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इस्लाम में जिहाद क्या हैं? (Islam me Jihad Kya Hain?)

Jihad Kya hain

आज के दौर में हमारे देश में जिहाद शब्द का इस्तेमाल काफी हो रहा हैं। लोग इस शब्द को लेकर तरह तरह की बातें बना रहे है और जिहाद की परिभाषा को गलत तरीके से पुरे देश और दुनिया के लोगों बता रहे हैं। आखिर इस्लाम में जिहाद हैं क्या? आज के ब्लॉग में हम इसी विषय पर चर्चा करेंगे की इस्लाम और जिहाद का क्या ताल्लुक हैं। 

इस्लाम में जिहाद क्या हैं?

आजकल के दौर में गैर मुसलमान जिहाद का मतलब लड़ाई, धोखा और किसी पर हमला ही समझते हैं। लेकिन क्या उन्हें मालूम हैं की हक़ीक़त में जिहाद की परिभाषा क्या हैं? हक़ीक़त में जिहाद का मतलब मेहनत, कोशिश करना,किसी चीज़ को पाने के लिए संघर्ष करना, ज़ुल्म के खिलाफ आवाज़ उठाना, इल्म हासिल करने के लिए हर मुसीबत का सामना करना यह जिहाद के मायने हैं। क़ुरान मजीद में जिहाद और जंग दोनों का बयान आया हैं और दोनों के मतलब अलग अलग हैं। इससे मालूम चलता हैं की हर जिहाद कोई जंग या युद्ध नहीं। 

जिहाद कई तरह का होता हैं जैसे की अगर कोई बेवजह इस्लाम के मानने वाले लोगो को परेशान कर रहा हैं उनको नुकसान पहुंचा रहा हैं और उन्हें मार रहा हैं ऐसे लोगो के खिलाफ जंग लड़ना जिहाद हैंके  इसका मतलब यह नहीं की किसी भी बेगुनाह या ऐसा जो नहीं कर रहा हैं उसके खिलाफ जंग की जायेके  जिहाद सिर्फ उनके लिए हैं जो दीन को नुकसान पहुँचाना चाहते हैं। इस्लाम यह इजाज़त देता हैं की अगर कोई आपके ऊपर हमला कर रहा हैं। आपके बीवी बच्चो को मार रहा हैं। आप को उससे अपने और अपने परिवार की जान का खतरा हैं तो आप ऐसे लोगो के खिलाफ जंग कर सकते हैं और अपना और अपने दीन का बचाव कर सकते हैं।एक और उदहारण लेते हैं की हमारे देश के सैनिको को पड़ोसी मुल्क के ज़ालिम सैनिक मार देते हैं उन पर बेवजह ज़ुल्म करते हैं तो ऐसे मुल्क के सैनिको के खिलाफ जंग लड़ना भी जिहाद हैं। 

हालाँकि हमारे देश और कई देशो में ऐसे ज़ुल्म के खिलाफ कानून बने हैं। हमें पहले उसी की मदद लेना चाहिए लेकिन अगर कानून किसी समय में आपकी मदद नहीं कर पाता हैं तो आप ऐसे ज़ुल्मी लोगो के खिलाफ आवाज़ उठा सकते हो जैसा की कई मर्तबा कुछ हमले और ऐसी घटनाएं अचानक हो जाती हैं। ऐसे समय में आप ही को अपनी जान बचाने के लिए दुश्मनो से सामना करना पड़ता हैं। ऐसे समय में इस्लाम इजाज़त देता हैं की आप ऐसे मौको पर दुश्मनो से लड़े और उनका सामना करे। इसकी इजाज़त सिर्फ इस्लाम में नहीं बल्कि कई और धर्मो में भी यह बात कही गयी हैं अगर ज़ुल्म बढ़ता ही जा रहा हैं और कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा हैं तो इन्हे रोकने के लिए जंग कर सकते हो। 

इस्लाम ने जिहाद की इजाज़त कब दी? 

उस दौर में मक्का में रहने वाले मुसलमानो पर ज़ालिम बहुत ज़ुल्म कर रहे थे और वहाँ के मुसलमान उस ज़ुल्म को बर्दाश्त कर रहे थे। ऐसा 13 साल तक चलता रहा।  ऐसे समय में मक्का के मुसलमानो को अपना घर व कारोबार छोड़ कर मदीना शरीफ जाना पड़ा।  मदीना पहुँचने के बाद भी ज़ालिमों ने वहां भी मुसलमानो पर ज़ुल्म शुरू कर दिया। ऐसे नाज़ुक मौके पर अल्लाह ने अपने मोमिन बन्दों को दीन के उन दुश्मनो से मुकाबला करने की इजाज़त नबी करीम सल्ललाहो अलैहि वसल्लम के ज़रिये दी। 

इजाज़त मिलने पर हज़ार हथियार बन्द पहलवानों से मुकाबला करने के लिए 313 मुजाहिद अपने रसूल सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के साथ बद्र के मैदान में पहुंचे। यह इस्लाम की पहली जंग थी और इस जंग में आपकी फतह हुई थी। अल्लाह के रसुल ने तलवार के ज़ोर से कभी इस्लाम नहीं फैलाया बल्कि दुनिया को तलवार के इस्तेमाल का सलीका सिखाया। उन्होंने बताया की ज़ुल्म को रोकने के लिए कभी कभी हथियार उठाना एक ज़रूरत ही नहीं बल्कि फ़र्ज़ बन जाता हैं।  

आपने फ़रमाया की जब ज़ालिम इंसानियत और धर्म को नुकसान पहुँचाने लगे और इंसानी जान माल की कोई कीमत न रह जाये ऐसे नाज़ुक वक़्त में सिर्फ ज़ुल्म को देखते रहना और घरो या इबादतगाहों में पनाह लेना कोई समझदारी की बात नहीं। ऐसे मौके पर ज़ुल्म के खिलाफ मैदान में उतर जाना और ज़ालिमों का सफाया करके पूरी दुनिया को सुकून और चैन का माहौल देना ही इंसानी फ़र्ज़ हैं। इस्लाम ने सिर्फ ऐसे मौको पर ही जिहाद की इजाज़त दी हैं।  

