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ईदुल फ़ित्र की इबादतें (Eid Ul Fitr Ki Ibadaten)

ईदुल फ़ित्र की इबादतें (Eid Ul Fitr Ki Ibadaten)

शौवाल इस्लामी साल का दसवां महीना हैं। इस महीने का चाँद देखकर सुरह फतह पढ़ कर हरा कपड़ा देखे या सुरह लहब पढ़ कर रंगीन कपड़ा देखे।
जो इंसान ईद की रात 4 रकात नफ़्ल नमाज़ पढ़े हर रकात में अल्हम्दो शरीफ के बाद 21 बार कुल हुवल्लाह शरीफ पढ़ेगा तो अल्लाह पाक उसके लिए जन्नत के आठों दरवाज़े खोल देगा।

इस महीने की पहली रात 4 रकात नफ़्ल नमाज़ पढ़े। अल्हम्दो शरीफ के बाद कुल हुवल्लाह, सुरह फ़लक, सुरह नास एक एक बार पढ़े तो अल्लाह पाक 6 महीने की इबादत का सवाब अता फरमाएगा। जो इंसान शौवाल की पहली रात में 20 रकात नफ़्ल नमाज़ पढ़े, हर रकात में अल्हम्दो शरीफ के बाद 5 बार कुल हुवल्लाह पढ़े।  अल्लाह पाक उसके आमाल नामे में एक साल की इबादत का सवाब लिखवाएगा।

जो इंसान इस महीने की पहली रात या दिन में 8 रकात नफ़्ल नमाज़ पढ़ेगा। हर रकात में सुरह फातेहा के बाद 25 बार कुल हुवल्लाह पढ़े, नमाज़ से फारिग होने के बाद 70 बार सुब्हानल्लाह,70 बार अस्तग़्फ़िरुल्लाह और 70 बार दुरुद शरीफ पढ़ेगा तो अल्लाह पाक इसकी बरकत से उसकी 70 ज़रूरते पूरी फरमाएगा और जन्नत में बेहतरीन मक़ाम अता फरमाएगा।

ईद के दिन ईद की नमाज़ के बाद घर पर आकर 4 रकात नफ़्ल नमाज़ पढ़े। पहली रकात में अल्हम्दो के बाद सुरह अअला दूसरी में सुरह शम्स तीसरी में सुरह वद दुहा और चौथी में कुल्हुवल्लाह पढ़ेगा तो अल्लाह पाक हज़ारो साल की इबादत का सवाब अता फरमाएगा।

जो गरीब इंसान ईद की नमाज़ के बाद घर आने पर 2 रकात नफ़्ल पढ़ेगा। हर रकात में अल्हम्दो शरीफ के बाद एक बार सुरह माऊन और तीन बार कुल्हुवल्लाह शरीफ पढ़ेगा तो उसे सदक़ए फ़ित्र अदा करने का सवाब मिलेगा। जो इंसान ईद के बाद 6 रोज़ा रखे जिसे शश ईद की रोज़े कहा जाता हैं।अल्लाह ऐसे इंसान को एक साल के रोज़े का सवाब अता फरमाएगा और उस पर दोज़ख की आग हराम कर देगा।

घर के ज़िम्मेदार को अपनी तरफ और अपने बीवी बच्चो की तरफ से ईद से पहले सदक़ए फ़ित्र (फ़ितरा) अदा करना वाजिब हैं। यह रकम रमज़ान के महीने में भी दी जा सकती हैं। फ़ितरा अदा करने वाले को एक दाने के बदले एक साल की इबादत का सवाब मिलता हैं। जो हैसियतदार होते हुए भी फ़ितरा ज़कात अदा न करे गरीबो का हक़ न दें, ऐसे लोग क़यामत में वह गरीबो का दामन पकड़ेंगे।

ईद के दिन ग़ुस्ल करे। हैसियत के ऐतबार से नए और साफ़ कपड़े पहनें, खुशबु लगाएं। ईदगाह जाकर नमाज़ अदा करें। नमाज़ के लिए जाने से पहले कुछ मीठी चीज़ खा ले। ईद का खुत्बा सुनना वाजिब हैं इसलिए नमाज़ पढ़ते ही घर न आये बल्कि खुत्बा सुनकर आये। लोगो से सलाम व मुसाफहा करें, ईद की मुबारकबाद पेश करें और क़ब्रिस्तान जाकर मुर्दो के लिए दुआएं मग़फ़ेरत करें। 

