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इस्लामी शरीयत के कुछ ज़रूरी नियम और तौर तरीके

इस्लामी शरीयत के कुछ जरूरी नियम और तौर तरीके

इस्लामी तौर तरीके में कुछ ऐसे अल्फ़ाज़ मुकर्रर हैं जो इस्लामी अहकाम बयान करने के दौरान काम में लिए जाते हैं। अच्छे काम करने पर सवाब और बुरे काम करने पर अज़ाब मिलता हैं। नेक कामो की भी कई किस्मे हैं जो इस तरह है, 

पहला फ़र्ज़ 

दूसरा वाजिब 

तीसरा सुन्नते मुवक्किदह

चौथा सुन्नते गैर मुवक्किदह 

पांचवा मुस्तहब 

और आख़री मुबाह 

चलिए नेक कामों की इन किस्मों को थोड़ा तफ्सील से समझते हैं। 

फ़र्ज़ 

इस्लाम में जो चीज़े फ़र्ज़ है। इसका मतलब यह हैं की वह काम करना बहुत ज़रूरी हैं जिसका फ़र्ज़ होना क़ुरान और हदीस से साबित होता हैं। जैसे नमाज़, रोज़ा, हज, ज़कात वगैरह इनके फ़र्ज़ होने का इंकार करने वाला काफिर हो जाता हैं और जो आदमी बिना किसी शरई मज़बूरी के यह काम नहीं करता उसे फासिक (गुनाहगार) कहा जाता हैं। फ़र्ज़ इबादतों कामो से लापरवाही बरतना गुनाहे कबीरा हैं। ऐसा आदमी जहन्नम का हक़दार होता हैं। 

वाजिब 

वह काम जिनका करना भी ज़रूरी है जैसे ईद, बकरा ईद की नमाज़ पढ़ना सदक़ा खैरात और फितरा वगैरह करना। इसका इंकार करने वाला गुमराह और बदमज़हब होता हैं। बिना किसी शरई मज़बूरी के इसे छोड़ने वाला या इसे न करने वाला फासिक और जहन्नम के अज़ाब का हक़दार हैं। 

सुन्नते मुवक्किदह 

शरीयत में जिन कामो को सुन्नते मुवक्किदह कहा गया है उसे करना भी ज़रूरी हैं और बड़े सवाब का काम हैं। सुन्नते मुवक्किदह मुस्तफा जाने रहमत सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के किये वह काम हैं जिसे आपने हमेशा किया हो या कभी कभार छोड़ भी दिया हो। इसलिए इसे करना भी ज़रूरी हैं। छोड़ने वाले से अल्लाह व रसूल नाराज़ होते हैं और जो बिलकुल छोड़ दे वह जहन्नम के अज़ाब का हक़दार होगा। सुन्नते मुवक्किदह का हुक्म वाजिब के करीब करीब हैं। 

सुन्नते गैर मुवक्किदह 

वह काम जिसे हमारे आका ने कभी कभी किया हो और कभी कभी बिना किसी शरई मज़बूरी में न भी किया हो। इस पर अमल करने वाला सवाब का हक़दार होता हैं और न करने पर कोई अज़ाब नहीं हैं जैसे असर और ईशा में फ़र्ज़ से पहले 4 सुन्नते न पढ़ना।  

मुस्तहब 

वह नेक काम जिसे करने को अच्छा माना गया हो और न करने को बुरा भी न समझा जाता हो। 

मुबाह 

इसका दूसरा नाम जायज़ हैं। वह काम जिसका करना या न करना दोनों बराबर हो करने पर कोई सवाब नहीं और न करने पर कोई गुनाह नहीं। 


दूसरी तरफ इस्लामी तौर तरीको में कुछ ऐसे काम भी हैं जिन्हें करने को मना किया गया हैं इन कामों को करने वाले शख्स को इनसे बचना चाहिए यह गलत या बुरे काम कुछ इस तरह हैं 

हराम काम 

इस्लामी शरीयत में जिन कामों को करने से मना किया गया हैं उसे हराम कहा गया हैं। उससे बचना और दूर रहना बहुत ज़रूरी हैं। वह काम जिनका हराम होना क़ुरानहदीस से साबित हो। उससे इंकार करने वाला काफिर हैं। और एक मर्तबा भी करने वाला फासिक (गुनहगार) हो जाता हैं। ये काम कुछ इस तरह हैं जैसे शराब पीना जुआ खेलना सूद खाना, नाच गाने में शौक रखना, खुदखुशी करना वगैरह काम हराम हैं। इससे बचने वालो को सवाब मिलता हैं और इन कामो को करने वाला बहुत बड़ा गुनहगार हैं। 

मकरूहे तहरीमी 

उन कामो से बचना बेहद ज़रूरी हैं जिन्हे मकरूहे तहरीमी करार दिया जा चूका है। इनका गुनाह हराम से कम हैं लेकिन लगातार करते रहने वाला गुनाहे कबीरा व सज़ावार हो जाता हैं। जिसकी सजा जहन्नम का अज़ाब हैं इसका एक उदाहरण जैसे नमाज़ के वक़्त इधर उधर देखना। 

मकरूहे तन्ज़ीही 

जिन कामो को इस्लामी शरीयत में अच्छा नहीं माना गया हैं इसे मकरूहे तन्ज़ीही कहा जाता हैं। इसे कर गुजरने पर कोई गुनाह नहीं लेकिन आदत बना लेना भी अच्छा नहीं। इसका एक उदाहरण जैसे सुस्ती से बोझ समझ कर नमाज़ पढ़ना। 

ख़िलाफ़े औला 

वह काम जिसे करना तो नहीं चाहिए था लेकिन अगर कर दिया तो गुनाह नहीं जैसे एक वुज़ू से कई नमाज़ पढ़ना। 


अल्लाह हम सभी को इस्लामी तौर तरीको पर चलने की तौफीक अता फरमाए आमीन। 

अच्छी इस्लामी और दीनी बातें (Acchi Islami or Deeni Baatein)

अच्छी इस्लामी और दीनी बातें (Acchi Islami or Deeni Baatein)

आज के आर्टिकल में हम कुछ और अच्छी दीनी और इस्लामी बातों पर नज़र डालेंगे इससे पहले भी हम एक आर्टिकल में कुछ दीनी और इस्लामी बातों को बता चुके हैं आज फिर हम कुछ और इस्लामी बातों के बारें में आप को बताएँगे। आपसे गुज़ारिश हैं की इन सब बातों पर आप गौर करे और जो बताया जा रहा हैं उसे अच्छे से पढ़े और समझे और ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को बताएं। 