आजकल जो देखने को मिलता हैं की कुछ ग्रुप के लोगों ने इस्लाम के नाम पर बेगुनाह कुछ लोगों का गला काट दिया। औरतों पर ज़ुल्म किया उनके साथ गलत बर्ताव किया। ऐसे कामो और ऐसे लोगों का इस्लाम से कोई लेना देना नहीं। जो लोग पैगम्बर सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लमके बताई बातों के हिसाब से ज़ालिमों से लड़ता हैं। वही इस्लाम में जिहाद हैं। बेगुनाह लोगों को मारने की इजाज़त इस्लाम नहीं देता। इस्लाम सिर्फ उन्ही लोगों से लड़ने को कहता हैं जो आप पर ज़ुल्म कर रहे हो। 

आज हमारे देश में जिहाद को जो तरह तरह की नाम दिए जा रहे हैं इनका ज़िक्र कही भी क़ुरान में नहीं हैं। आज कुछ लोग हर गलत चीज़ को जिहाद से जोड़ रहे हैं। ऐसे लोगो से यही दरख्वास्त है की हर गलत चीज़ को इस्लाम से न जोड़े। जो गलत कर रहा हैं उसे इस्लाम ने यह करना नहीं सिखाया हैं। किसी की गलती को पुरे इस्लाम से जोड़ना बेवकूफी हैं। कौम के लोगों से गुज़ारिश हैं की कोई भी ऐसा गलत काम न करे जिससे दूसरे लोग सिर्फ आपके नाम को देखकर पुरे इस्लाम पर ऊँगली उठाये। बेशक आप अपने हक़ के लिए लड़ो, कामयाब बनो, देश और दुनिया में अपना और क़ौम का नाम रोशन करो, ज़रूरत पड़ने पर ज़ालिमों का ख़ात्मा करो यही असली जिहाद हैं।

इस्लामी सूरह और उन्हें पढ़ने के फायदे (Islami Surah or unhe Padhne ke Faide)

इस्लामी सूरह और उन्हें पढ़ने के फायदे (Islami Surah or unhe Padhne ke Faide)

 

आज के इस ब्लॉग आर्टिकल में हम आपको कुछ खास इस्लामी सूरह के बारे बताएँगे जिन्हें पढ़ कर आप अपनी ज़िन्दगी सुधार सकते हैं और काफी मुसीबतों से बच सकते हैं।  


सूरह आले इमरान 

जो आदमी क़र्ज़ से मुब्तला हो या कहे बहुत कर्ज़दार हो गया हो अगर वह रोज़ाना सात मर्तबा यह सूरह पढ़ेगा तो इंशाल्लाह वह उस क़र्ज़ से आज़ाद हो जायेगा और अल्लाह तआला क़र्ज़ से आज़ाद करने के बाद उसकी रोज़ी का इंतेज़ाम भी कर देगा। अगर आप क़र्ज़ से परेशान हैं तो इस सूरह को कसरत से पढ़े इंशाल्लाह आपकी यह मुसीबत दूर हो जाएगी। 

सूरह निसा 

अगर मिया बीवी में मनमुटाव हो गया है ये रिश्ते में दरार आ चुकी हैं तो इस सूरह को पानी पर दम करके अगर मिया बीवी को पिलाया जाये तो तो दोनों में फिर से मोहब्बत पैदा हो जाएगी और बिगड़ते रिश्ते सुधरने लग जायेंगे और आपसी मनमुटाव दूर हो जायेगा और इंशाल्लाह घर का माहौल फिर से खुशगवार हो जायेगा। 

सूरह आराफ़

इस सूरह को रोज़ कम से कम तीन मर्तबा पढ़ने वाला शख्स बालाओं और मुसीबतों से महफूज़ रहेगा। बड़ी से बड़ी आफत और मुसीबत उससे दूर रहेगी और बंदा शैतानी वस्वसे से भी दूर रहेगा। 

सूरह युसूफ 

अगर किसी को क़ुरान की कोई सूरह याद नहीं हो रही या कोई शख्स क़ुरान हाफिज बनना चाहता हैं तो उसे चाहिए की सबसे पहले सूरह युसूफ याद करे। इसकी बरकत से आपको पूरा क़ुरान मजीद याद हो जायेगा और हमेशा याद रहेगा। अगर किसी शख्स को बिना वजह से नौकरी से निकाल दिया गया हैं या गलत तरीके से उसे नौकरी छोड़ने के लिए मजबूर किया जा रहा हैं तो ऐसे शख्स को चाहिए की वह सूरह युसूफ रोज़ाना नमाज़ के बाद 13 मर्तबा पढ़े इंशाल्लाह उसकी नौकरी वापिस बहाल हो जाएगी और आगे भी नौकरी में कभी दिक्कत नहीं आएगी।

कोई गरीब आदमी या जिस के पास माल और दौलत खत्म हो रहा हैं और खाना पीना भी मुश्किल हो रहा हैं वह भी इस सूरह को पाबन्दी से रोज़ाना पढ़ कर अल्लाह से दुआ मांगे इंशाल्लाह उसकी गरीबी ख़त्म हो जाएगी। 

सूरह इब्राहिम 

अगर किसी शख्स पर जादू करके उसे नामर्द बना दिया गया हो या किसी की मर्दाना ताकत किसी वजह से ख़त्म हो गयी हो तो उसे चाहिए की वह रोज़ाना तीन बार यह सूरह पढ़े इंशाल्लाह जादू का असर खत्म हो जायेगा और उसकी मर्दाना ताकत वापिस बहाल हो जाएगी। 

सूरह बनी इसराइल 

घर में कोई बच्चा कमज़ोर दिमाग वाला हो या उसे बोलने में दिक्कत आती हो या बोल ही नहीं पाता हो और चीज़ो को समझ ही नहीं पाता हो तो मुश्क व ज़ाफ़रान से इस सूरह को लिख कर पानी में घोल कर पिए इंशाल्लाह बच्चा साफ़ बोलने लगेगा और उसका दिमाग एक नोर्मल बच्चे जैसा हो जायेगा। 