कब्र और गुनाह से जुड़ा एक बूढी औरत और एक आदमी का किस्सा

कब्र और गुनाह से जुड़ा एक बूढी औरत और एक आदमी का किस्सा

एक गांव में एक औरत रहा करती थी। वह पाबन्दी से पांचो वक़्त की नमाज़ पढ़ती थी, और मोहल्ले वालो को दीन की बातें बताया करती थी। एक दिन वह रात को कब्रिस्तान के करीब से गुज़री तो उसने कब्रिस्तान की निगरानी करने वाले आदमी को देखा की वह किसी मुर्दे का कफ़न चुरा कर ला रहा था। यह देख कर वह दंग रह गयी और सोचने लगी की जब मै मरूंगी तो यह आदमी मेरा कफ़न भी चुरा लेगा। यह सोच कर वह अपने घर गयी और अगले दिन पांच रुपये लेकर वापिस उसी जगह लोटी। उसने कब्रिस्तान की निगरानी करने वाले आदमी को पांच रूपए देते हुए कहने लगी! की देखो यह रूपए रख लो और मेरे मरने के बाद मेरा कफ़न मत चुराना। यह सुनकर वह आदमी चौंक गया और बड़ा शर्मिंदा हुआ की उसका पर्दाफाश हो गया। औरत ने कहा तुम इत्मीनान रखो मै इस बारे में किसी से नहीं कहूँगी। क्यूंकि किसी का ऐब छुपाना भी एक इबादत हैं। यह सुनकर उस आदमी को बड़ा अफ़सोस हुआ। उसने तौबा की और इक़रार किया की वह अब किसी का कफ़न नहीं चुरायेगा।

कुछ दिनों तक वह अपने वादे का पाबंद रहा लेकिन फिर उसने कफ़न चुराने वाला पुराना धंधा शुरू कर दिया। इसके कुछ दिनों बाद उस औरत का भी इंतेक़ाल हो गया। लोग जब उसे दफ़न करके कब्रिस्तान से चले गए तब रात को वही कब्रिस्तान की निगरानी करने वाला आदमी उस औरत की कब्र की और आया और आकर सोचने लगा की इस औरत का कफ़न निकालू या न निकालू। सोचते सोचते काफी देर हो गयी। आखिरकार उस आदमी को उसकी लालच ने फिर मजबूर कर दिया और वह उस औरत का कफ़न चुराने के लिए कब्र के और करीब पहुंचा। उसने उसी वक़्त उस औरत की कब्र खोदी कब्र खोदने के बाद जैसे ही उस औरत की लाश नज़र आयी तो वह डर के मारे काँप गया। उसने देखा की उस औरत के सीने पर एक काला खतरनाक साँप बैठा हुआ हैं। उसकी घबराहट देख कर एक आवाज़ आयी ! ऐ इंसान तूने वादे के बावजूद फिर ऐसी हरकत की एक साँप देख कर तू डर गया। क्या तुझे मालूम हैं की यह साँप मेरे सीने पर क्यों बैठा हैं? सुन एक बार मैंने अपने दाँत साफ़ करने के लिए बिना पूछे अपने पड़ोसी के घर पर लगे एक पेड़ से एक छोटी लकड़ी तोड़ दी थी। ज़िन्दगी में कभी यह ख्याल भी न आया की यह भी कोई गुनाह हैं। लेकिन आज उस चोरी की मुझे यह सज़ा मिल रही हैं। ज़रा तुम सोचो तुमने अपनी ज़िन्दगी में न जाने कितनी चोरियां की हैं। तुम्हारा क्या हाल होगा। इतना सुनते ही उसने उस औरत की कब्र बंद कर दी और सच्चे दिल से अपने गुनाहो से तौबा कर ली।