  • रमज़ान के रोज़े फ़र्ज़ हैं जो शख्स इसके फ़र्ज़ होने से इंकार करे वह काफिर हैं।
  • रमज़ान का रोज़ा छोड़ देना इतना भारी हैं की सारी उम्र रोज़ा रखने के बाद भी उसका हक़ अदा नहीं होगा। 
  • जो लोग रोज़े में होने के बावजूद झूठ, चुगली और किसी की ग़ीबत करते हैं ऐसे लोग रोज़े के सवाब के हक़दार नहीं होते। 
  • अल्लाह को ऐसे लोग बहुत प्यारे लगते है जो रमज़ान के महीने में ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को रोज़ा इफ्तारी करवाते हैं। 
  • जो शख्स अपने दीनी भाई और बहनो की बख्शीश के लिए दुआ करता हैं। अल्लाह पाक उसे इसके बदले में ढेर सारी नेकी अता फरमाता हैं।
  • रमज़ान के महीने में ज़्यादा से ज़्यादा ज़कात देने वाले लोगों के घरो में कभी पैसो की तंगी नहीं आती हैं। 
  • जब दो मुसलमान मिलते हैं और सलाम व मुसाफहा के बाद दुरूद शरीफ पढ़ते है तो उनके अलग होने से पहले ही उनके गुनाह बख्श दिए जाते हैं। 
  • किसी ज़रूरतमंद दीनी भाई को क़र्ज़ देने वालो को उससे दो गुना खैरात करने जितना सवाब हासिल होता हैं। 
  • किसी का दिल खुश करना भी एक तरह की इबादत हैं। 
  • सलाम का जवाब देना, किसी बीमार की खैरियत मालूम करना, जनाज़े में शरीक होना, किसी की दावत कबूल करना इस्लामी हक़ हैं। 
  • किसी के घर जाओ तो तीन बार उनसे अंदर आने की इजाज़त लो अगर तीनो मर्तबा इजाज़त न मिले तो वापिस चले जाओ। 
  • अपने इलाके या शहर के गरीबो के घरों पर नज़र ज़रूर रखो। ज़रूरत होने पर जो ज़रूरत की चीज़े हैं जितना हो सके उतना उन्हें दे दो। यह भी एक तरह की इबादत हैं।
  • हराम पैसो से ख़रीदे कपड़ो में नमाज़ कबूल नहीं होती। 
  • किसी की तकलीफ दूर करने वाले, नबी को सुन्नत को ज़िंदा रखने वाले और नबी पर दरूद भेजने वाले क़यामत के दिन अर्शे इलाही के साये में रहेंगे। 
  • ऐसे वलिमों में जाना बहुत बुरा हैं जहाँ सिर्फ मालदारों को बुलाया जाता हैं और गरीब को न बुलाया जाये। 
  • अगर किसी शख्स से दीन की कोई बात पूछी जाये और वह जानते हुए भी जान बुझ कर छुपाये तो क़यामत में ऐसे शख्स के मुँह में आग लगा दी जाएगी। 
  • माँ बाप की खिदमत करना, अपने हक़ के लिए लड़ना, कमज़ोर गरीब लोगों के लिए लड़ना और किसी का घर आबाद करना भी जिहाद हैं । 
  • अपने भाई को मुसीबत में होने पर खुश होने वाला शख्स किसी न किसी दिन उससे भी बड़ी मुसीबत में पड़ जायेगा। 
  • जिस घर में सूरह बकर: पढ़ी जाती हैं उस घर में कभी शैतान नहीं आता।
  • बड़े भाई का हक़ छोटे भाई पर वैसा ही हैं जैसा बाप का हक़ अपने बेटे पर। 
  • जिसने किसी यतीम लड़की की अच्छी परवरिश करके उसकी शादी अच्छे घर में कर दी ऐसा शख्स अल्लाह के बहुत करीब रहेगा।
  • झूठी गवाही देना शिर्क के बराबर हैं। 
  • जो लोग अपने रिश्तेदारों के घरों में हो रहे झगड़ो को देखकर खुश होते हैं। ऐसे लोगों का नसीब कभी नहीं चमकता। 
  • शिर्क के बाद सबसे बड़ा गुनाह माँ बाप की नाफरमानी करना हैं। 
  • अमामा (साफा) बांध कर नमाज़ पढ़ने से 25 गुना ज़्यादा सवाब हासिल होता हैं।
  • अगर रोज़ी में बरकत चाहते हो तो माँ बाप और रिश्तेदारों से अच्छा बर्ताव करो।
  • जो आदमी रोज़ाना कलमए तैयबा ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुर्रसूल्लाह 100 मर्तबा पढ़ेगा उसका चेहरा क़यामत के दिन चाँद की तरह रोशन होगा। 
  • जो आदमी भूक की हालत में यासीन शरीफ पढ़ेगा। अल्लाह पाक उसकी ज़िन्दगी को रोशन कर देगा।

तलाक क्या हैं? क्यों, कब, और कैसे दें? (Talak Kya hain? Kab or Kaise De)

तलाक क्या हैं? क्यों, कब, और कैसे दें?

मिया बीवी या पति पत्नी के बीच किसी वजह से हो रहे मनमुटाव या झगड़े की वजह से उनके बीच के रिश्ते को तोड़ने को तलाक कहा जाता हैं। सीधी ज़बान में कहे तो मिया बीवी के बीच के रिश्ते को ख़त्म करने उसे तोड़ने को तलाक कहा कहा जाता है। इस्लाम में तलाक को जायज़ करार दिया हैं क्यूंकि तलाक एक ऐसा फैसला हैं जिसमें अगर मिया बीवी दोनों आपस में साथ रहने से खुश नहीं हैं तो इस्लाम उन्हें इजाज़त देता हैं की आप तलाक लेकर एक दूसरे के बिना भी ख़ुशी से रह सकते हैं। क़ुरान और हदीस की रौशनी में तलाक का बयान काफी तफ्सील में बताया गया हैं। लेकिन आजकल के दौर में तलाक को मर्दो ने एक दस्तूर सा बना लिया हैं। उन्हें पता ही नहीं की तलाक़ कब देना हैं? और क्यों देना हैं? आजकल के मर्द जब मर्ज़ी चाहे तलाक दे देते हैं, ये भी नहीं सोचते की इससे एक औरत की किस तरह ज़िन्दगी बर्बाद हो सकती हैं। 

क्यों होते हैं इतने तलाक?

