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पीर कौन होते हैं? और कौन हो सकते हैं?

पीर कौन होते हैं? और कौन हो सकते हैं?

आजकल आप सुनते होंगे ये साहब पीर हैं और हम इनके मुरीद हैं। तो आज जानेंगे आखिर पीर कौन होते हैं? और पीर कैसे बना जा सकता हैं? पीर वह हो सकता हैं, जो आपको रब की तरफ जाने का रास्ता दिखाए। कहने का मतलब जो आपको अल्लाह के बताये रास्तों पर चलने को कहे। ध्यान रहे की पीर का मर्तबा जितना बड़ा हैं। उतना ही मुश्किल व खतरनाक हैं। यह इतना बड़ा बोझ हैं, जिसे हर कोई नहीं उठा सकता। पीर होना ज़िम्मेदारियों का एक ज़बरदस्त पहाड़ हैं। पीर बन जाना कोई आसान काम नहीं हैं बल्कि जान खोदने से भी ज़्यादा मुश्किल काम हैं। 

मगर अफ़सोस आजकल लोगों ने इसे एक खेल तमाशा समझ लिया हैं। जिसे देखो वही अपने आपको एक पीर बता रहा है और लोगो को अपना मुरीद बनाकर फख्र करता हैं की मेरे इतने सारे मुरीद हैं और उनके मुरीदो को भी कह देता है की मेरा प्रचार प्रसार करो। उन पीर मुरीदों को पता नहीं की आखिर हक़ीक़त में पीर क्या होता हैं? पीर कैसा होना चाहिए? मुरीद किसे कहते हैं? और कोई अपने आपको पीर बता रहा हैं तो पहले उसे जानना चाहिए की हम पीर बनने के काबिल है भी या नहीं। कोई सिर्फ दाढ़ी मूँछ बढाकर पगड़ी बांधने या गले में छल्ले तावीज़ पहनने से पीर नहीं बन सकता। 

आजकल पीर की आड़ में लोगों ने अपना एक धंधा बना लिया हैं। जो की शरीयत के हिसाब से बिलकुल गलत हैं। ऐसे लोग अगर अपने आप को पीर बताये तो आपको ऐसे लोगो से बचना चाहिए। 

आज हम आपको बताएँगे की एक पीर में क्या क्या खूबियां होना चाहिए तब जाकर वह पीर बनने लायक हो सकता हैं। 

  • पीर वही बन सकता हैं जो क़ुरान मजीद और शरीयत के मसाइल की जानकारी रखता हो। कोई भी जाहिल आदमी जिसे क़ुरान और शरीयत का इल्म नहीं वो पीर नहीं बन सकता। 
  • पीर वह नहीं बन सकता हैं जो गुमराह जमाअतों से ताल्लुक रखता हो। जो लोगो को गुमराही के रास्तो पर चलने को कहता हो। 
  • पीर वह बन सकता हैं जो सुन्नत व शरीयत का पाबंद हो। जो गुनाहे कबीरा सग़ीरा से बचता हो। सुन्नत दाढ़ी रखता हो नमाज़ रोज़े का पाबंद हो। 
  • जो आदमी शरीयत के खिलाफ काम करे वह पीर बनने लायक नहीं। 
  • पीर का सिलसिला नबी करीम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम तक पहुँचता हो। उसके बीच में कही टूटता न हो। कहने का मतलब जो पुराने पीर रह चुके हैं अगर उनकी औलादें उन पीर के मरने के बाद अगर अपने आपको पीर बताये अगर उनमे पीर बनने जैसे कोई गुण न हो तो वो भी गलत हैं। ऐसे को मुरीद होना हराम हैं। 
  • फ़र्ज़ व वाजिब अरकान अदा करने के अलावा तरह तरह के वज़ीफ़ों का आमील हो। 
  • लोगों को नेक रास्ते पर चलने और गलत कामों को करने के लिए मना करता हो। 
  • अपने मुरीदों का बराबर ध्यान रखता हो और उन्हें शरीयत के खिलाफ काम करने पर टोकता हो। 