आज हम भी कुछ चीज़ो को मामूली गुनाह समझ कर उसे कर लेते हैं और उसका एहसास भी नहीं करते की हमने कुछ गलत किया हैं। आज का मुसलमान ग़ीबत कर रहा हैं, बेवजह नमाज़ छोड़ रहा हैं, लड़ाई झगडे कर रहा हैं, दीन की बातें कम फिल्मो गानो की बातें ज़्यादा कर रहा हैं। आज की पीढ़ी यह सोचती हैं की गुनाह कर लेते हैं जब हिसाब होगा तब देखा जायेगा और उसे मज़ाक में ले लेते हैं। आज हमे बड़े से बड़ा गुनाह करने पर रद्दी भर भी अफ़सोस नहीं होता तो फिर कब्र में हमारा क्या होगा ये सोचने वाली बात हैं। बहरहाल अल्लाह से हर वक़्त अपने किये गुनाहो की माफ़ी मांगो और कोई भी गुनाह चाहे छोटा हो या बड़ा वह करने से बचो।  

पांच वक़्त नमाज़ के राज़ और उसकी अहमियत

पांच वक़्त नमाज़ के राज़ और उसकी अहमियत
दुनिया की ज़िंदगी खत्म होने के बाद मुसलमानों पर पांच मुसीबते आती है। मौत,कब्र,हश्र, पुल सिरात और जन्नत का दरवाजा बंद होना। अल्लाह ने इन मुसीबतों को टालने व आसान करने के लिए पांच नमाजे फ़र्ज़ फ़रमाई हैं। दिन और रात की भी पांच हालतें होती है। सुबह, दोपहर, सेहपहर, शाम और रात इन वक्तो में नमाज़े फ़र्ज़ की गई ताकि मोमिन के हर वक्त की शुरुआत अल्लाह की इबादत से हो सुबह होने पर फज्र की नमाज़ अदा करके बंदा अपने दिन की शुरुआत अल्लाह के जिक्र व इबादत से करता है।

दोपहर में कारोबारी मसरूफियात के बाद खाना खाता है और थोड़ी देर आराम करता है। फिर ज़ोहर की नमाज अदा करके अपने दूसरे वक्त की शुरुआत अल्लाह की इबादत से करता है। कामकाज में लग जाने के बाद फिर अस्र की नमाज अदा करके वापिस कारोबार में लग जाने का तीसरा मौका मिलता है। यहां तक कि सूरज डूब जाता है और मगरिब की नमाज अदा करके इंसान अपने दिन भर के हिसाब किताब को समेटता है और ईशा की नमाज अदा करके दिन भर के थके दिल व दिमाग को आराम व सुकून देने के लिए सो जाता है। इस तरह एक मोमिन की जिंदगी का हर दिन और दिन का हर-हर पहर अल्लाह के जिक्र से शुरू और आबाद रहता है।

नुज़हतुल मजालिस में पांच नमाज़ो की खसूसियात यह भी लिखी है कि फज्र व ईशा की नमाज़ का वक्त कब्र और क़यामत के अंधेरे की तरह है। जिसने ईशा की नमाज़ अदा की उसने अपनी कब्र में रोशनी का इंतेज़ाम कर लिया। इसलिए तो कहा गया है कि नमाज़ कब्र के अंधेरे में रोशनी का काम करेगी और फज्र की नमाज़ के बदले नमाज़ी को दोज़ख से बरी कर दिया जाएगा। ज़ोहर के वक्त जहन्नम भड़कायी जाती है। ज़ोहर की नमाज़ अदा करने वाला गुनाह से साफ कर दिया जाता है। अस्र के वक्त हज़रत आदम अलैहिस्सलाम ने जन्नत में गेहूं का दाना खाया था। जिसने यह नमाज़ अदा की उस पर जहन्नम हराम कर दी जाती है। मगरिब के वक्त हज़रत आदम अलैहिस्सलाम की तौबा कबूल हुई थी। जो आदमी इस वक्त में नमाज़ अदा करेगा, वह अल्लाह से जो मांगेगा उसे वह दिया जाएगा।