तलाक एक ऐसा शब्द बन गया हैं जिससे मर्द इस शब्द का फ़ायदा उठा कर औरत पर ज़ुल्म करता हैं। मर्द को जब औरत पर गुस्सा आता हैं या कहे किसी बात से पर औरत से झगड़ा हो जाता हैं तो वह इस तलाक शब्द का इस्तेमाल करके औरत को डराता हैं। उसे लगता हैं की यह शब्द अगर बोल दिया तो ये चुप हो जाएगी और मुझ से बहस नहीं करेगी। आजकल सुनने में आता हैं की बीवी ने अच्छा खाना नहीं बनाया तो तलाक़ दे दिया। मायके में ज़्यादा रुक गयी तो पोस्ट कार्ड से तलाक भेज दिया और न जाने कैसी कैसी तलाक की वजह सुनने में आती हैं जिसे सुनकर हैरत होती हैं की इतनी छोटी सी बात पर तलाक दे दिया। 

हम मानते हैं की मिया बीवी में कभी कभी मनमुटाव हो जाते हैं। उसकी कुछ भी वजह हो सकती हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं की एकदम से तलाक देकर अपने रिश्ते को ख़त्म कर दिया जाये। जो लोग ऐसे मज़ाक में या छोटी छोटी बातों पर तलाक दे देते हैं उन पर अल्लाह की बहुत लानत बरसती हैं। ऐसे लोग गुस्से में तलाक तो दे देते मगर कुछ देर बाद या कुछ दिनों बाद अपने द्वारा लिए तलाक के फैसले को लेकर पछताते हैं। तलाक कोई मामूली बात नहीं हैं बल्कि यह ज़िन्दगी का एक बहुत भयानक हादसा हैं। जायज़ कामों में अल्लाह को सबसे ज़्यादा नापसंद काम तलाक है। एक बार में ही तीन तलाक देने वालों पर अल्लाह तआला ने लानत फ़रमाई हैं। क़ुरान और हदीस की रौशनी में तलाक के बारे में बड़ा तफ्सील से बयान दिया गया हैं। 

तलाक देने का तरीका 

तलाक का शरई तरीका ये है की अगर किसी बात से शौहर बीवी में झगड़ा हो जाये या शौहर फैसला कर ले की अब बीवी के साथ नहीं रहना है तो एक बार ठन्डे दिमाग से सोचे और आपस में सुलह की कोशिश करे। अगर तलाक ही चाहिए तो उसका तरीका यह है की जब बीवी हैज़ (औरत का मासिक धर्म) से पाक हो जाये तो उसे एक तलाक दे दे, हो सकता हैं बीवी अपनी गलती सुधार ले या आदमी का गुस्सा ठंडा हो जाये और दोनों वापिस एक हो जाना चाहे। 

एक तलाक देने की सूरत में शौहर अगर चाहे तो बिना निकाह किये उसे दोबारा रख सकता हैं। अगर फिर भी तलाक ही चाहते हैं तो दोबारा जब औरत दूसरे मासिक धर्म से पाक हो जाये तो फिर दूसरा तलाक दे दे। अब भी अगर शौहर और बीवी दोनों एक साथ रहना चाहते हैं तो शौहर इद्दत के अंदर या उसके बाद बीवी की मर्ज़ी से उसे वापिस रख सकता हैं। उसके बावजूद भी अगर तलाक ही एक आखरी फैसला हैं तो तीसरे महीने औरत जब महावारी से पाक हो जाये तो आखरी तलाक दे दें तो उस केस में तलाक हो जाती हैं। इस तरह यह तीन तलाकें हो गयी। अब बीवी शौहर के लिए हराम हो गयी। अब अगर वह साथ में रहना चाहते हैं तो इस्लाम में एक रास्ता बताया हैं जिसे हलाला कहते हैं। लेकिन यह इतना शर्मनाक और वाहियात तरीका हैं की कोई भी मर्द उसे सोच कर अपनी बीवी को कभी तलाक देने का ख्याल अपने मन में नहीं लाएगा।

हलाला क्या हैं ?

रसुलल्लाह सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम फरमाते हैं हलाला करने वाले और हलाला कराने वाले दोनों पर अल्लाह की लानत हैं। हलाला यह हैं की तलाक पाने के बाद औरत इद्दत के दिन पुरे करे और फिर किसी और मर्द से निकाह कर ले और उसके साथ रहे। उसका दूसरा शौहर उससे हमबिस्तरी करे। फिर अगर वह चाहे तो अपनी ख़ुशी से उसे तलाक दे सकता हैं। इस तरह औरत दूसरे शौहर की इद्दत गुज़ार कर अब अगर चाहे तो पहले शौहर से फिर से निकाह कर सकती हैं। ज़रा सोचिये कौन गैरत मंद मर्द ऐसा चाहेगा की उसकी बीवी किसी और के साथ हमबिस्तरी करे। ऐसे मर्दो को तलाक से पहले यह भी सोचना चाहिए आपकी बीवी एक पराये मर्द के साथ कैसे वह सब चीज़े करेगी? क्या बीतेगी उस औरत पर? आखिर तलाक जैसा कदम उठाया ही क्यों जाये अगर दोनों आपस में वापिस से रहना चाहते हैं। क्यूंकि हलाला में बिना हमबिस्तरी करे अगर तलाक दे दिया तो वह हलाला नहीं माना जायेगा। इस केस में बीवी अपने पहले शौहर से निकाह नहीं कर सकती। 

तलाक को लेकर हमारी नसीहत 

मिया और बीवी के पाक रिश्ते की कद्र की जाये और गुस्से में या नादानी में तलाक जैसा कदम न उठाये की बाद में पछताना पड़े। यह भी हो सकता है मिया और बीवी दोनों में से कोई एक ख़राब हो। मतलब उसमे काफी बुराई मौजूद हो या फिर दोनों ही एक जैसे हो। दोनों आपस में ही एक दूसरे को पसंद नहीं करते हो या ऐसा हो की औरत के रंग मिज़ाज,अख़लाक़ सही नहीं हो या आदमी शराबी, मवाली या औरत को मारता पीटता हो। इस केस में अगर आपस में रिश्ता नहीं बन रहा हो तो फिर आप तलाक ले सकते हैं। 