अगर कोई पीर हैं तो उसे चाहिए की वह फ़ौरन किसी को अपना मुरीद न बनाये। पहले उसे शरीयत का पाबंद करके और कुछ नसीहत करके जाने दे। अगर किसी मुरीद को सच्ची अकीदत होगी तो वह दोबारा हाज़िर होगा। मुरीद को चाहिए अगर कोई पीर होने का दावा कर रहा हैं उसके बारे में पहले अच्छे से जान ले। आजकल के कुछ लोग अपने आपको पीर बताने लग गए हैं और पहले नज़राने की मांग करते हैं। उन्हें मुरीद से मतलब नहीं चाहे वो कैसा भी हो। कुछ लोग आसपास के लोगो को यह बताते हैं की हमारे मुरीद हो जाओ तुम्हारा सब परेशानी और काम ठीक हो जायेंगे। ऐसे लोगो का मुरीद बनने से पहले उनके बारे में जान ले की आखिर में ऐसे लोग पीर है भी या नहीं। 

पीर को चाहिए की मर्दो का हाथ अपने हाथ में लेकर बैअत करे और औरतों को परदे में बिठाकर अपना रूमाल, अमामा, पकड़ा कर मुरीद बनायें और मुरीद बनाते वक़्त उन्हें शरीयत की पाबन्दी की सख्त ताकीद करे। औरतों को बेपर्दा या हाथ पकड़ कर मुरीद बनाना जाइज़ नहीं। जो पीर यह कहते हैं की औरत को पीर से पर्दा करने की ज़रूरत नहीं। मुरीद हो जाने के बाद औरत पीर की बेटी बन जाती हैं। यह कहना बिलकुल गलत हैं और शैतानी ख्याल हैं। औरतों को अपने पीर से भी पर्दा करना चाहिए।

पीर के लिए ज़रूरी हैं की अपने मुरीदों को इस्लाम की अच्छी तालीम से रूबरू करवाए। तरह तरह के वज़ीफ़ों को पढ़ने का तरीका सिखाये। खुदा के रास्ते पर चलने की राह दिखाए। जिससे मुरीदों में एक रूहानी इंक़ेलाब पैदा हो सके जिससे वह दीन का पाबंद हो जाये। 

क़ुरान मजीद खुदा का कलाम (Quran Majeed Khuda Ka Kalam)

क़ुरान मजीद खुदा का कलाम (Quran Majeed Khuda Ka Kalam)

क़ुरान मजीद खुदा का वह कलाम हैं जो हज़रत जिब्राइल अलैहिस्सलाम के ज़रिये हमारे प्यारे रसूल पैगम्बर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम पर नाज़िल हुआ। क़ुरान मजीद एक ही बार में हमारे रसूल पर नहीं नाज़िल हुआ बल्कि जब जब जैसे जैसे ज़रूरत पड़ी आप पर उतरता रहा। उसकी शुरुआत गारे हिरा से हुई और पूरा क़ुरान नाज़िल होने में 23 साल लग गए। 

क़ुरान मजीद अल्लाह की वह मुबारक किताब हैं जो लोगो की हिदायत के लिए नाज़िल हुई हैं। इसलिए उसमे इंसानी फ़लाह बहबूत की हर बात मौजूद हैं। जो हमारी रहनुमाई करती हैं। इसके बाद अब किसी और किताब की ज़रूरत नहीं रही। इसमें पैदाइश से लेकर मौत और उसके बाद तक के हालात मौजूद हैं। इबादत, तिजारत, सियासत, दीन और दुनिया की भलाई की हर तालीम क़ुरान में मौजूद हैं। यह किताब दुनिया वालों को हक़ की तरफ बुलाती और रहनुमाई करती हैं और बुराइओं से रोकती हैं। 