सूरह ताहा

अगर किसी लड़की का निकाह न हो रहा हो या निकाह में रुकावट आ रही हो ये यह सूरह दिन में 21 मर्तबा रोज़ पढ़े इंशाल्लाह जल्द ही अच्छे रिश्ते की खबर आएगी और नेक मर्द से उसकी शादी भी हो जाएगी और रिश्ते में भी आगे कोई रुकावट या नफरत पैदा नहीं होगी। 

सूरह मरियम और सूरह कौसर 

अगर किसी औरत के बच्चा ठहरने में दिक्कत आ रही हैं या किसी वजह या रुकावट से बच्चा न हो रहा हो तो ऐसी औरत को चाहिए की सूरह मरियम रोज़ाना एक मर्तबा वज़ू करके रोज़ पाबन्दी से पढ़े इसके साथ आप सूरह कौसर भी पढ़े इंशाल्लाह आपको जल्द ही खुशखबरी मिलेगी और बच्चा होने के वक़्त भी ज़्यादा तक़लीफ़ नहीं होगी। 

सूरह यासीन 

सूरह यासीन की फ़ज़ीलत के बारे में हमने एक पहले भी आर्टिकल लिखा हैं जिसे आप पढ़ सकते हैं हम वापिस इस सूरह को पढ़ने के फायदे के बारे में आपको बातएंगे। सूरह यासीन को क़ुरान का दिल कहा जाता है। इसे क़ुरान में सबसे बेहतरीन और बरकत वाली सूरह में शुमार किया जाता हैं। इसे पढ़ने के काफी सारे फायदे हैं जो इस तरह है,

  • अगर आप किसी मुसीबत में फंस चुके हो और कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा हो तो सूरह यासीन पढ़े इंशाल्लाह आपकी मुसीबत आसानी से दूर हो जाएगी। 
  • अगर किसी औरत के बच्चा होने के आखरी महीने में अगर आप चाहते हो की उसे कोई परेशानी न हो या कहे बच्चे की डिलीवरी आसानी से बिना किसी खतरे के हो जाये तो आपको चाहिए की यासीन शरीफ पानी पर दम करके वह पानी उस औरत को पिला दे इंशाल्लाह बच्चे की डिलीवरी आसानी से हो जाएगी। 
  • अगर आपका कोई दुश्मन हैं जो आपको मारना चाहता हैं या आपको परेशान करना चाहता हैं तो आप जुमे के दिन फज्र की नमाज़ के बाद एक मर्तबा यासीन शरीफ पढ़े और ऐसे लोगो से बचने की दुआ मांगे इंशाल्लाह वह दुश्मन आप के आस पास भी नहीं भटकेगा। 
  • सूरह यासीन को पढ़ने से बीमारी में भी शिफा हासिल होती है और इसको पाबन्दी से पढ़ने वाला शख्स कभी किसी गंभीर बीमारी का शिकार नहीं होता। 

सूरह बक़रह 

यह क़ुरान पाक की सबसे बड़ी सूरह हैं इसे पढ़ने का सवाब तो ही साथ ही साथ यह सूरह आपको काफी मुसीबतों और परेशानियों से भी बचाती हैं। जो शख्स इस सूरह को दिन में एक बार अगर दिन में न हो सके तो हफ्ते में एक बार इस सूरह को दिल से पढ़ता हैं तो उस शख्स की उम्र में बरकत होती हैं। अगर आपके घर पर या आस पास ज़हरीले जानवर जैसे सांप या कुछ और जिससे जान को खतरा हैं तो आपको चाहिए की सूरह बक़रह पढ़ कर पानी में दम करके उसमे थोड़ा और पानी मिलकर किसी बोतल में भर ले और वह पानी घर के चारो और जहाँ से जानवर घर में घुसता हैं वहां वह पानी थोड़ा थोड़ा डाले इंशाल्लाह घर में कभी कोई ज़हरीला जानवर नहीं घुसेगा। 

सूरह बक़रह आपको जादू टोन से भी बचाता है आप अगर कही जा रहे है और आपको लगता है यह जगह सही नहीं हैं मतलब उस जगह शैतान हवा में घूमते हैं तो आपको चाहिए की सूरह बक़रह पढ़ कर जाये तो आप शैतानी वसवसे से दूर रहेंगे और कोई जादू टोना आप पर असर नहीं करेगा। इसके अलावा भी इस सूरह के काफी फायदे हैं जो इंशाल्लाह हम आपको अगले आर्टिकल में बताने की कोशिश करेंगे।

अल्लाह हाफिज  

नफ़्ल नमाज़े और उसकी बरकतें (Nafl Namaze or Uski Barkaten)

नफ़्ल नमाज़े और उसकी बरकतें (Nafl Namaze or Uski Barkaten)

 

इस्लाम में पांच वक़्त की जो नमाज़े फ़र्ज़ हैं उन्हें तो अदा करना ही हैं अगर यह नमाज़े अदा नहीं करेंगे तो बेशक आप गुनहगार होंगे। इन पांच वक़्त की नमाज़ो के अलावा कुछ ऐसी नफ़्लें नमाज़े भी भी हैं जिन्हे अगर आप पाबन्दी से अदा करते हैं तो आप बेशक अल्लाह के महबूब बन्दे बन जायेंगे। एक हदीस की मुताबिक जो शख्स जो पांच नमाज़े फ़र्ज़ हैं उनके अलावा नफ़्ल नमाज़े भी पाबन्दी से अदा करता हैं। अल्लाह पाक ऐसे शख्स को हर मुसीबतो से बचाता हैं। उसके अलावा ऐसे शख्स को बेशुमार नेमतें हासिल होती हैं। 

इसलिए आज के इस आर्टिकल में हम आपको कुछ ऐसी नफ़्ल नमाज़ो में बारे में बताने वाले हैं जिनकी बरकत से अल्लाह पाक अपने बन्दे पर खास करम फरमाता हैं। इन नमाज़ो को अदा करने वाला शख्स हर बलाओं से महफूज़ रहता हैं। चलिए बात करते हैं इन खास नफ़्ल नमाज़ो के बारे में, 