लेकिन अगर ऐसा कुछ नहीं हैं तो फिर तलाक का फैसला लेते समय दस बार सोचे और फिर अपना फैसला ले क्यूंकि यह ज़िन्दगी ख़राब करने वाला फैसला हैं। ऐसा फैसला लेने से पहले आपसी रिश्ते सुधारें।आपसी झगडे को ख़त्म करे। रिश्तेदारों से पहले सलाह मशवरा ले तब जाकर तलाक का फैसला लिया जाये। मिया बीवी दोनों को चाहिए की आपस में मिलजुल कर रहे। एक दूसरे से ज़बान दराज़ी से न करे। दोनों में से कोई एक गुस्से में कुछ बोल रहा है तो दूसरा चुप हो जाये क्यूंकि ख़ामोशी ऐसी चीज़ है जो बिगड़ते रिश्तो को वापिस जोड़ सकती है। हमारी हर मर्द और औरत मिया बीवी से यही गुज़ारिश हैं की आपस में प्यार से रहे, ख़ुशी से रहे और ज़िन्दगी भर एक दूसरे के हमसफ़र बने रहे। 


अल्लाह हाफिज

इस्लाम और हदीस की रौशनी में जहेज़ या दहेज क्या हैं? (Islam me Jahez or Dahej Kya Hain?)

Jahez in Islam

जहेज़ (दहेज) एक तरह की प्रथा है, जो आजकल के समाज में एक धंधा सा बन गया है और यह धंधा बड़ी तेज़ी से फ़ैल रहा हैं। जैसे जैसे महंगाई बढ़ रही हैं जहेज़ की कीमत भी बढ़ती जा रही हैं। इस्लाम में जहेज़ को एक लानत कहा गया हैं। ये प्रथा इस्लामी शरीयत के खिलाफ हैं। इसे इस्लाम में कोई दर्जा हासिल नहीं हैं न ही ऐसा कोई अल्फ़ाज़ इस्लाम की किसी किताब में लिखा हैं। 

जहेज़ का मतलब 

आज के ज़माने में जहेज़ का मतलब अपनी बेटी या दामाद को शादी के वक़्त कुछ सामान या संपत्ति अपनी हैसियत के मुताबिक देना जहेज़ (दहेज) कहलाता हैं। इसका मतलब यह नहीं की ये आपको देना ही हैं। अगर कोई लड़का या उसका परिवार किसी लड़की के माँ बाप से आगे रहकर कुछ मांग रहा हैं या उसकी डिमांड कर रहा हैं तो यह इस्लाम में नाजायज़ हैं। ऐसा करने वाले शख्स की इस्लाम में कोई जगह नहीं। हर माँ बाप अपनी बेटी को कुछ न कुछ देने का शौक या जज़्बा रखते हैं। अगर ख़ुशी से दे रहे हैं तो कोई बुराई नहीं, लेकिन लड़के वालो की तरफ से फरमाईश करना या ऐसा कहना की ये तो हमें यह चाहिए ही सही नहीं तो शादी नहीं होगी ये कहना गलत हैं। ऐसा करने वाले लोग क़यामत में खुदा के अज़ाब का शिकार बनेंगे। 

जहेज़ की लानत की वजह से आजकल कुछ गरीब माँ बाप लड़की के पैदा होने पर बहुत परेशान हो जाते हैं और लड़की के पैदा होने पर अफ़सोस ज़ाहिर करते हैं। जबकि लड़की तो खुदा का दिया हुआ एक तोहफा हैं। अपनी बेटियों को एक बोझ न समझे। उन्हें अल्लाह की दी हुई नेमत समझे। अगर कोई आप से जहेज़ की मांग कर रहा है तो इसमें अपनी बेटी की गलती न माने। आप उस वक़्त अल्लाह का शुक्र अदा करिये की आपकी लड़की एक लालची शख्स या परिवार में जाने से बच गयी। ऐसे घरो में शादी हरगिज़ न करे जहाँ आपसे जहेज़ की मांग की जाये। 

क्या कहती है हदीस? 

एक हदीस के मुताबिक रहमते आलम पैगंबर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने भी अपनी बेटी को घर गृहस्थी के कुछ सामान दिए थे। अगर माँ बाप थोड़ा बहुत सामान अपनी हैसियत के मुताबिक दे देते हैं तो इसमें कोई बुराई नहीं। लेकिन ऐसे सामानो की लड़के वालो की तरफ से फरमाईश करना गैर इस्लामिक हैं। इस्लाम में मेहर की बात ज़रूर की गयी हैं जो की लड़के वाले देते है। जहेज़ नाम का कोई शब्द इस्लाम में कही नहीं आया है। एक बाप अपनी बेटी को किसी और परिवार के हवाले कर रहा है वही बड़ी बात है बाकि कौन माँ बाप चाहते हैं की अपनी बच्ची को उनकी आँखों से दूर रखे।

आजकल के दौर में देखने में आता हैं की लड़के वाले लड़के के लिए अच्छी खूबसूरत लड़की तलाशते हैं। भले ही लड़का कैसा भी हो उनको लड़की खूबसूरत चाहिए। ऊपर से तरह तरह की फरमाइश करते है की लड़की कितनी पढ़ी हैं, कहने का मतलब लड़के के स्टैण्डर्ड के मुताबिक है भी या नहीं। चाहे लड़का आवारा ही क्यों न हो या बेरोज़गार हो। ऊपर से लड़की के बाप की हैसियत भी देखते हैं की ये बाप इतना जहेज़ देने के लायक हैं भी या नहीं? अगर नहीं हैं तो लोग उस घर में शादी नहीं करते। भले ही लड़की कितनी भी खूबसूरत या नमाज़ी परहेज़गार हो। ऐसे लोगो को समाज को यह दिखाना होता हैं की हमने इतने बड़े घर में अपने लड़के की शादी की हैं। लड़के के ससुर के पास इतने पैसा हैं तो लड़के के आराम ही आराम है। जो लड़की पहले देखी थी उसके घर के हालत सही नहीं थे। घर भी छोटा था और लड़की का बाप भी गरीब था फलाना बातें। 