बुखारी शरीफ की हदीस है ताजदार ए मदीना सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम फरमाते हैं ! पंज वक्ता नमाज़ो की मिसाल उस नहर जैसी है जो हर मुसलमान के घर के आगे से जारी है। जो आदमी यह पांचों नामज़े पढ़ता रहेगा गोया उसने 5 बार नहर में ग़ुस्ल किया। जिस तरह रोज़ाना पांच बार नहाने वाले के बदन पर मैल नहीं रहती, उसी तरह पाबंदी से पांचो नमाज़े पढ़ने वाले के गुनाह बाकी नहीं रहेंगे।

पांच का इंसानी जिंदगी से बड़ा गहरा रिश्ता है। खुद इंसान की पैदाइश भी पांच मंजिलें तय करने के बाद इंसानी शक्ल सूरत में आती है। नुतफा, अलक़ा मुज़गह, अज़मा, लहमा इसी तरह इंसान की भी पांच हैसियत होती है, बैठना,सोना,जागना,लेटना,उठना। इस तरह इंसान पांच वक्त की नामज़े अदा करके अल्लाह पाक के एहसानों का शुक्रिया अदा करता है।

मेराज की रात 50 वक्त की नमाज़े फ़र्ज़ हुई थी, जिनमें से 45 माफ कर दी गई। अब पांच बाकी है वही पांच नमाज़े फ़र्ज़ हैं। इन पांच नमाज़ो के बदले आपको सवाब 50 नमाज़ो का मिलता हैं। क्यूंकि अल्लाह पाक ने अपने कलाम में हर नेकी का बदला 10 गुना अता फरमाने की बशारत सुनाई है। इसलिए पढ़ने में पांच नमाज़े ही है लेकिन सवाब में 50 के बराबर है। अल्लाह पाक हमें पांच वक़्त की नमाज़ पढ़ने की तौफीक अता फरमाए आमीन।

कुर्सी पर बैठ कर नमाज़ पढ़ने के अहकाम (Kursi Par Namaz K Ahkam)

कुर्सी पर बैठ कर नमाज़ पढ़ने के अहकाम (Kursi Par Namaz K Ahkam)

कुर्सी स्टूल सोफा वगैरह जैसी ऊँची चीज़ पर बैठ कर नमाज़ पढ़ना जायज़ नहीं मरीज़ और मजबूर आदमी ज़मीन पर नमाज़ अदा करे क्यूंकि ऊँची चीज़ पर बैठ कर नमाज़ अदा करने को सरकार ने मना फ़रमाया हैं।

हज़रत जाबिर रदियल्लाहो अन्हो का बयान हैं, अल्लाह के रसूल एक मरीज़ को पूछने के लिए तशरीफ़ ले गए। आपने देखा की वह किसी तकिये पर बैठ कर नमाज़ अदा कर रहे हैं। नमाज़ हो जाने पर आपने फ़रमाया ज़मीन पर नमाज़ पढ़ो अगर इसकी ताकत न हो तो इशारे से नमाज़ पढ़ो और सज्दा को रुकू से कुछ नीचा करो। छोटी छोटी तकलीफो वाला मजबूर नहीं। मरीज़ वह हैं जो नमाज़ के अरकान सही तरीके से अदा करने से मजबूर हो। आजकल अक्सर देखने में आता हैं की मामूली सा बुखार आया या कोई मामूली से तकलीफ होने लगी तो बैठ कर नमाज़ शुरू कर दी इस तरह नमाज़ नहीं होती और पढ़ ली तो वह दोबारा पढ़नी चाहिए।

हज़रत इमरान बिन हसीन रदियल्लाहो का बयान हैं मै बीमार था तो सरकार से नमाज़ पढ़ने के बारे में पूछा। आका ने फ़रमाया ! खड़े होकर पढ़ो अगर खड़े होकर पढ़ने की ताकत न हो तो बैठ कर पढ़ो और अगर बैठने की भी हिम्मत न हो तो लेट कर पढ़ो।

अल्लाह पाक किसी बन्दे को उसकी हिम्मत से ज़्यादा तकलीफ नहीं देता। इस हदीस से अंदाज़ा हुआ की किसी ऊँची चीज़ पर जैसे की कुर्सी, स्टूल, सोफा वगैरह पर बैठ कर नमाज़ पढ़ना और रूकु सज्दा इशारे से करना दुरुस्त नहीं। नमाज़ ज़मीन पर ही बैठ कर अदा करे जिस तरह भी हो सके जैसा भी आसान व मुमकिन हो बैठ कर नमाज़ पढ़े।

