल्लाह हैं। 

जिस तरह सख्त कारोबारी मसरूफियात के वक़्त अगर आपका लाडला बेटा या बेटी बीमार हो जाये तो आप दुकान और सारा काम काज छोड़कर उसके इलाज के लिए वक़्त निकाल लेते हैं। उस वक़्त आप अपने कारोबार के नुक़सान के बारे में बिलकुल नहीं सोचते। बेशक आपको ऐसा ही करना चाहिए लेकिन जब अज़ान हो रही होती हैं और अल्लाह आपको बुला रहा होता हैं तब आप दुकान छोड़कर नमाज़ पढ़ने क्यों नहीं जाते। क्या आपको खुदा से कोई मतलब नहीं? अगर औलाद के लिए दुकान बंद हो सकती हैं तो औलाद अता करने वाले अल्लाह के लिए भी दुकान बंद करके नमाज़ के लिए भी वक़्त निकाला जा सकता हैं। 

जिस तरह एक रिश्तेदार के इंतेक़ाल पर सब काम छोड़ कर आप मैयत में इस ख्याल से शिरकत करना ज़रूरी समझते हैं की अगर आप न गए तो रिश्तेदार नाराज़ हो जायेंगे और ऐसे वक़्त में अपने यहाँ भी कोई नहीं आएगा। इसी तरह नमाज़ का वक़्त हो जाने पर भी वक़्त निकलकर नमाज़ अदा कीजिये वरना अल्लाह आप से नाराज़ हो जायेगा। जब रिश्तेदार को नाराज़ करना आपको मंज़ूर नहीं तो अपने परवरदिगार को नाराज़ करना कैसे आपको मंज़ूर हो सकता हैं। 

जिस दिन बरसो की कमाई आप अपने बच्चो की शादी में लगा देते हैं। शादी के प्रोग्राम में हफ़्तों तक कारोबार बंद रखते हैं। अगर आप अपने बच्चो की ख़ुशी के लिए अपना कारोबार हफ्तों तक बंद रख सकते हैं तो अपने रब की ख़ुशी के लिए क्यों बंद नहीं कर सकते। इसमें तो आपको हफ़्तों तक बंद रखने की भी ज़रूरत नहीं। बस दिन में कुछ वक़्त निकालना हैं वो भी आपसे नहीं होता। इसके पीछे वजह यही हैं की मुसलमानो के दिलों में अल्लाह का खौफ अब नहीं रहा। उनको सिर्फ दुनियादारी से मतलब हैं। लोग सोचते हैं की मरने के बाद जब हिसाब होगा तब देखा जायेगा और बात को टाल देते हैं और वही दुनियादारी और मौज मस्ती के दुनिया में लग जाते हैं। उनको न अल्लाह से मतलब हैं न ही अल्लाह की इबादत से ! ऐसा करने वाले लोग बेशक जहन्नम के हक़दार हैं। आज मुसलमान एक दूसरे को काटने में लगा हैं एक दूसरे की तरक्की नहीं देखना चाहता एक दूसरे से जल रहा हैं क्या यही हमारे प्यारा आका पैगंबर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सिखाया हैं?

आज अज़ान की आवाज़ होती हैं तो कुछ घरों में टीवी की आवाज़ कम कर दी जाती हैं और कहते हैं की अज़ान हो रही हैं आवाज़ कम कर दो लेकिन अज़ान खत्म होते ही वापिस आवाज़ बढ़ा दी जाती हैं। ये सोच कर की अज़ान खत्म हो गयी हैं। ये नहीं सोचते की नमाज़ का वक़्त हो गया हैं। सभी काम छोड़ दिए जाये और नमाज़ कायम की जाये। आजकल के मुसलमानो के पास मोबाइल चलाने, वीडियो देखने, फिल्मे देखने, नाच गाने देखने का बहुत वक़्त हैं लेकिन अफ़सोस अल्लाह की इबादत के लिए सब बहाना बनाते हैं। जिस अल्लाह ने पूरी कायनात बनायीं जो रिज़्क़ दे रहा हैं। ज़िन्दगी दे रहा हैं। उसी के लिए लोगो के पास वक़्त नहीं रहा। इसका अंजाम क्या होगा आज हम देख ही रहे हैं। 

मुसलमानो पर कितनी मुसीबते आ रही हैं। मुसलमानो पर कई मुल्को में ज़ुल्म हो रहे हैं जैसे सीरिया,म्यानमार के हालत आप देख ही चुके हैं। बेगुनाह लोग मारे जा चुके हैं। इतने मुस्लिम मुल्क हैं दुनिया में लेकिन कोई मुसलमानो पर हो रहे ज़ुल्म के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाता। यही कमज़ोरी हैं मुसलमानो की ऐसा क्यों हो रहा है सोचने वाली बात हैं। मुसलमान आज इतना कमज़ोर हो गया हैं की लोगो की ग़ीबत उनसे नफरत के सिवा कुछ कर नहीं पा रहा। गलत कामो को करके हराम की कमाई खा रहा हैं। रिश्वत ले रहा हैं और दुनियावी मौजमस्ती को ही असली ज़िन्दगी समझ रहा हैं।