कुफ्फारे मक्का इसे बेबुनियाद और बनावटी किताब कहा करते थे और इसमें मौजूद आयतों को जादू बताते। उनकी इस बकवास पर उनका मुँह बंद करने के लिए अल्लाह पाक ने फ़रमाया ! हमने अपने रसूल पर जो किताब उतारी हैं अगर उसके कलामे इलाही होने में तुम्हे शक हैं तो तुम उस जैसी कोई आयत या सूरत पेश करके बताओ। अगर तुम अपने दावे में सच्चे हो तो अपने सारे मददगारों को भी बुलवा लो और उन सब की मदद से एक ही आयत बना कर बता दो। लेकिन कोई भी क़ुरान जैसी एक भी आयत पेश ना कर सका। फिर भी जिनके नसीब में ईमान नहीं था वह महरूम ही रहे और आज भी महरूम हैं। क़ुरान का यह चैलेंज आज भी बाकि हैं और क़यामत तक बाकि रहेगा। 

यूँ तो तौरात, ज़बूर, इन्जील भी आसमानी किताबी थी लेकिन आज उनमे से एक भी किताब अपनी असली हालत में मौजूद नहीं। क्यूंकि उनके मानने वालो ने उसमे अपनी तरफ से ज़बरदस्त हेराफेरी कर रखी हैं। आज वह काबिले कबूल नहीं रही। क़ुरान मजीद के पहले पन्ने पर यह एलान कर दिया गया हैं की यह अल्लाह की किताब हैं। इसमें कोई शक शुब्हे की गुंजाइश नहीं। क़ुरान पाक की हिफाज़त की ज़िम्मेदारी खुद अल्लाह पाक ने ले रखी हैं। यही वजह हैं की दुनिया में लोगों ने इसमें हेरा फेरी करने की लाख कोशिश की लेकिन वह कामयाब ना हो सके। क़ुरान आज दुनिया के कोने कोने में करोड़ो मोमिनो के सीने में महफूज़ हैं और इंशाअल्लाह आगे भी मौजूद रहेगा। आज दुनिया के कोने कोने में आबाद मुसलमान चाहे कोई भी ज़बान बोलता हो लेकिन उनके दिलों में अरबी क़ुरआन महफूज़ हैं। यही तो क़ुरान मजीद को मोज़ेज़ा हैं। सुभानअल्लाह ।

आज दुनिया में जितनी भी किताब पढ़ी जाती हैं उनमे सबसे ज़्यादा क़ुरान मजीद की तिलावत होती हैं। क़ुरान मजीद ऐसी किताब हैं जो दुनिया के हर हिस्से में हर दिन हर पल पढ़ा जाता हैं। सुभानअल्लाह । दुनिया में ऐसे कितने ही खुशनसीब मौजूद हैं जो रोज़ाना क़ुरान मजीद की तिलावत करते हैं। 

क़ुरान का फैज़ान ऐसा हैं की गैर मुस्लिम लोग भी इसे पढ़ने और समझने को कोशिश करते हैं। याद रखिये क़ुरान मजीद एक मुबारक किताब हैं। इसे सिर्फ घरों में रखने या दिखाने या धुल खाने के लिए ना रखे। यह अल्लाह की एक मुबारक किताब हैं। जो लोगों को हिदायत का रास्ता बताती हैं। इसे पढ़ना भी चाहिए और समझना भी चाहिए और अल्लाह से उस पर अमल करने की तौफीक भी मांगनी चाहिए। अल्लाह हमें क़ुरान को शौक से पढ़ने और उस पर अमल करने की तौफीक अता फरमाए आमीन ।

हज़रत बीबी सारा और मिस्र के बादशाह का किस्सा

हज़रत बीबी सारा और मिस्र के बादशाह का किस्सा

हज़रत बीबी सारा हज़रत इब्राहिम खलीलुल्लाह की पहली बीवी थी। आप बहुत खूबसूरत और नेक सीरत थी। हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम जब आपको लेकर मिस्र तशरीफ़ लाये, तब उस वक़्त का बादशाह सिनान बिन अलवान था। जो की एक बहुत बड़ा ज़ालिम फ़िरऔन था। उस वक़्त मिस्र के बादशाह को फ़िरऔन कहा जाता था। उस बादशाह की एक आदत बहुत ख़राब थी की जब भी कोई परदेसी उसके शहर में आता अगर उसकी बीवी खूबसूरत होती तो वह बादशाह उसकी बीवी को अपने महल में रख लेता। चूँकि हज़रत सारा बड़ी खूबसूरत थी। इसलिए हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम को हमेशा फ़िरऔन का डर लगा रहता। कुछ दिनों तक तो वह छुप कर रहे लेकिन बादशाह के जासूसों ने उनका पता लगा लिया। 