तहियतुल वज़ू 

तिर्मिज़ी शरीफ की हदीस हैं अल्लाह के प्यारे रसूल ने फ़रमाया ! जो शख्स अच्छी तरह वज़ू करके दो रकात नमाज़ तहियतुल वज़ू पढ़ेगा उसके लिए जन्नत वाजिब हो जाती हैं और उसे दुनियावी ज़िन्दगी में बेशुमार नेअमतें हासिल होती हैं। 

इशराक की नमाज़ 

जो शख्स फज्र की नमाज़ जमाअत से अदा करके वहीं बैठा रहे और अल्लाह का ज़िक्र करता रहे यानि तिलावत, दरूद शरीफ, तस्बीह वगैरह पढ़ता रहे और सूरज निकलने के कुछ देर बाद 2 रकात नमाज़ नमाज़े इशराक पढ़े तो ऐसे शख्स को एक हज या उमरा का सवाब हासिल होता हैं। 

चाश्त की नमाज़

यह नमाज़ भी मुस्तहब नफ़्ल हैं। अल्लाह के प्यारे रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया जो शख्स चाश्त की 2 रकात नमाज़ दिन निकलने के एक घंटे बाद बाद पढ़ेगा। उसके गुनाह बख़्श दिए जायेंगे। 

तहज्जुद की नमाज़

यह नमाज़ हमारे प्यारे रसूल पर फ़र्ज़ थी। हमारे लिए सुन्नत हैं। इस नमाज़ में कम से कम 2 रकअतें और ज़्यादा से ज़्यादा 8 रकअतें होती हैं। इसका वक़्त ईशा की नमाज़ के बाद थोड़ी देर सो जाने के बाद आंख खुलने पर होता हैं। मतलब यह की इस नमाज़ को अदा करने के लिए ईशा की नमाज़ के बाद थोड़ी देर सोना ज़रूरी है। जब सेहरी के बीच के वक़्त में आंख खुले तो उस दौरान यह नमाज़ अदा करें। कहने के मतलब इस नमाज़ का वक़्त ईशा की नमाज़ के बाद से सेहरी के वक़्त तक रहता हैं। इस नमाज़ को हमेशा पढ़ने वाला शख्स अल्लाह के बहुत करीब रहता हैं। उसे बेशुमार फायदे हासिल होते हैं और वह हर परेशानियों और मुसीबतों से महफूज़ रहता हैं।

सालतुल तस्बीह

यह नमाज़ बड़ी बरकत वाली नमाज़ हैं। एक हदीस में आया हैं की अल्लाह के प्यारे रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने चाचा हज़रत अब्बास से फ़रमाया की अगर हो सके तो यह नमाज़ रोज़ पढ़ो रोज़ न पढ़ सको तो हफ्ते में एक बार पढ़ो अगर ये भी नहीं हो सके तो महीने या साल में एक बार अगर वो भी नहीं तो ज़िन्दगी में एक बार ज़रूर पढ़ना चाहिए। प्यारे रसूल ने इस नमाज़ को पढ़ने के लिए कितना ज़ोर दिया हैं ये आप समझ सकते हो और ये भी समझ सकते हो की अगर प्यारे रसूल ने इस नमाज़ को पढ़ने के लिए इतना ज़ोर दिया हैं तो यह नमाज़ कितनी बरकत वाली नमाज़ होगी। इसका अंदाज़ा आपकी कही बातों से लगाया जा सकता हैं। 

सालतुल तस्बीह नमाज़ का तरीका 

4 रकात नफ़्ल नमाज़ की नियत करे और नियत करने के बाद 15 बार सुब्हानल्लाहे वल्हम्दुलिल्लाहे व लाइलाहा इल्लल्लाहो वल्लाहो अकबर पढ़े अल्हम्दो और सूरत पढ़ने के बाद रुकू में जाने पहले यही तस्बीह 10 बार पढ़े रुकू में सुब्हान रब्बियल अज़ीम पढ़ लेने के बाद 10 बार रुकू से उठने के बाद सजदे में जाने से पहले 10 बार सजदे में जाने पर सुब्हान रब्बियल आला पढ़ लेने के बाद 10 बार फिर दूसरे सजदे में 10 बार यही तस्बीह पढ़े इस तरह हर रकात में 75 बार यह तस्बीह पढ़ी जाएगी और 4 रकात में 300 बार हो जाएगी।

नमाज़े हाजत

अबू दाऊद की हदीस है, हज़रत हुज़ैफ़ा रदियल्लाहो अन्हो का बयान हैं जब अल्लाह के रसूल का कोई अहम मामला पेश आ जाता या कोई मुसीबत या मुश्किल आ जाती तो इसके लिए आप दो या चार रकात नमाज़ अदा फरमाते। पहली रकात में सूरह फातेहा के बाद 3 मर्तबा आयतल कुर्सी, दूसरी में अल्हम्दो शरीफ के बाद एक बार कुल हुवल्लाह शरीफ, तीसरी में सूरह फ़लक़ और चौथी में सूरह नास पढ़ते और फिर नमाज़ के बाद अपनी हाजत के लिए दुआ मांगते जिसकी बरकत से अल्लाह पाक आपकी हर मुश्किल आसान फरमा देता।

अल्लाह पाक हम सबको पाबन्दी से नमाज़ अदा करने और इस्लामी शरीयत पर चलने की तौफीक अता फरमाए ताकि हम हमारी आख़िरत को सुधार सके आमीन । 

नमाज़ से जुड़े कुछ ज़रूरी मसाइल (Namaz ke Masail)

नमाज़ से जुड़े कुछ मसाइल (Namaz ke Masail)

 

आज के इस आर्टिकल में हम आपको नमाज़ से जुड़े कुछ मसाइल के बारे में बताएँगे। आप इन बताई गयी बातों को गौर से पढ़े और उस पर अमल करने की कोशिश करे और दुसरो भाइयों और बहनो को भी बताएं।