ऐसा करने से समाज की गरीब लड़कियों को शादी अच्छे घरो में नहीं हो पाती और ऐसी गरीब घर की नेक अख़लाक़ लड़कियों को फिर ज़्यादा उम्र के नौजवानो से शादी करनी पड़ती हैं। जो की उन लड़कियों के काबिल नहीं होते। माँ बाप भी ऐसी लड़कियों की बढ़ती उम्र देखकर किसी से भी उनकी शादी करवाने को राज़ी हो जाते है। 

जहेज़ और हमारा समाज 

आजकल देखने में आता हैं की अगर लड़का डॉक्टर इंजीनियर हैं तो लड़के वाले उसके रुतबे के मुताबिक लड़की वालो से मनमर्ज़ी जहेज़ की मांग करते हैं की हमारा लड़का तो सरकारी अफसर हैं इतना कमाता है तो हमें भी इतना जहेज़ चाहिये और बारातियों के लिए अच्छा खाना चाहिए। गाड़ी चाहिए, कैश पैसा चाहिए, फलाना बातें। भले ही लड़की का बाप उसके लायक है या नहीं? मज़बूरी में ऐसे माँ बाप को अपनी बच्ची को ख़ुशी के लिए लाखो का कर्ज़ा लेना पड़ता है। ताकि उनकी बच्ची अच्छे घर में जाये। ऐसे माँ बाप को एक बार ये सोचना चाहिए की ऐसे लोग अगर पहले से इतना कुछ मांग रहे हैं तो आगे कितना मांगेंगे और क्या गारंटी हैं की उनकी लड़की उस घर में खुश रहेगी? हो सकता हैं भले ही लड़का सरकारी नौकरी में है या बड़ा बिज़नेस करता हैं लेकिन शराबी हो या आवारा किस्म का लड़का हो और शादी के बाद आपकी बेटी के साथ मार पिट करे और उसकी ज़िन्दगी हराम कर दे। 

इसलिए हर माँ बाप को चाहिए की अपनी बेटियों का रिश्ता पैसा देख कर ही न करे। कौम में ऐसे कई लड़के मिल जायेंगे जो भले ही कम कमाई करते हो लेकिन हो सकता हैं वहाँ आपकी बेटी ज़िन्दगी भर खुश रहे। क्यूंकि ख़ुशी सिर्फ प्यार से आती हैं। अगर ज़िन्दगी में प्यार नहीं तो पैसा भी किस काम का। अगर दो लोगो में प्यार ही नहीं तो कोई कितना भी पैसे वाला हो वहाँ आपकी लड़की खुश नहीं रह सकती। 

दूसरी ज़रूरी बात जब आप अपनी लड़की की शादी करे तो उसे एक बात ज़रूर बताये की हमने अच्छा लड़का देखकर तुम्हरी शादी की हैं और यही उम्मीद करते है की यह लड़का तुम्हे ज़िन्दगी भर खुश रखेगा अगर ख़राब निकल जाता हैं तो घर के दरवाज़े तुम्हारे लिए ज़िन्दगी भर के लिए खुले हैं।  

इस जहेज़ ने न जाने कितनी लड़कियों की ज़िन्दगी तबाह कर दी है। ऐसे लोग जो लड़कियों के साथ जहेज़ के नाम पर उससे और उसके माँ बाप को परेशान करते हैं भले ही ज़िन्दगी रहते बच जाये लेकिन खुदा से उन्हें कोई नहीं बचा सकता। 

जहेज़ के मामले में आपको क्या करना चाहिए? 

एक अच्छे और नेक लड़के या परिवार की यह पहचान हैं की वह लड़की के घर वालो से जहेज़ की बिलकुल बात न करे और लड़की के घर वालो को यही बोले की हमें बस आपकी लड़की चाहिए। यही हमारे लिए बहुत बड़ी बात हैं। जहेज़ की बात पर बिलकुल सख्ती से लड़की के बाप को मना करे की हमें जहेज़ की ज़रूरत नहीं। इससे अगर कोई गरीब बाप का बोझ कम होता हैं और उसके चेहरे पर एक ख़ुशी आती हैं तो वही ख़ुशी आपको जन्नत के रास्ते तक ले जाएगी। फिर भी अगर लड़की का बाप कुछ सामान देना चाहता हैं ताकि उसकी लड़की को आगे कोई तंग न करे तो लड़के को चाहिए की लड़का पहले से ही अपनी कमाई से ऐसा सामान घर में लेकर कर रख दे और लड़की के बाप को बोले की आप जो सामान देना चाहते हैं वह सारा सामान हमारे घर में मौजूद हैं और सामान की ज़रूरत नहीं और सामान रखने की जगह भी नहीं हैं। यह नेक काम करने से बेशक अल्लाह आपसे खुश होगा। उसके बावजूद लड़की के माँ बाप कुछ देना चाहते है तो फिर आप मना मत करे

यही इस्लाम हमें सिखाता हैं की आप ऐसा काम करे की आप समाज के लिए एक मिसाल बन जाये और जहेज़ जैसी लानत ख़त्म हो जाये। अगर आपको अपनी आख़िरत सुधारनी हैं तो इस्लामी तौर और तरीको पर अमल करे जहेज़ इस्लाम में अभी तक क्यों ज़िंदा हैं? इसकी वजह यही की की हमारी ज़िन्दगी के अंदाज़ और तौर तरीका इस्लामी नहीं है। लिहाज़ा आप से गुज़ारिश हैं की शादी जैसे मुबारक दिन का मज़ाक न बनाये। शादी में फ़िज़ूल खर्चे से बचे। जहेज़ न मांगे और जिस लड़की को अपने घर ला रहे हैं उसे अपनी ही बेटी समझ कर घर पर लाएं और लड़के और उसके परिवार को चाहिए लड़की को अहसास भी न होने दे की वह किसी पराये घर में आयी हैं। 

रजब महीने की इबादतें और उसकी फ़ज़िलतें (Rajab Mahine Ki Ibadaten or Fazilaten)

रजब महीने की इबादतें और उसकी फ़ज़िलतें

इस्लामी कलैंडर का सातवां महीना रजब का महीना कहलाता हैं। यह महीना बहुत ही बरकत वाला महीना माना जाता हैं। इस महीने में अल्लाह की तरफ से बहुत से बरकतें नाज़िल होती हैं। जो शख्स इस महीने की बरकतें हासिल करने में चूक गया गोया वह इस महीने की फ़ज़ीलत से महरूम रह गया। 