जब बादशाह के जासूसों ने आपकी खबर बादशाह को दी तो बादशाह ने अपना एक आदमी हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम के पास भिजवाकर कहलवाया की हमें मालूम हुआ की तुम्हारे पास एक खूबसूरत औरत हैं इसलिए तुम फ़ौरन उसे मेरे पास भेज दो अगर मेरा हुक्म नहीं माना तो क़त्ल कर दिए जाओगे।

हज़रत इब्राहिम ने सारी बात बीवी सारा को बताते हुए कहा की बादशाह की बात नहीं मानेंगे तो दोनों को जान से हाथ धोना पड़ेगा। अगर खुदा को तुम्हारी इज़्ज़त आबरू का ख्याल हैं तो कोई भी तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ सकेगा। काफी देर सोचने समझने के बाद हज़रत बीबी सारा बादशाह के पास जाने के लिए तैयार हो गयी। क्यूंकि उनको और हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम को खुदा पर पूरा भरोसा था। फिर हज़रत इब्राहिम और हज़रत बीबी सारा ने 2 रकात नमाज़ अदा की और दुआ के लिए हाथ उठाये और फ़रमाया या इलाही ! मैं तुझ पर और तेरे रसूल पर ईमान लायी हूँ। किसी ज़ालिम काफिर को मेरे ऊपर हावी न होने देना। मेरी इज़्ज़त व आबरू की हिफाज़त करना। फिर नमाज़ और दुआ से फारिग होकर आप बादशाह के शाही नौकर के साथ बादशाह के दरबार पहुंची।

आपकी खूबसूरती को देखकर बादशाह हैरान रह गया और अपने नापाक इरादों से मुस्कुराता हुआ जैसे ही आपकी तरफ बढ़ा और करीब पहुँचने पर जैसे ही उसने अपने दोनों हाथ हज़रत बीबी सारा की तरफ बढ़ाये, उसी वक़्त उसका दम घुटने लगा और वह ज़मीन पर गिरकर तड़पने लगा और हज़रत बीबी सारा से बड़ी इज़्ज़त से बोला ! खुदा के लिए मुझे इस मुसीबत से बचाइए। मैं आपको हाथ लगाने की गलती कभी नहीं करूँगा। आप हज़रत बीबी सारा ने दरबारे इलाही में अर्ज़ किया या मौला ! अगर यह सच कह रहा हैं तो इसको इस मुसीबत से निजात दिला दे। खुदा ने आपको दुआ कबूल फ़रमा ली और उस बादशाह का उसी वक़्त दम घुटना बंद हो गया। 

फिर कुछ देर बाद वापिस शैतान ने उसका दिमाग बदल दिया और बादशाह फिर वही हरकत करने लगा। 3 बार बादशाह ने ऐसा ही किया। 3 बार अपने अंजाम में नाकाम रहने पर उसे यकीन हो गया की मैं अपने नापाक इरादे में अब कामयाब नहीं हो पाउँगा। यह औरत कोई अल्लाह वाली मालूम होती हैं और फिर वह बादशाह अपनी हरकत से बाज़ आया और अपनी बेटी हाजरा को आपकी खिदमत के लिए देकर बड़ी इज़्ज़त से आपको विदा किया।

घर आकर जब आपने सारी कहानी सुनाई तो हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम ने खुदा का शुक्र अदा किया। कुछ ही दिनों बाद आप बीवी सारा और हाजरा (बादशाह के बेटी) को लेकर मिस्र से बयतुल मुक़द्दस की तरफ चले गए। अभी तक आपके औलाद नहीं थी। फिर भी बेटे की बशारत मिली थी। एक दिन आपकी बीवी हज़रत सारा आपसे कहने लगी ! मुझे तो औलाद की अब कोई उम्मीद नहीं रही इसलिए आप हाजरा से निकाह कर लीजिये। अल्लाह का वादा शायद उन्हीं से पूरा हो। हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम ने हज़रत हाजरा से निकाह कर लिया और अल्लाह ने एक साल के बाद आपको एक बेटा अता फ़रमाया। जिसका नाम इस्माइल रखा गया

हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम की आदत थी की आप मेहमानो को साथ लेकर खाना खाया करते थे। इत्तेफ़ाक़ से 15 दिन तक आपके यहाँ जब कोई मेहमान नहीं आया तो आपको बड़ी फ़िक्र हुई। आप उसी फ़िक्र और मेहमानों के इंतज़ार में घर के बाहर बैठ गए। थोड़ी देर बाद 3 आदमी दिखाई पड़े आप बड़े खुश हुए। आपने उनका शानदार इस्तेकबाल फ़रमाया और उनके सामने खाना पेश फ़रमाया। जब मेहमानों के हाथ खाने के और बढे तो आपको बड़ी हैरानी हुई। मेहमानों ने आपसे कहा ! आप डरिये मत हम इंसान नहीं बल्कि फ़रिश्ते है। एक का नाम जिब्राइल दूसरे का नाम इस्राफील और तीसरे का नाम मिकाइल हैं। हम हज़रत लूत की कौम को उनकी सरकशी की सजा देने के लिए जा रहे हैं और आपको खुशखबरी सुनाने आये हैं की आपकी पहली बीवी हज़रत सारा के पेट से एक लड़का पैदा होगा। 

हज़रत सारा वही पर पीछे बैठी हुई थी और यह बात सुनकर हंसने लगी और फ़रमाया मैं 90 साल की और मेरे शौहर 120 साल के हो चुके हैं। अब क्या मेरे लड़का होगा ? फरिश्तों ने फ़रमाया ! क्या अल्लाह की कुदरत पर आपको तअज्जुब हैं? अल्लाह की रहमत व बरकत से कभी ना उम्मीद नहीं होना चाहिए। इतना कहकर फ़रिश्ते चले गए और हज़रत सारा बेटे का इंतज़ार करने लगी। चुनांचे एक साल के बाद अल्लाह ने उन्हें बेटा अता फ़रमाया। जिनका नाम इस्हाक़ रखा गया। हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम वह खुशनसीब पैगम्बर हैं। जिनके दोनों बेटे नबी हुए। इसलिए आपको अबुल अम्बिया कहा जाता हैं। हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम ने 195 की उम्र पायी और हज़रत सारा ने 127 साल की उम्र पायी। 

इस्लामी रोज़े और उसकी बरकतें (Islami Roze Or Uski Barakaten)

इस्लामी रोज़े और उसकी बरकतें (Islami Roze Or Uski Barakaten)

रोज़ा एक ऐसी इबादत हैं जो हर ज़माने व मज़हब में एक अहम इबादत हैं। रोज़ा रखने से रूहानी और जिस्मानी हर तरह के फायदे हासिल होते हैं। रोज़े का मतलब नफ़्स को गुनाहों से पाक करना हैं। रोज़ा रखने से दिल रोशन होता हैं। जिसकी वजह से इबादत का शौक पैदा होता हैं। अल्लाह के रसूल फरमाते हैं ! रोज़ा एक इबादत हैं। रोज़े से बन्दा गुनाहो से बचता हैं रोज़े की हालत में बन्दा अल्लाह के ज़्यादा करीब रहता हैं। रोज़ेदार बन्दों को अल्लाह बहुत पसंद करता हैं।

हदीस शरीफ में आया हैं रोज़ा जहन्नम से बचाता हैं। रोज़ा इबादतों का दरवाज़ा भी कहा जाता हैं। इसलिए बिना किसी शरई मज़बूरी के इसे नहीं छोड़ना चाहिए। रोज़े की बदौलत इंसान की ज़िन्दगी में एक इंक़लाब आता हैं। रोज़ा एक ऐसी बेमिसाल इबादत हैं जिससे अमीर गरीब का फ़र्क ख़तम हो जाता हैं। रोज़े की हालत में सभी बराबर रहते हैं। पूरी दुनिया में ऐसा कोई इलाका नहीं जहाँ रोज़े न रखे जाते हो। 