अगर बैठ नहीं सकते तो दीवार वगैरह से टेका लगा कर पढ़े अगर टेका लगाना भी मुश्किल हो तो फिर लेटे लेटे पढ़े। अगर मरीज़ खड़ा हो सकता हैं लेकिन रूकु सज्दा नहीं कर सकता तो खड़े खड़े नमाज़ अदा करे, अगर रूकु नहीं कर सकता तो इशारे से रूकु करे और ज़मीन पर बैठ जाये और इशारे से सज्दा करे।

नमाज़ के लिए बीच में कुर्सी लगाने से सफ़ भी टूटती हैं। सफ़ सीधी व बराबर नहीं रह पाती कंधे से कंधा नहीं मिलता और सफ़ के बीच जगह खली रह जाती हैं। सफ़े सीधी रखना सुन्नत हैं। सरकार ने फ़रमाया ! सफ़ो को सीधा करो खाली जगह को बंद कर दो, शैतान के लिए बीच में कोई जगह न छोड़ो।जिसने सफ़ो को मिलाया अल्लाह उसे मिलाएगा। जिसने सफ़ को काटा अल्लाह की रहमत उससे अपना रिश्ता तोड़ लेगी।

एक और हदीस पढ़ते चले, हज़रत नोमान बिन बशीर रदियल्लाहो अन्हो फरमाते हैं ! सरकार हमारी सफ़े तीर की तरह सीधी करते हैं। एक दिन की बात हैं सरकार तशरीफ़ लाए तकबीर होने ही वाली थी की आपने एक नमाज़ी का सीना सफ़ से बाहर निकलते देखा। आपने फ़रमाया ! अल्लाह के बन्दों अपनी सफ़े तीर की तरह सीधी और बराबर किया करो वरना अल्लाह पाक तुम्हारे बीच इख़्तेलाफ़ (दरार) दाल देगा।

जुमा हो या ईद, बकरा ईद या आम दिन जो आदमी खड़ा हो सकता हैं अगर कुर्सी पर बैठ कर रूकु सज्दा करेगा तो उसकी नमाज़ नहीं होगी। अफ़सोस हैं की जो लोग गाड़ी चला लेते हैं पैदल चल लेते हैं घंटो खड़े खड़े यार दोस्तों के साथ बातें कर लेते हैं, और मस्जिद में आते ही बीमार मजबूर बन कर कुर्सियों का सहारा लेकर नमाज़ पढ़ने लगते हैं। ऐसे लोगो की नमाज़ नहीं होती। मस्जिद में इस तरह की चीज़ो से बचना चाहिए। अगर आप में हिम्मत हैं खड़े खड़े नमाज़ पढ़ने की तो कोशिश करे की उसी हिम्मत से मस्जिद में नमाज़ अदा करे ।

नमाज़े जनाज़ा और उसका तरीका

नमाज़े जनाज़ा और उसका तरीका

नमाज़े जनाज़ा “फ़र्ज किफ़ाया” है यानी कोई एक भी अगर अदा कर ले तो सब जिम्‍मेदारी से बरी हो गए वरना जिन जिन को ख़बर पहुंची थी और नहीं आए वो सब गुनहगार होंगे।

आइये इस नमाज़ के तरीके के बारे में जानते हैं।

नियत की मैंने नमाज़े जनाज़ा की 4 तकबीरों के साथ,सना वास्ते अल्लाह तआला के, दुरुद वास्ते रसुल्लाह के, दुआ वास्ते इस मैयत के, पीछे इस इमाम के, मुँह मेरा काबा शरीफ की तरफ अल्लाहो अकबर। फिर सूरह सना पढ़े।

सुबहानका अल्लाहुम्मा व बिहम्दीका व ताबरकस्मुका व तआला जद्दुका व जल्ला सनाउका व लाइलाहा गैरूका

इमाम साहब दूसरी बार अल्लाहो अकबर कहे तो दुरूदे इब्राहिम जो नमाज़ में अतहियात के बाद पढ़ी जाती हैं पढ़े।