  • नमाज़ पढ़ने के लिए बदन का पाक साफ़ होना बहुत ज़रूरी हैं। नापाकी में नमाज़ पढ़ना गुनाहे कबीरा हैं।
  • जिस भी जगह नमाज़ पढ़ी जा रही है उस जगह का पाक होना ज़रूरी हैं। गीली या गन्दी जगह पर नमाज़ अदा न करे।
  • अस्सलामो कहते ही नमाज़ ख़त्म हो जाती हैं इसलिए अगर कोई आदमी इमाम के अस्सलाम कहते वक़्त जमाअत में शरीक हुआ तो नमाज़ नहीं होगी। 
  • नमाज़ शुरू करने से पहले उस नमाज़ की नियत करना बहुत ज़रूरी हैं। जो भी नमाज़ पढ़ रहे हैं उसकी नियत ज़रूर करे जैसे फज्र, ज़ोहर, मगरिब वगैरह। 
  • नमाज़ पूरी करने के लिए अस्सलामो अलैकुम व रहमतुल्लाह कहना सुन्नत हैं। 
  • अस्सलाम कहना वाजिब हैं अलैकुम कहना वाजिब नहीं। 
  • सुन्नत यह हैं की इमाम दोनों सलाम बुलंद आवाज़ से कहे लेकिन दूसरा सलाम पहले सलाम से कुछ आहिस्ता आवाज़ में कहे।
  • दाहिनी तरफ सलाम फेरने पर चेहरा इतना घूमना चाहिए की पीछे वालों के दाहिने रुखसार (गाल) नज़र आये और बाईं तरफ फेरने पर बाएं गाल नज़र आये। 
  • नमाज़ के बाद हाथ उठा कर दुआ मांगना और दुआ के बाद मुँह पर हाथ फेरना भी सुन्नत हैं। 
  • दुआ मांगते वक़्त दोनों हाथ बिलकुल मिले हुए न हो दोनों हाथो के बीच थोड़ा फ़ासला होना चाहिए।
  • नमाज़ में अंगड़ाई लेना और बार बार उबासी लेना मकरूहे तंज़ीही हैं। 
  • नमाज़ पढ़ने से पहले अच्छी तरह वज़ू करले। खासकरके मुँह को अच्छे से साफ़ करले नमाज़ के वक़्त बीड़ी सिगरेट तम्बाकू की बदबू आना मकरूह हैं। 
  • नमाज़ के दौरान अगर टोपी सर से गिर जाये तो एक हाथ से उठा कर सर पर रख लेना अफ़ज़ल हैं। दोनों हाथो से उठाना मकरूहे तहरीमी हैं। लेकिन कोशिश करे की टोपी बार बार न गिरे इससे नमाज़ से ध्यान भटकता है। 
  • नमाज़ के दौरान इधर उधर न देखे आपका पूरा ध्यान नमाज़ में होना चाहिए।
  • नमाज़ में सजदे के दौरान घुटनो के ज़मीन पर टिकने से पहले अपने हाथ ज़मीन पर रखना भी मकरूहे तन्ज़ीही हैं। 
  • नमाज़ में सजदे के दौरान अपने पैरों की अँगुलियों को उल्टा पीछे करना भी मकरूहे तन्ज़ीही हैं। 
  • सजदे के दौरान कम से कम एक अंगुली का ज़मीन से टिका होना फ़र्ज़ हैं। तीन अँगुलियों का टिका होना वाजिब और सारी अँगुलियों का टिका होना सुन्नत हैं। 
  • सजदा या रुकू की हालत में तीन बार से कम तस्बीह पढ़ना मकरूह हैं इसलिए जल्दबाज़ी कभी नमाज़ न पढ़े। 
  • सजदा करने पर अगर पेशानी पर धुल या घास वगैरह लग जाये तो उसे हटाना मकरूह हैं लेकिन अगर उसकी वजह से कुछ खुजली या जलन जैसा हो रहा हैं तो हटाने में हर्ज़ नहीं। 
  • फ़र्ज़ की एक रकात में किसी एक आयत या सूरत को बार बार पढ़ना मकरूह हैं लेकिन अगर उसके अलावा कुछ याद न हो तो कोई हर्ज़ नहीं। 
  • आँख बंद करके नमाज़ पढ़ना भी मकरूह हैं। 
  • घर पर भी नमाज़ अदा करे इससे शैतान का साया घर पर कभी नहीं आता। 


अल्लाह हम सबको पांच वक़्त की नमाज़ पाबन्दी से पढ़ने की तौफीक अता फरमाए और अल्लाह की बताई बातों और हदीसों पर अमल करने की तौफीक अता फरमाए आमीन 


इस्लामी शरीयत के कुछ ज़रूरी नियम और तौर तरीके

इस्लामी शरीयत के कुछ जरूरी नियम और तौर तरीके

इस्लामी तौर तरीके में कुछ ऐसे अल्फ़ाज़ मुकर्रर हैं जो इस्लामी अहकाम बयान करने के दौरान काम में लिए जाते हैं। अच्छे काम करने पर सवाब और बुरे काम करने पर अज़ाब मिलता हैं। नेक कामो की भी कई किस्मे हैं जो इस तरह है, 

पहला फ़र्ज़ 

दूसरा वाजिब 

तीसरा सुन्नते मुवक्किदह

चौथा सुन्नते गैर मुवक्किदह 

पांचवा मुस्तहब 

और आख़री मुबाह 

चलिए नेक कामों की इन किस्मों को थोड़ा तफ्सील से समझते हैं। 

फ़र्ज़ 

इस्लाम में जो चीज़े फ़र्ज़ है। इसका मतलब यह हैं की वह काम करना बहुत ज़रूरी हैं जिसका फ़र्ज़ होना क़ुरान और हदीस से साबित होता हैं। जैसे नमाज़, रोज़ा, हज, ज़कात वगैरह इनके फ़र्ज़ होने का इंकार करने वाला काफिर हो जाता हैं और जो आदमी बिना किसी शरई मज़बूरी के यह काम नहीं करता उसे फासिक (गुनाहगार) कहा जाता हैं। फ़र्ज़ इबादतों कामो से लापरवाही बरतना गुनाहे कबीरा हैं। ऐसा आदमी जहन्नम का हक़दार होता हैं। 

वाजिब 

वह काम जिनका करना भी ज़रूरी है जैसे ईद, बकरा ईद की नमाज़ पढ़ना सदक़ा खैरात और फितरा वगैरह करना। इसका इंकार करने वाला गुमराह और बदमज़हब होता हैं। बिना किसी शरई मज़बूरी के इसे छोड़ने वाला या इसे न करने वाला फासिक और जहन्नम के अज़ाब का हक़दार हैं। 