ऐ मुसलमानो दुनियादारी के चक्कर में अपनी आख़िरत को न भूलो। ये दुनियावी ज़िन्दगी तो एक दिन खत्म हो जाएगी। असली ज़िन्दगी इसके बाद ही शुरू होगी। अगर आपने खुदा के बताये रास्तों के मुताबिक काम किये और खुदा की इबादत में अपनी ज़िन्दगी निकाल दी हैं तो यकीनन आख़िरत का अंजाम बहुत अच्छा होगा और अगर आपने इसके खिलाफ काम किये तो यकीनन आख़िरत बहुत ही भयानक होगी। जिसके बारे में सोच कर ही रूह कांप जाये। सभी मुसलमानो को चाहिए की पाबन्दी से नमाज़ अदा करें। गलत कामों से बचे क्यूंकि ज़िन्दगी में भले ही आप बच जाओ लेकिन आख़िरत में अल्लाह के दरबार में नहीं बच पाओगे। आप कितने दिन ज़िन्दगी जी लोगे एक न एक दिन सभी को अल्लाह से सामना करना हैं और जो यह कहता हैं अल्लाह कुछ नहीं जो हैं यही ज़िन्दगी हैं। वह इंसान काफिर हैं। 

बहरहाल नमाज़े कायम करो। अल्लाह के बताये रास्तो पर अमल करो और बुरे कामो को करने से बचो आमीन 

आबे ज़मज़म कुँवें की कहानी और इस पानी की फ़ज़ीलत

Abe Zam Zam Ka Pani

खानए काबा से महज़ 20 मीटर दुरी पर ज़म ज़म का कुआँ स्थित हैं। जो लगभग 5000 साल से भी ज़्यादा पुराना हैं। इसका पानी आज तक न कभी सूखा हैं न ही कभी ख़राब हुआ हैं। सुभानअल्लाह ! हदीस में हैं की एक बार हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम अपनी बीवी हज़रत बीबी हाज़रा और बेटे हज़रत इस्माइल को एक बीहड़ रेगिस्तान में छोड़ कर चले गए थे। उसी वक़्त हज़रत इब्राहिम के बेटे हज़रत इस्माइल जो की उस वक़्त एक दूध पीते बच्चे थे को बहुत प्यास लगी, तभी उनकी माँ हज़रत बीबी हाज़रा पानी की तलाश में इधर उधर दौड़ने लगी। जबकि ऐसे बीहड़ रेगिस्तान में पानी का कही नामोनिशान नहीं था। तभी अचानक आपके बेटे हज़रत इस्माइल के पैरों की रगड़ से एक पानी का फव्वारा जारी हो गया। हज़रत बीबी हाजरा ने उसी चमत्कारिक फव्वारे से अपने बेटे की प्यास बुझाई और आपने भी वह पानी पिया। यही फव्वारा जो आज आबे ज़म ज़म के नाम से जाना जाता हैं।

रसूले कायनात सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया ज़मज़म का पानी मुबारक हैं। यह पानी भूके के लिए खाना और बीमार के लिए दवा हैं। इस पानी में बहुत बड़ी शिफा हैं। यही वजह हैं की अल्लाह के प्यारे रसूल सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम इसे हमेशा साथ ले जाते। इसलिए हज और उमराह के मुबारक सफर पर जाने वालों के लिए वहां से ज़म ज़म शरीफ का पानी लाना सुन्नत हैं।
हमारे प्यारे रसूल को यह पानी बहुत पसंद था। आपने मक्का शरीफ के मशहूर खतीब हज़रत सहल बिन अम्र को खत लिखकर आबे ज़म ज़म तलब फ़रमाया। चुनांचे आपने दो मश्क़े आबे ज़म ज़म से भरकर ऊंट पर लदवा कर मदीना शरीफ भिजवाई।

आज के इस दौर में रासायनिक परीक्षणों से यह मालूम हुआ हैं की

1.ज़म ज़म के पानी में ऐसी चीज़ मिली हुई हैं जिससे बदन की जलन व गर्मी दूर होती हैं।
2.ज़म ज़म का पानी उलटी, मतली और सरदर्द में बहुत फायदेमंद हैं।
3.ज़म ज़म का पानी बदन को नुक्सान पहुँचाने वाले जरासीम को ख़त्म कर देता हैं।
4.इस पानी के अंदर जो सोडियम हैं उससे पेट साफ़ होता हैं और कब्ज़ की शिकायत दूर होती हैं।
5.यह पानी गठिया की बीमारी में बहुत फ़ायदा देता हैं।
6.यह पानी शुगर, खुनी पेचिश, पथरी, खुनी मस्सो के मरीज़ो के लिए बहुत मुफीद हैं।
7.इस पानी के अंदर मौजूद सोडियम क्लोराइड खून को साफ़ करता हैं पेट के दर्द और कॉलरा (हैजा) में यह पानी पीना बेहद मुफीद हैं।
8.कोयले के धुंए की ज़हरीली गैस से होने वाली तकलीफ इस पानी से दूर हो जाती हैं यह पानी बदन की कमज़ोरी को भी दूर करता हैं।
9.इस पानी में कैल्शियम कार्बोनेट भी मौजूद हैं जो खाना हज़म करने और पाचन शक्ति को मज़बूत करने में मदद करता हैं।
11.यह पानी गर्मी में लू का असर भी खत्म कर देता हैं।
12.इसमें मौजूद पौटेशियम नाइट्रेट गुर्दे के लिए बेहद मुफीद हैं यह पानी पेशाब को साफ़ करता हैं।

क़यामत और उसकी निशानियां (Qayamat Or Uski Nishaniyan)

क़यामत का मतलब वह दिन जिस दिन पूरी दुनिया ख़त्म हो जाएगी। आज हम दुनिया की रंगो रौनक में ऐसे खो गए हैं की अपनी मौत और आख़िरत को भूल बैठे है। आज ...

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