अल्लाहुम्मा सल्लि अला सयैदीना मुहम्मादिव व अला आलि सयैदीना मुहम्मदिन कमा सल्लैता अला इब्राहीमा व अला आलि इब्राहीमा इन्नका हमीदुम मजीद अल्लाहुम्मा बारिक अला सयैदीना मुहम्मादिव व अला आलि सयैदीना मुहम्मदिन कमा बारकता अला इब्राहीमा व अला आलि इब्राहीमा इन्नका हमीदुम मजीद

इमाम साहब तीसरी बार अल्लाहो अकबर कहे तो अगर जनाज़ा किसी बालिग मर्द या औरत का हो तो यह दुआ पढ़े !
अल्लाहुम्मग़्फ़िरली हय्यिना व मय्यितिना व शहीदीना व ग़ाइबिना व सग़ीरिना व कबीरिना व ज़कारिना व उन्साना अल्लाहुम्मा मन अहयैतहु मिन्ना फ़अहयेही अलल इस्लामी व मन तवफ़्फ़इतहू मिन्ना फ़तवफ़्फ़हू अलल ईमान

और अगर नाबालिग लड़के का जनाज़ा हो तो ऊपर वाली दुआ के बजाये यह दुआ पढ़े !

अल्लाहुम्मज अल्हो लना फरतौ वज अल्हो लना अजरौ व ज़ुखरौ वज अल्हो लना शाफीओ व मुशफ्फआ और अगर नाबालिग लड़की का जनाज़ा हो तो फिर इस के बजाय यह दुआ पढ़े ! अल्लाहुम्मज अल्हा लना फरतौ वजअल्हा लना शफीअतो व मुशफ्फअ

चौथी बार इमाम साहब अल्लाहुअक्बर कहे तो हाथ नीचे लटका दे। फिर सलाम फेरे।

तहज्जुद की नमाज़ और उसकी फ़ज़ीलत (Tahajjud ki Namaz)

तहज्जुद की नमाज़ और उसकी फ़ज़ीलत (Tahajjud ki Namaz)

हम सब पर 24 घंटे में पांच वक्त की नमाज़ फ़र्ज़ है, लेकिन हमारे प्यारे आका हज़रत मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर 6 वक्त की नमाज फ़र्ज़ थी। एक खास नमाज़ जो रात के पिछले पहर पढ़ी जाती है जिसे तहज्जुद की नमाज़ कहा जाता है। यह नमाज हमारे लिए सुन्नत है। खुश नसीब है वह लोग जो इस नमाज़ के पाबंद हैं। इसके बारे में अल्लाह तबारक व तआला ने फरमाया बेशक, रात में उठना (तहज्जुद की नमाज़ पढ़ना) नफ़्स को कुचलने के लिए बहुत सख्त हैं। इसकी बदौलत हर काम दुरस्त होते हैं।

अल्लाह के रसूल फरमाते हैं! आदमी जब सो जाता है तो शैतान उसकी गुद्दी (सिर का पिछले हिस्सा) में 3 गांठे लगा देता है और हर गांठ पर कहता है! अभी बहुत रात बाकी है कुछ देर और सो जा अगर आदमी उठकर अल्लाह का नाम लेता है तो एक गांठ खुल जाती है। जब वज़ू करता है तो दूसरी गांठ खुल जाती है। और जब नमाज पढ़ने लगता है तो तीसरी गांठ भी खुल जाती है। ऐसा आदमी सुबह उठने पर खुशी महसूस करता है और उसका बदन हल्का और तरोताजा हो जाता है। अगर वह ऐसा नहीं करता है तो उसका बदन सुस्त और बदमिज़ाज रहता है। शैतान के पास नाक की दवा, चाटने और  छिड़कने की चीजें रहती हैं जब वह किसी इंसान की नाक में दवा डालता है तो वह बदमिज़ाज व बदअख़लाक़ हो जाता है। जब शैतान चाटने की दवा देता है तो बद्तमीज़ और बदज़बान हो जाता है, और जब शैतान आदमी पर दवा छिड़क देता है तो वह सुबह तक सोता रहता है।