सुन्नते मुवक्किदह 

शरीयत में जिन कामो को सुन्नते मुवक्किदह कहा गया है उसे करना भी ज़रूरी हैं और बड़े सवाब का काम हैं। सुन्नते मुवक्किदह मुस्तफा जाने रहमत सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के किये वह काम हैं जिसे आपने हमेशा किया हो या कभी कभार छोड़ भी दिया हो। इसलिए इसे करना भी ज़रूरी हैं। छोड़ने वाले से अल्लाह व रसूल नाराज़ होते हैं और जो बिलकुल छोड़ दे वह जहन्नम के अज़ाब का हक़दार होगा। सुन्नते मुवक्किदह का हुक्म वाजिब के करीब करीब हैं। 

सुन्नते गैर मुवक्किदह 

वह काम जिसे हमारे आका ने कभी कभी किया हो और कभी कभी बिना किसी शरई मज़बूरी में न भी किया हो। इस पर अमल करने वाला सवाब का हक़दार होता हैं और न करने पर कोई अज़ाब नहीं हैं जैसे असर और ईशा में फ़र्ज़ से पहले 4 सुन्नते न पढ़ना।  

मुस्तहब 

वह नेक काम जिसे करने को अच्छा माना गया हो और न करने को बुरा भी न समझा जाता हो। 

मुबाह 

इसका दूसरा नाम जायज़ हैं। वह काम जिसका करना या न करना दोनों बराबर हो करने पर कोई सवाब नहीं और न करने पर कोई गुनाह नहीं। 


दूसरी तरफ इस्लामी तौर तरीको में कुछ ऐसे काम भी हैं जिन्हें करने को मना किया गया हैं इन कामों को करने वाले शख्स को इनसे बचना चाहिए यह गलत या बुरे काम कुछ इस तरह हैं 

हराम काम 

इस्लामी शरीयत में जिन कामों को करने से मना किया गया हैं उसे हराम कहा गया हैं। उससे बचना और दूर रहना बहुत ज़रूरी हैं। वह काम जिनका हराम होना क़ुरानहदीस से साबित हो। उससे इंकार करने वाला काफिर हैं। और एक मर्तबा भी करने वाला फासिक (गुनहगार) हो जाता हैं। ये काम कुछ इस तरह हैं जैसे शराब पीना जुआ खेलना सूद खाना, नाच गाने में शौक रखना, खुदखुशी करना वगैरह काम हराम हैं। इससे बचने वालो को सवाब मिलता हैं और इन कामो को करने वाला बहुत बड़ा गुनहगार हैं। 

मकरूहे तहरीमी 

उन कामो से बचना बेहद ज़रूरी हैं जिन्हे मकरूहे तहरीमी करार दिया जा चूका है। इनका गुनाह हराम से कम हैं लेकिन लगातार करते रहने वाला गुनाहे कबीरा व सज़ावार हो जाता हैं। जिसकी सजा जहन्नम का अज़ाब हैं इसका एक उदाहरण जैसे नमाज़ के वक़्त इधर उधर देखना। 

मकरूहे तन्ज़ीही 

जिन कामो को इस्लामी शरीयत में अच्छा नहीं माना गया हैं इसे मकरूहे तन्ज़ीही कहा जाता हैं। इसे कर गुजरने पर कोई गुनाह नहीं लेकिन आदत बना लेना भी अच्छा नहीं। इसका एक उदाहरण जैसे सुस्ती से बोझ समझ कर नमाज़ पढ़ना। 

ख़िलाफ़े औला 

वह काम जिसे करना तो नहीं चाहिए था लेकिन अगर कर दिया तो गुनाह नहीं जैसे एक वुज़ू से कई नमाज़ पढ़ना। 


अल्लाह हम सभी को इस्लामी तौर तरीको पर चलने की तौफीक अता फरमाए आमीन। 

अच्छी इस्लामी और दीनी बातें (Acchi Islami or Deeni Baatein)

अच्छी इस्लामी और दीनी बातें (Acchi Islami or Deeni Baatein)

आज के आर्टिकल में हम कुछ और अच्छी दीनी और इस्लामी बातों पर नज़र डालेंगे इससे पहले भी हम एक आर्टिकल में कुछ दीनी और इस्लामी बातों को बता चुके हैं आज फिर हम कुछ और इस्लामी बातों के बारें में आप को बताएँगे। आपसे गुज़ारिश हैं की इन सब बातों पर आप गौर करे और जो बताया जा रहा हैं उसे अच्छे से पढ़े और समझे और ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को बताएं। 