रोज़े तो हज़रत आदम अलैहिसल्लाम के ज़माने से आज तक जारी हैं। क़ुरान शरीफ में कई जगह रोज़े का बयान आया हैं। हज़रत नूह अलैहिस्सलाम के ज़माने में हर महीने 3 रोज़े रखने का हुक्म था। हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम हर एक दिन छोड़कर रोज़ा रखते थे। हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम जब रब से मुलाकात के लिए तशरीफ़ ले गए तो रोज़े में नहीं थे। रब ने फ़रमाया ! अगर मुझ से मुलाकात करना चाहते हो तो अभी जाओ और 10 रोज़ा और रखकर रोज़े की हालत में ही आना। क्यूंकि रोज़ेदार के मुँह की महक मुझे बहुत पसंद हैं।

रमजान का रोज़ा फ़र्ज़ होने से पहले हमारे रसूल सिर्फ आशूरा 10 वीं मुहर्रम का रोज़ा रखते थे। उस ज़माने में ईशा की नमाज़ के बाद ही खाना पीना वगैरह छोड़ दिया जाता था। लेकिन ये परहेज़ बड़ा मुश्किल था। इसलिए हमारे मेहरबान रब ने हम पर मेहरबानी फरमाते हुए फ़रमाया ! इफ्तार के बाद से फज्र का वक़्त होने से पहले तक तुम खा पी सकते हो।

रमज़ान के रोज़े सन 2 हिजरी में फ़र्ज़ हुए। इस से पहले वाले सारे रोज़े नफ़्ल करार दे दिए गए। रमज़ान के रोज़े फ़र्ज़ होने से पहले आशूरा का रोज़ा,13, 14,15 तारीख का रोज़ा, सोमवार और जुमेरात का रोज़ा और दूसरे और रोज़े नफ़्ल रोज़े की तरह रखे जाते थे। कोई भी रोज़ा फ़र्ज़ नहीं था। जैसा की आज के ज़माने में रमज़ान के रोज़े फ़र्ज़ हैं। इस्लाम से पहले यहूदी लोग भी आशूरा के दिन रोज़ा रखा करते थे। क्यूंकि हज़रत मूसा ने उसी दिन फ़िरऔन के हाथ से निजात पायी थी। इस वजह से यहूदी शुक्राने में यह रोज़ा रखते थे। रमज़ान के रोज़े फ़र्ज़ होने के बाद यह रोज़े मुस्तहब ही रह गए। यानि जिसका जी चाहा उसने रखा जिसका जी चाहा उसने न रखा। रमज़ान का रोज़ा जब फ़र्ज़ हुआ तब सेहरी का भी हुक्म दिया गया और रात में खाने पीने और बीवी के साथ सोहबत करने की भी इजाज़त दी गयी।

रमज़ान के अलावा सहाबा को रोज़ की बरकतें हासिल करने की बड़ी तमन्ना रहा करती। यही वजह हैं की कुछ सहाबा अपने नफ़्स की इस्लाह के लिए लगातार रोज़े रखने लगे और कई कई दिनों तक कुछ खाते पीते न थे। अल्लाह के रसूल को जब उनकी हालत के बारे में जानकारी हुई तो आपने इन्हें ऐसा करने से सख्ती से मना कर दिया। क्यूंकि लगातार रोज़ा रखने की वजह से बदन में ज़्यादा कमज़ोरी आ जाती हैं। जिसकी वजह से आदमी अपने और अपने घर वालो के गुज़ारे के लिए मेहनत मज़दूरी नहीं कर सकता। 

अल्लाह के रसूल रमज़ान के अलावा हर महीने में पीर और जुमेरात को रोज़ा रखा करते थे। इसके बारे में रसूल फ़रमाया करते ! इन्हीं दिनों में बन्दों के आमाल अल्लाह के दरबार में पेश किये जाते हैं। इसलिए मैं चाहता हूँ की रोज़े की हालत में पेश हो ताकि रब राज़ी हो जाये।