रजब का चाँद जब नज़र आता तो अल्लाह के प्यारे रसूल हाथ उठा कर यह दुआ पढ़ा करते "अल्लाहुम्मा बारिक लना फ़ी रजबियुं व शअबाना व बल्लीगना इला शहरे रमज़ान"

अल्लाह के प्यारे रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया ! जन्नत में एक नहर हैं। जिसका नाम रजब हैं। उसका पानी बहुत ही ज़्यादा सफ़ेद हैं। जो आदमी रजब के महीने में रोज़ा रखेगा। अल्लाह पाक उसे उस नहर में सैराब फरमाएगा। जिसका पानी शहद से भी ज़्यादा मीठा और बर्फ से ज़्यादा ठंडा होगा। जो आदमी रजब का रोज़ा रखेगा। उसे जहन्नम की आग कभी नहीं जलायेगी। 

एक हदीस के मुताबिक एक बार अल्लाह के प्यारे रसूल कब्रिस्तान तशरीफ़ ले गए। आपने देखा की एक शख्स का कब्र में बड़ा बुरा हाल है। उसकी कब्र जल रही थी। उसका कफ़न आग में खाक हो चूका था। वह शख्स आग में जलते हुए रो रो कर आपसे कहता हैं या रसूलल्लाह ! मुझे दोज़ख की आग जला रही हैं। मुझे इससे आज़ाद कराओ। आपने उसकी आवाज़ सुनकर फ़रमाया ! अगर तू रजब के महीने में एक रोज़ा ही रख लेता तो आज तुझे कब्र का यह अज़ाब झेलना नहीं पड़ता। प्यारे रसूल की यह बात सुनकर आप अंदाज़ा लगा सकते हो की रजब के महीने की कितनी फ़ज़ीलत हैं। जो इस महीने में इबादत और रोज़ा रखने से चूक गया गोया वह शख्स बहुत सारी नेमतों से दूर हो गया।

रजब महीने की इबादतें

 
रजब महीने की इबादतें

इबादत के लिए इस महीने में पांच रातें बहुत अफ़ज़ल हैं। पहली रात,15 वीं रात और महीने के आखिर की तीन रातें। पहली रात में मगरिब की नमाज़ के बाद 20 रकात नफ़्ल नमाज़ पढ़े। हर रकात में सूरह फातेहा के बाद तीन तीन बार कुल हुवल्लाह शरीफ पढ़े। इसकी बरकत से इंशाल्लाह आपको दीन और दुनिया के बेशुमार फायदे हासिल होंगे।

हज़रत सलमान फ़ारसी रदियल्लाहो अन्हो का बयान हैं, मेरे आका ने एक दिन मुझसे फ़रमाया ! जो मोमिन मर्द या औरत इस महीने के शुरू में मगरिब ईशा के बीच 20 रकत नमाज़ पढ़े और हर रकात में अल्हम्दो शरीफ के बाद 3-3 मर्तबा कुल्हुवल्लाह शरीफ पढ़े तो इसकी बरकत से अल्लाह उसके गुनाहों को माफ़ फ़रमा देगा। उसके आमालो को साफ़ कर देगा और जिन्होंने इस पुरे महीने में अल्लाह की इबादत की तो अल्लाह क़यामत में ऐसे लोगों को शहीदों के साथ उठाएगा और उनके लिए जन्नत वाजिब फ़रमा देगा। उनके लिए जहन्नम की आग हराम फ़रमा देगा और ऐसे मोमिन लोग अल्लाह के महबूब बन्दे बन जायेंगे। 

इतनी फ़ज़ीलत सुन लेने के बाद हज़रत सलमान ने अर्ज़ किया या रसूलल्लाह ! मुझे इस नमाज़ का तरीका बता दीजिये। आपने फ़रमाया ! पहली रात में 10 रकात नमाज़ पढ़ो, हर रकात में सूरह फातेहा के बार 3-3 बार सूरह काफ़िरून और 3-3 बार कुल्हुवल्लाह शरीफ पढ़े 10 रकात पढ़ लेने के बाद हाथ उठा कर यह दुआ मांगो "लाइलाहा इल्लल्लाह वह्दहू ला शरीका लहू लहुल मुल्को व लहुल हम्द युहई व युमीत व हुवा हैयुल ला यमुत बियादिहिल खैर व हुवा अला कुल्ले शैइन कदीर अल्लाहुम्मा ला मानेआ लिमा मनअता वला यनफओ जलजद्द मिनकल जद्द"। इसके बाद जो दुआ मांगोगे इंशाल्लाह कबूल होगी। 

फिर रजब की 15 वी रात में दस रकात नमाज़ पढ़े। हर रकात में सूरह फातेहा के बाद 3-3 बार सूरह काफ़िरून और एक एक बार कुल्हुवल्लाह शरीफ पढ़े। नमाज़ के बाद हाथ उठा कर यह दुआ मांगे "लाइलाहा इल्लल्लाह वह्दहू ला शरीका लहू लहुल मुल्को व लहुल हम्द युहई व युमीत व हुवा हैयुल ला यमुत बियादिहिल खैर व हुवा अला कुल्ले शैइन कदीर इलाहन वाहिदन अहदन फरदन वितरन लम यत्तखिज साहिबतों वला वलदा"। इसके बाद दुआ मांगे इंशाल्लाह दुआ कबूल होगी। 

फिर आखरी रात में 10 रकात नमाज़ पढ़े। हर रकात में सूरह फातेहा के बाद 3-3 बार सूरह काफ़िरून और 3-3 बार कुल्हुवल्लाह शरीफ पढ़े। फिर नमाज़ के बाद हाथ उठा कर यह दुआ मांगे "लाइलाहा इल्लल्लाह वह्दहू ला शरीका लहू लहुल मुल्को व लहुल हम्द युहई व युमीत व हुवा हैयुल ला यमुत बियादिहिल खैर व हुवा अला कुल्ले शैइन कदीर वसल्लल्लाहो अला सैय्यदना मुहम्मदियूं व आलेहीत त्वाहेरिन वला हौला वला कुव्वता इल्ला बिल्लाहिल अलिय्यिल अज़ीम"। फिर रब से जायज़ दुआएं मांगे इंशाल्लाह वह दुआएं कबूल होगी।