  • रमज़ान के रोज़े फ़र्ज़ हैं जो शख्स इसके फ़र्ज़ होने से इंकार करे वह काफिर हैं।
  • रमज़ान का रोज़ा छोड़ देना इतना भारी हैं की सारी उम्र रोज़ा रखने के बाद भी उसका हक़ अदा नहीं होगा। 
  • जो लोग रोज़े में होने के बावजूद झूठ, चुगली और किसी की ग़ीबत करते हैं ऐसे लोग रोज़े के सवाब के हक़दार नहीं होते। 
  • अल्लाह को ऐसे लोग बहुत प्यारे लगते है जो रमज़ान के महीने में ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को रोज़ा इफ्तारी करवाते हैं। 
  • जो शख्स अपने दीनी भाई और बहनो की बख्शीश के लिए दुआ करता हैं। अल्लाह पाक उसे इसके बदले में ढेर सारी नेकी अता फरमाता हैं।
  • रमज़ान के महीने में ज़्यादा से ज़्यादा ज़कात देने वाले लोगों के घरो में कभी पैसो की तंगी नहीं आती हैं। 
  • जब दो मुसलमान मिलते हैं और सलाम व मुसाफहा के बाद दुरूद शरीफ पढ़ते है तो उनके अलग होने से पहले ही उनके गुनाह बख्श दिए जाते हैं। 
  • किसी ज़रूरतमंद दीनी भाई को क़र्ज़ देने वालो को उससे दो गुना खैरात करने जितना सवाब हासिल होता हैं। 
  • किसी का दिल खुश करना भी एक तरह की इबादत हैं। 
  • सलाम का जवाब देना, किसी बीमार की खैरियत मालूम करना, जनाज़े में शरीक होना, किसी की दावत कबूल करना इस्लामी हक़ हैं। 
  • किसी के घर जाओ तो तीन बार उनसे अंदर आने की इजाज़त लो अगर तीनो मर्तबा इजाज़त न मिले तो वापिस चले जाओ। 
  • अपने इलाके या शहर के गरीबो के घरों पर नज़र ज़रूर रखो। ज़रूरत होने पर जो ज़रूरत की चीज़े हैं जितना हो सके उतना उन्हें दे दो। यह भी एक तरह की इबादत हैं।
  • हराम पैसो से ख़रीदे कपड़ो में नमाज़ कबूल नहीं होती। 
  • किसी की तकलीफ दूर करने वाले, नबी को सुन्नत को ज़िंदा रखने वाले और नबी पर दरूद भेजने वाले क़यामत के दिन अर्शे इलाही के साये में रहेंगे। 
  • ऐसे वलिमों में जाना बहुत बुरा हैं जहाँ सिर्फ मालदारों को बुलाया जाता हैं और गरीब को न बुलाया जाये। 
  • अगर किसी शख्स से दीन की कोई बात पूछी जाये और वह जानते हुए भी जान बुझ कर छुपाये तो क़यामत में ऐसे शख्स के मुँह में आग लगा दी जाएगी। 
  • माँ बाप की खिदमत करना, अपने हक़ के लिए लड़ना, कमज़ोर गरीब लोगों के लिए लड़ना और किसी का घर आबाद करना भी जिहाद हैं । 
  • अपने भाई को मुसीबत में होने पर खुश होने वाला शख्स किसी न किसी दिन उससे भी बड़ी मुसीबत में पड़ जायेगा। 
  • जिस घर में सूरह बकर: पढ़ी जाती हैं उस घर में कभी शैतान नहीं आता।
  • बड़े भाई का हक़ छोटे भाई पर वैसा ही हैं जैसा बाप का हक़ अपने बेटे पर। 
  • जिसने किसी यतीम लड़की की अच्छी परवरिश करके उसकी शादी अच्छे घर में कर दी ऐसा शख्स अल्लाह के बहुत करीब रहेगा।
  • झूठी गवाही देना शिर्क के बराबर हैं। 
  • जो लोग अपने रिश्तेदारों के घरों में हो रहे झगड़ो को देखकर खुश होते हैं। ऐसे लोगों का नसीब कभी नहीं चमकता। 
  • शिर्क के बाद सबसे बड़ा गुनाह माँ बाप की नाफरमानी करना हैं। 
  • अमामा (साफा) बांध कर नमाज़ पढ़ने से 25 गुना ज़्यादा सवाब हासिल होता हैं।
  • अगर रोज़ी में बरकत चाहते हो तो माँ बाप और रिश्तेदारों से अच्छा बर्ताव करो।
  • जो आदमी रोज़ाना कलमए तैयबा ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुर्रसूल्लाह 100 मर्तबा पढ़ेगा उसका चेहरा क़यामत के दिन चाँद की तरह रोशन होगा। 
  • जो आदमी भूक की हालत में यासीन शरीफ पढ़ेगा। अल्लाह पाक उसकी ज़िन्दगी को रोशन कर देगा।

तलाक क्या हैं? क्यों, कब, और कैसे दें? (Talak Kya hain? Kab or Kaise De)

तलाक क्या हैं? क्यों, कब, और कैसे दें?

मिया बीवी या पति पत्नी के बीच किसी वजह से हो रहे मनमुटाव या झगड़े की वजह से उनके बीच के रिश्ते को तोड़ने को तलाक कहा जाता हैं। सीधी ज़बान में कहे तो मिया बीवी के बीच के रिश्ते को ख़त्म करने उसे तोड़ने को तलाक कहा कहा जाता है। इस्लाम में तलाक को जायज़ करार दिया हैं क्यूंकि तलाक एक ऐसा फैसला हैं जिसमें अगर मिया बीवी दोनों आपस में साथ रहने से खुश नहीं हैं तो इस्लाम उन्हें इजाज़त देता हैं की आप तलाक लेकर एक दूसरे के बिना भी ख़ुशी से रह सकते हैं। क़ुरान और हदीस की रौशनी में तलाक का बयान काफी तफ्सील में बताया गया हैं। लेकिन आजकल के दौर में तलाक को मर्दो ने एक दस्तूर सा बना लिया हैं। उन्हें पता ही नहीं की तलाक़ कब देना हैं? और क्यों देना हैं? आजकल के मर्द जब मर्ज़ी चाहे तलाक दे देते हैं, ये भी नहीं सोचते की इससे एक औरत की किस तरह ज़िन्दगी बर्बाद हो सकती हैं। 

क्यों होते हैं इतने तलाक?

तलाक एक ऐसा शब्द बन गया हैं जिससे मर्द इस शब्द का फ़ायदा उठा कर औरत पर ज़ुल्म करता हैं। मर्द को जब औरत पर गुस्सा आता हैं या कहे किसी बात से पर औरत से झगड़ा हो जाता हैं तो वह इस तलाक शब्द का इस्तेमाल करके औरत को डराता हैं। उसे लगता हैं की यह शब्द अगर बोल दिया तो ये चुप हो जाएगी और मुझ से बहस नहीं करेगी। आजकल सुनने में आता हैं की बीवी ने अच्छा खाना नहीं बनाया तो तलाक़ दे दिया। मायके में ज़्यादा रुक गयी तो पोस्ट कार्ड से तलाक भेज दिया और न जाने कैसी कैसी तलाक की वजह सुनने में आती हैं जिसे सुनकर हैरत होती हैं की इतनी छोटी सी बात पर तलाक दे दिया। 