हदीस शरीफ में है प्यारे रसूल हज़रत मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम फरमाते हैं आधी रात को उठकर 2 रकात नमाज़ पढ़ना दुनिया और उसकी सारी चीजों से बेहतर है। अगर मुझे अपनी उम्मत की तकलीफ का ख्याल ना होता तो यह नमाज (तहज्जुद की नमाज़) भी मैं उन पर जरूरी करार दे देता।

रात में एक लम्हा ऐसा भी होता है कि बन्दा अगर उस वक़्त दुनिया और आख़िरत की भलाई के लिए अपने रब से दुआ करें तो अल्लाह तआला उसकी दुआ को कबूल फरमा लेता है।

हज़रत मुगीरा बिन शोअबा रदियल्लाहो अन्हो का बयान है एक बार रात में अल्लाह के रसूल इतनी देर नमाज के लिए खड़े रहे कि आपके पैरों में वरम आ गया। सहाबा ने आपकी यह हालत देखी तो कहने लगे या रसूलल्लाह ! अल्लाह ने तो आपके अगले पिछले सब गुनाह माफ फरमा दिए है फिर आप इतनी तकलीफ क्यों उठाते हैं? आपने जवाब देते हुए फरमाया तो क्या मैं अपने रब का शुक्रगुजार बन्दा न बनूँ? अल्लाह का वादा है की अगर तुम मेरा शुक्र अदा करोगे तो मैं तुम्हें और दूंगा।

हज़रत अबू हुरैरा रदियल्लाहो अन्हो का बयान है आका ने हमसे फरमाया अगर तुम चाहते हो कि जिंदगी, मौत, कब्र, हश्र में तुम पर अल्लाह की रहमत नाज़िल हो तो रात के पिछले पहर अपने रब की रज़ा के लिए इबादत किया करो। अपने घरों में भी नमाज़े पढ़ा करो, जिससे तुम्हारा घर आसमान से ऐसा चमकता नज़र आएगा जैसा की ज़मीन वालों को आसमान पर चमकते तारे दिखाई देते हैं।

हदीस शरीफ में है तहज्जुद की नमाज की बरकत से बंदे को अल्लाह का क़ुर्ब (अल्लाह के करीब) हासिल होता है। बन्दे के  गुनाह माफ होते हैं। बीमारियां दूर होती हैं। वह गुनाहों से बचता है। हजरत अबू ज़र गिफारी रदियल्लाहो अन्हो को तालीम देते हुए अल्लाह के रसूल ने फरमाया कयामत के अज़ाब से बचने के लिए सख्त गर्मी के दिनों में रोज़ा रखा करो, कब्र की वहशत दूर करने के लिए अँधेरी रात में दो 2 रकात नमाज नफ़्ल पढ़ा करो। हज करो, गरीबो को खैरात दो, हक़ बात बोलो और बुरी बात से ज़बान को रोको।

नबीए रहमत के ज़माने में एक साहब ऐसे थे की जब लोग रात को सो जाते थे तो वह साहब नमाज के लिए खड़े हो जाते और कुरान की तिलावत करते और दुआ मांगते की ए इलाही ! ए परवरदिगार ! मुझे जहन्नम से बचा। लोगों ने उनके बारे में जब रसूल अकरम को खबर दी तो आपने एक रात और खुद उनकी कैफियत देखी और दुआ सुनी तो सुबह को फरमाया ! तुमने अल्लाह से जन्नत के लिए दुआ क्यों नहीं मांगी ? वह बोले या रसूलल्लाह! मैं जन्नत का सवाल कैसे करता ! अभी तो मैं जन्नत का सवाल करने के काबिल ही नहीं हुआ हूँ। इतने में हज़रत जिब्राइल अलैहिस्सलाम ने आकर खबर दी या रसूलल्लाह आप उन्हें बशारत सुना दें की अल्लाह ने उन्हें जहन्नम से बचाकर जन्नत में दाखिल फरमा दिया हैं।

प्यारे रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम के नाम पर अंगूठा चूमना

प्यारे रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम के नाम अंगूठा चूमना