सैरुल असरार में लिखा हैं, रजब के महीने में जुमा की नमाज़ के बाद और अस्र के बीच 4 रकात नफ़्ल पढ़े। हर रकात में अल्हम्दो शरीफ के बाद सात मर्तबा आयतल कुर्सी और 5 बार सूरह इखलास पढ़े सलाम फेरने के बाद "ला हौला वला कुव्वता इल्ला बिल्लाहिल कबीरिल मुतआल" 25 बार पढ़े फिर "अस्तग़्फ़िरुल्लाहिल लज़ी ला इलाहा इल्ला हुवल हैयुल कैयुम गफ़्फ़ारुजजुनूब व सत्तारुलओयूब व अतूबो इलैहि" 100 मर्तबा पढ़े। इसके बाद 100 बार दरूद शरीफ पढ़कर दुआ मांगे इंशाल्लाह दुआ कबूल होगी। 

किताबुल औराद में हैं, रजब के 27 वीं रात में 12 रकात नफ़्ल नमाज़ पढ़े नमाज़ के बाद कल्मए तम्जीद, दरूद शरीफ और इस्तिग़फ़ार 100-100 मर्तबा पढ़े। इसके बाद सजदे में सर रख कर दुनिया व आख़िरत की भलाई के लिए दुआ मांगे। इंशाल्लाह वह दुआएं कबूल होगी। 

रजब महीने की 27 वीं की रात इबादत में गुज़ारे और दिन में रोज़ा रखे। अल्लाह पाक अपने फ़ज़्ल से एक साल की इबादत का सवाब अता फरमाएगा। लिहाज़ा तमाम मुसलमानों को चाहिए की इस महीने को कोई आम महीना न समझे। ये महीना शुरू होते ही इबादत में लग जाये। खूब इबादत करे और दुआएं मांगे। इंशाल्लाह अल्लाह आपकी हर मुराद पूरी करेगा। 

कुछ ज़रूरी दीनी और इस्लामी बातें (Deeni or Islami Baten)

कुछ ज़रूरी दीनी और इस्लामी बातें (Deeni or Islami Baten)

आज के आर्टिकल में हम आपको कुछ ज़रूरी इस्लामी बातों के बारे में बताएँगे। जिनका इल्म होना आपको बहुत ज़रूरी हैं। यह बातें आपको दीन के रास्तें पर चलने और आपकी ज़िन्दगी को एक नेक राह पर चलने में बहुत मदद करेगी। इन अच्छी इस्लामी बातों को पढ़कर अगर आप इस पर अमल करते हैं तो बेशक आप काफी गुनाहों से बच सकते हैं और नेकी पा सकते हैं। 

  • लोगों से अच्छे अख़लाक़ से पेश आना और तकलीफ देने वाली हर चीज़ को रास्ते से हटा देना नेकी हैं। 
  • नेक कामों से मोहब्बत करना और बुरे कामों से नफरत करना ईमान की पहचान हैं।
  • पल भर का सब्र दुनिया की तमाम चीज़ो से बेहतर हैं। 
  • लोगों को नेक रास्ता बताने वाले लोगों पर अल्लाह की रहमतें बरसती हैं। 
  • जो मेहनत करके हलाल रोज़ी कमाता हैं वह इंसान अल्लाह के बहुत करीब रहता हैं। 
  • किसी बीमार का हाल चाल पूछने वाले और उसकी अच्छी सेहत के लिए दुआ करने वाले लोग खुदा को बहुत पसंद हैं। 
  • माँ बाप की खिदमत करने वाली औलादों की खुदा हर दुआ कबूल फरमाता हैं। 
  • अपना माल बेचने के लिए झूटी कस्में न खाया करो इससे माल तो बिक जायेगा लेकिन उसकी बरकत खत्म हो जाएगी। 
  • खुदा और अपनी मौत को हमेशा याद करो। 
  • जब भी किसी दीनी भाई या रिश्तेदार से मिलो तो सलाम ज़रूर किया करो इससे आपस में और मोहब्बत बढ़ेगी और रिश्ते और मज़बूत होंगे।
  • खाना शुरू करने से पहले बिस्मिल्लाह शरीफ ज़रूर पढ़ा करो। 
  • अपनी ज़बान पर काबू रखा करो ताकि किसी और को तुम्हारी वजह से तकलीफ न हो। 
  • चलते फिरते वक़्त कलमा और दुरुद शरीफ पढ़ा करो और हर वक़्त खुदा को याद किया करो। 
  • हमेशा लोगों से अच्छी और मीठी बातें किया करो ताकि सामने वाला शख्स हमेशा आपसे खुश रहे। 
  • हर काम को करने से पहले लोगों से सलाह मशवरा लिया करो ताकि किसी गलती का अंदाज़ा पहले ही हो जाये। 
  • शराब पीने वाले और ब्याज खाने वाले लोगों से हमेशा दूर रहा करो। 
  • हमेशा मिलकर कर साथ में खाना खाया करो।
  • सुबह उठते ही अपने माँ बाप को ख़ुशी से सलाम किया करो और अल्लाह से उनकी अच्छी सेहत की दुआ करा करो।
  • जहाँ लोग एक दूसरे की ग़ीबत बुराई कर रहे हो उस जगह पर एक पल भी रुका मत करो। 
  • आपसे बड़े लोग जैसे आपके माँ बाप या बड़े भाई आपसे गुस्से में कुछ कह दे तो उनकी बातें सुन लो उनको जवाब मत दो। 
  • ज़कात देकर लोगो को जतलाया मत करो की मैंने इतनी ज़कात निकाली हैं। किसी गरीब की मदद करके लोगों को मत बताया करो की मैंने इतनी मदद की हैं।
  • जिस घर में क़ुरान की तिलावत नहीं होती उस घर की बरकतें खत्म हो जाती हैं। रहमत के फ़रिश्ते उस घर से चले जाते हैं। 
  • जिस घर में क़ुरान की तिलावत होती हैं वह घर शैतानी वसवसे से दूर रहता हैं। 
  • सबसे बेहतर मुसलमान वह है, जो खुद क़ुरान सीखे और दूसरों को भी सिखाये। 
  • जितना हो सके लोगो की मदद किया करो ताकि खुदा तुम्हे और दौलत से नवाज़े। 
  • जनाज़े में हमेशा शरीक हुआ करो क्यूंकि एक दिन आपका भी जनाज़ा किसी गली से निकलेगा। 
  • रात को सोने से पहले वज़ू कर लिया करो ताकि पूरी रात शैतानी साये से दूर रहो।
उम्मीद करते हैं आप इन सारी इस्लामी बातों पर अमल करेंगे और दीन के रास्ते पर चलने की तरफ एक कदम बढ़ाएंगे। 