हम मानते हैं की मिया बीवी में कभी कभी मनमुटाव हो जाते हैं। उसकी कुछ भी वजह हो सकती हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं की एकदम से तलाक देकर अपने रिश्ते को ख़त्म कर दिया जाये। जो लोग ऐसे मज़ाक में या छोटी छोटी बातों पर तलाक दे देते हैं उन पर अल्लाह की बहुत लानत बरसती हैं। ऐसे लोग गुस्से में तलाक तो दे देते मगर कुछ देर बाद या कुछ दिनों बाद अपने द्वारा लिए तलाक के फैसले को लेकर पछताते हैं। तलाक कोई मामूली बात नहीं हैं बल्कि यह ज़िन्दगी का एक बहुत भयानक हादसा हैं। जायज़ कामों में अल्लाह को सबसे ज़्यादा नापसंद काम तलाक है। एक बार में ही तीन तलाक देने वालों पर अल्लाह तआला ने लानत फ़रमाई हैं। क़ुरान और हदीस की रौशनी में तलाक के बारे में बड़ा तफ्सील से बयान दिया गया हैं। 

तलाक देने का तरीका 

तलाक का शरई तरीका ये है की अगर किसी बात से शौहर बीवी में झगड़ा हो जाये या शौहर फैसला कर ले की अब बीवी के साथ नहीं रहना है तो एक बार ठन्डे दिमाग से सोचे और आपस में सुलह की कोशिश करे। अगर तलाक ही चाहिए तो उसका तरीका यह है की जब बीवी हैज़ (औरत का मासिक धर्म) से पाक हो जाये तो उसे एक तलाक दे दे, हो सकता हैं बीवी अपनी गलती सुधार ले या आदमी का गुस्सा ठंडा हो जाये और दोनों वापिस एक हो जाना चाहे। 

एक तलाक देने की सूरत में शौहर अगर चाहे तो बिना निकाह किये उसे दोबारा रख सकता हैं। अगर फिर भी तलाक ही चाहते हैं तो दोबारा जब औरत दूसरे मासिक धर्म से पाक हो जाये तो फिर दूसरा तलाक दे दे। अब भी अगर शौहर और बीवी दोनों एक साथ रहना चाहते हैं तो शौहर इद्दत के अंदर या उसके बाद बीवी की मर्ज़ी से उसे वापिस रख सकता हैं। उसके बावजूद भी अगर तलाक ही एक आखरी फैसला हैं तो तीसरे महीने औरत जब महावारी से पाक हो जाये तो आखरी तलाक दे दें तो उस केस में तलाक हो जाती हैं। इस तरह यह तीन तलाकें हो गयी। अब बीवी शौहर के लिए हराम हो गयी। अब अगर वह साथ में रहना चाहते हैं तो इस्लाम में एक रास्ता बताया हैं जिसे हलाला कहते हैं। लेकिन यह इतना शर्मनाक और वाहियात तरीका हैं की कोई भी मर्द उसे सोच कर अपनी बीवी को कभी तलाक देने का ख्याल अपने मन में नहीं लाएगा।

हलाला क्या हैं ?

रसुलल्लाह सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम फरमाते हैं हलाला करने वाले और हलाला कराने वाले दोनों पर अल्लाह की लानत हैं। हलाला यह हैं की तलाक पाने के बाद औरत इद्दत के दिन पुरे करे और फिर किसी और मर्द से निकाह कर ले और उसके साथ रहे। उसका दूसरा शौहर उससे हमबिस्तरी करे। फिर अगर वह चाहे तो अपनी ख़ुशी से उसे तलाक दे सकता हैं। इस तरह औरत दूसरे शौहर की इद्दत गुज़ार कर अब अगर चाहे तो पहले शौहर से फिर से निकाह कर सकती हैं। ज़रा सोचिये कौन गैरत मंद मर्द ऐसा चाहेगा की उसकी बीवी किसी और के साथ हमबिस्तरी करे। ऐसे मर्दो को तलाक से पहले यह भी सोचना चाहिए आपकी बीवी एक पराये मर्द के साथ कैसे वह सब चीज़े करेगी? क्या बीतेगी उस औरत पर? आखिर तलाक जैसा कदम उठाया ही क्यों जाये अगर दोनों आपस में वापिस से रहना चाहते हैं। क्यूंकि हलाला में बिना हमबिस्तरी करे अगर तलाक दे दिया तो वह हलाला नहीं माना जायेगा। इस केस में बीवी अपने पहले शौहर से निकाह नहीं कर सकती। 

तलाक को लेकर हमारी नसीहत 

मिया और बीवी के पाक रिश्ते की कद्र की जाये और गुस्से में या नादानी में तलाक जैसा कदम न उठाये की बाद में पछताना पड़े। यह भी हो सकता है मिया और बीवी दोनों में से कोई एक ख़राब हो। मतलब उसमे काफी बुराई मौजूद हो या फिर दोनों ही एक जैसे हो। दोनों आपस में ही एक दूसरे को पसंद नहीं करते हो या ऐसा हो की औरत के रंग मिज़ाज,अख़लाक़ सही नहीं हो या आदमी शराबी, मवाली या औरत को मारता पीटता हो। इस केस में अगर आपस में रिश्ता नहीं बन रहा हो तो फिर आप तलाक ले सकते हैं। 

लेकिन अगर ऐसा कुछ नहीं हैं तो फिर तलाक का फैसला लेते समय दस बार सोचे और फिर अपना फैसला ले क्यूंकि यह ज़िन्दगी ख़राब करने वाला फैसला हैं। ऐसा फैसला लेने से पहले आपसी रिश्ते सुधारें।आपसी झगडे को ख़त्म करे। रिश्तेदारों से पहले सलाह मशवरा ले तब जाकर तलाक का फैसला लिया जाये। मिया बीवी दोनों को चाहिए की आपस में मिलजुल कर रहे। एक दूसरे से ज़बान दराज़ी से न करे। दोनों में से कोई एक गुस्से में कुछ बोल रहा है तो दूसरा चुप हो जाये क्यूंकि ख़ामोशी ऐसी चीज़ है जो बिगड़ते रिश्तो को वापिस जोड़ सकती है। हमारी हर मर्द और औरत मिया बीवी से यही गुज़ारिश हैं की आपस में प्यार से रहे, ख़ुशी से रहे और ज़िन्दगी भर एक दूसरे के हमसफ़र बने रहे। 


अल्लाह हाफिज

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