सदियों से हम खुश अक़ीदा मुसलमानों का यह तरीका चला आ रहा है की जब भी हम अपने प्यारे आका का प्यारा नाम सुनते हैं, अजान को सुनकर या कही भी तो बड़ी मोहब्बत से अपने दोनों अंगूठो को चुम कर कलमे कि दोनों अंगुलियों को आंखों से लगा देते हैं। लेकिन कुछ सालों से ऐसी जमाअते पैदा हो चुकी है और होती जा रही है जो इस काम को गलत बताते हैं और ऐसा न करने की सलाह देते हैं। उन के चक्कर में आकर काफी लोग इस सआदत (अच्छाई) से मरहूम होते जा रहे हैं। ऐसी जमात के लोग अपने बच्चों को मोहब्बत से चूमते हैं तो चलता है और अपने आका का नाम सुनकर सुन्नते सिद्दीकी अदा करते हैं तो उनका दिल जलता है। देखिए यह मोहब्बत और अकीदत की बात है हम अपने रसूल से मोहब्बत हैं इसलिए हम ऐसा करते हैं।

एक रिवायत हैं की एक दिन जब हजरत अबू बकर सिद्दीक रदियल्लो अन्हो ने मुअज़्ज़िन की ज़बानी जब अशहदो अन्ना मुहम्मदर रसुल्लाह सुना तो यह दुआ पढ़ी "अशहदो अन्ना मुहम्मदन अब्दुहु व रसूलुहु रदीतो बिल्लाहे रब्बन व बिल इस्लाम दिनन व बिमुहम्मदिन सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम नबिया" ( मैं इस बात की गवाही देता हूँ की मुहम्मद सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम अल्लाह के बंदे और रसूल है मैं इस बात से खुश हूँ कि अल्लाह मेरा रब है, इस्लाम मेरा दीन हैं और मुहम्मद सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम मेरे नबी हैं) फिर कलमे की दोनों अंगुलियों को अंदर की तरफ से चुम कर आंखों से लगा लिया। आपको ऐसा करते देखा तो अल्लाह के प्यारे रसूल ने फ़रमाया, जिसने ऐसा किया जैसा कि मेरे खलील (दोस्त) ने किया, उस पर मेरी शफ़ाअत हलाल हो गई।

हज़रत अबूल अब्बास अहमद बिन अबू बकर रूदाद यमनी अपनी किताब मुजिबाते रहमत में तहरीर फरमाते हैं की हजरत खिजर अलैहिस्सलाम फरमाते हैं, जो आदमी मुअज़्ज़िन की ज़बानी "अशहदो अन्ना मुहम्मदर रसुल्लाह सुनकर मरहबा बिहबीबी व कर्रतो ऐनी मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम" पढ़े। फिर अपने दोनों अंगूठो को चूम कर उसे अपनी आंखों से लगा ले तो उसकी आंखों में कभी तकलीफ नहीं होगी।

हज़रत फकीह मोहम्मद बिन अलबाब का बयान है कि एक बार ऐसी तेज़ हवा चली की एक कंकड़ी उड़ कर उनकी आंखों में आ लगी। उसके टुकड़े आंखों में जा घुसे। उन्हें निकालते निकालते वह थक गए। तकलीफ बढ़ती गई। इसी दौरान आपने अज़ान की आवाज़ सुनी। मुअज़्ज़िन ने जब "अशहदो अन्ना मुहम्मदर रसुल्लाह" पढ़ा तो उन्होंने वही हज़रत खिजर अलैहिस्सलाम की बताई दुआ पढ़ी। दुआ पढ़ते ही अल्लाह के करम से वह टुकड़े आपकी आंखों से निकल गए और तकलीफ दूर हो गई।  सुब्हानल्ला

इसी तरह ऐसे सैकड़ों उलेमाओं ने अपने अपने किताबों में इस अमल को जायज़ करार दिया है। अल्लाह हम सबको इस पर अमल करने की तौफीक दे। आमीन 

ईदुल फ़ित्र की इबादतें (Eid Ul Fitr Ki Ibadaten)

शौवाल इस्लामी साल का दसवां महीना हैं। इस महीने का चाँद देखकर सुरह फतह पढ़ कर हरा कपड़ा देखे या सुरह लहब पढ़ कर रंगीन कपड़ा देखे। जो इंसान ...

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