अल्लाह हाफिज 

मग़रिब की नमाज़ और उसकी अहमियत (Magrib ki Namaz ki Ahmiyat)

मग़रिब की नमाज़ और उसकी अहमियत (Magrib ki Namaz ki Ahmiyat)

मगरिब की नमाज़ का वक़्त सूरज डूबने के बाद होता हैं और तकरीबन सवा घंटे तक रहता हैं। मतलब इस सवा घंटे के बीच में आप मगरिब की नमाज़ अदा कर सकते हैं। लेकिन सूरज डूब जाने का यकीन होने पर फ़ौरन नमाज़ अदा कर लेना चाहिए। नमाज़ में देरी नहीं करना चाहिए। देर करना मकरूह हैं। अगर कोई सफर कर रहा हो और मगरिब का वक़्त होते ही नमाज़ अदा करने का मौका नहीं मिला तब फिर आप एक घंटे के अंदर मगरिब की नमाज़ अदा कर सकते है। अगर आप अपने घर पर ही हैं तो तुरंत अज़ान की आवाज़ सुनते ही मगरिब की नमाज़ अदा कर लेना चाहिए। 

सूरज डूब जाने का यकीन हो जाने के पांच मिनट बाद अज़ान पढ़ी जाये और अज़ान सुनने के बाद नमाज़ पढ़ी जाये। आजकल तो मस्जिदों में नमाज़ के वक़्त किसी कागज़ पर लिखकर वह कागज़ चिपका दिया जाता है और उसी वक़्त को देखकर अज़ान पढ़ी जाती हैं लेकिन एहतियात इसी में हैं की सूरज डूबने का ख्याल रखा जाये। ताकि नमाज़ सही वक़्त पर अदा की जाये।

मगरिब की नमाज़ की रकातें और उसकी नियत

मगरिब की नमाज़ में कुल 7 रकातें होती है जो इस तरह हैं 3 फ़र्ज़, 2 सुन्नत और 2 नफ़्ल

फ़र्ज़ नमाज़ की नियत- नियत की मैंने तीन रकात नमाज़ फ़र्ज़ वास्ते अल्लाह तआला के पीछे इस इमाम के वक़्त मगरिब का मुँह मेरा काबा शरीफ की तरफ फिर अल्लाहो अकबर कहते हुए नमाज़ अदा करे (ध्यान रहे की नियत करते वक़्त पीछे इस इमाम के उसी वक़्त कहे जब आप इमाम साहब के पीछे नमाज़ अदा कर रहे हो अगर आप अकेले नमाज़ पढ़ रहे हो तब पीछे इस इमाम के कहने की ज़रूरत नहीं)

2 रकात सुन्नत नमाज़ की नियत- नियत की मैंने 2 रकात नमाज़ सुन्नत वास्ते अल्लाह तआला के पीछे इस इमाम के वक़्त मगरिब का मुँह मेरा काबा शरीफ की तरफ फिर अल्लाहो अकबर कहते हुए नमाज़ अदा करे।  

इन दोनों नमाज़ो को मगरिब की नमाज़ में पढ़ना ज़रूरी है नहीं पढ़ेंगे तो आप गुनहगार होंगे।

तीसरी नमाज़ नफ़्ल नमाज़ हैं जिसमे 2 रकात होती है। इसकी नियत भी उसी तरह हैं जैसे 2 रकात सुन्नत नमाज़ की नियत हैं बस आपको इस नमाज़ में नफ़्ल नमाज़ बोलना हैं और इस नमाज़ में आपको वक़्त का नाम लेना ज़रूरी नहीं। क्यूंकि किसी भी वक़्त की नमाज़ में नफ़्ल ज़रूरी नहीं। नफ़्ल मकरूह औकात के अलावा कभी भी पढ़ी जा सकती हैं। नफ़्ल की नमाज़ की बड़ी फ़ज़ीलत है। इससे आपको फैज़ हासिल होगा।

मगरिब के बाद 6 रकात नफ़्ल नमाज़ पढ़ने की बड़ी फ़ज़ीलत आयी हैं। इसे नमाज़े औवाबीन कहा जाता हैं। 2 -2 रकात की नियत से 6 रकात नफ़्ल नमाज़ अदा करे। और इसे पाबन्दी से अदा करते रहे। इंशाल्लाह आपको बेपनाह फैज़ हासिल होगा।

इसी तरह मगरिब की नमाज़ के बाद पाबन्दी से सूरए वाक़ेआ पढ़ते रहे। जिसकी बरकत से गरीबी दूर हो जाएगी और कारोबार में खैर बरकत होगी।

इसके अलावा मगरिब की नमाज़ के बाद 2 रकात नमाज़ "सलातुल असरार" पढ़ना बहुत फायदेमंद है। जब कोई मुश्किल या परेशानी हो तब इस नमाज़ की बरकत से वह परेशानी दूर हो जाएगी।

इस नमाज़ में हर रकात में अल्हम्दो शरीफ के बाद 11 -11 बाद कुल्हुवल्लाह शरीफ पढ़े। फिर नमाज़ ख़त्म हो जाने के बाद 11 बार दुरुद शरीफ पढ़े। फिर 11 बार यह पढ़े "या रसूलल्लाह या नबीयल्लाह अगिस्नी वम दुदनी फ़ी क़ज़ाए हाजती या काज़ियल हाजात। फिर बाग्दाद् शरीफ की तरफ 11 कदम चलें। हर कदम पर यह दुआ पढ़े या "गौसस सकलैन या करीमत तरफ़ैन अगिस्नी वम दुदनी फ़ी क़ज़ाए हाजती या काज़ियल हाजात"। फिर रसूले अकरम के वसीले से दुआ मांगे। इंशाल्लाह आपकी हर तकलीफ व परेशानी दूर हो जाएगी।

अल्लाह हम सब को पांच वक़्त की नमाज़ का पाबंद बनाये आमीन।  

इस्लामी शरीयत के कुछ ज़रूरी नियम और तौर तरीके

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