इसके अलावा आप मुहर्रम में पहली से दसवीं तारीख तक और ईद में 2 से 7 तारीख तक रोज़ा रखा करते थे। बहरहाल रोज़ा एक बहुत बड़ी इबादत और नेमत हैं। रोज़ा आपको गुनाहो से बचाता हैं। आपके पिछले गुनाहो को माफ़ फरमाता हैं। इसलिए रमज़ान में पुरे एक महीने के रोज़े फ़र्ज़ किये गए, ताकि खुदा के नेक बन्दे इसकी बरकत से सवाब पा सके और नमाज़ो के परहेज़गार बन सके।

अल्लाह तआला से यही दुआ हैं की हम सब को रमज़ान के महीने के पुरे रोज़े रखने और उसकी बरकतें हासिल करने की तौफीक अता फरमाए आमीन।

रबीउल औवल महीने की इबादतें (Rabi-ul-Awwal ki Ibadaten)

रबीउल औवल महीने की इबादतें (Rabi-ul-Awwal ki Ibadaten)

रबीउल औवल इस्लामी साल का तीसरा महीना हैं। कुछ इलाको में इसे बारावफात का महीना भी कहा जाता हैं। लेकिन रबीउल औवल को बारावफात का महीना कहना गलत हैं। इस महीने का चाँद देखकर सूरए मुजादिला पढ़े और बहता पानी देखे। अगर इतना न हो सके तो कम से कम सूरए कौसर पढ़ कर बहता पानी देखे। इस मुबारक महीने की 12 वीं तारीख 571 ई. सुबह में अल्लाह के प्यारे रसूल हज़रत मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम दुनिया में तशरीफ़ लाये। इसलिए हमें आपकी पैदाइश की ख़ुशी में नए कपड़े पहनना, सदक़ा खैरात करना चाहिए। 

रबीउल औवल के महीने में की जाने वाली कुछ ज़रूरी इबादतें 

12 वीं की रात 2 -2 रकात की नियत से 20 रकात नमाज़ पढ़कर उसका सवाब सरकारे दो आलम हज़रत मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम की रूह को पेश करे। 

इस महीने की पहली रात में 4 रकात नफ़्ल पढ़े। हर रकात में अल्हम्दो शरीफ के बाद 7 -7  बार कुल्हुवल्लाह शरीफ पढ़े। अल्लाह पाक आपको इसकी बरकत से 700 साल की इबादत का सवाब अता फरमाएगा। 

12 वीं की रात या दिन में 10 रकात नफ़्ल नमाज़ पढ़े। हर रकात में अल्हम्दो शरीफ के बाद 11 -11 बार कुल्हुवल्लाह शरीफ पढ़े। फिर इसका सवाब सरकार की रूह को पेश करे। अल्लाह पाक इस इबादत की बरकत से पढ़ने वालो को जन्नत में खास मुकाम अता फरमाएगा। 

12 वीं की तारीख को 607 बार कुल्हुवल्लाह शरीफ पढ़े और इसका सवाब सरकार की बारगाह में पेश करे। इंशाअल्लाह आप बेहिसाब सवाबो के हक़दार होंगे। 

इस महीने में पांच हज़ार बार दुरुद शरीफ पढ़ कर सरकार की बारगाह में नज़र करे। इस की बरकत से अल्लाह पाक आपके गुनाह बख्श देगा  और पढ़ने वाले को सरकार की शफ़ाअत नसीब होगी। 

जो शख्स इस महीने में सवा लाख बार अस्सलातो वस्सलामो अलैका या रसूलल्लाह पढ़ेगा। इंशाल्लाह उसे सरकार की ज़ियारत नसीब होगी। 

12 वीं तारीख को दुरूदे अकबर, दुरूदे लक्खी, दुरूदे हज़ारी, दुरूदे ताज वगैरह खूब खूब पढ़ने की कोशिश करे ताकि 12 वीं वाले आका के रूहानी फैज़ से आप मालामाल हो सके। 

इसके अलावा सदक़ा खैरात करना, दोस्त अहबाब को खाना खिलाना, तोहफे पेश करना भी सवाब का काम हैं। अल्लाह हमें इस मुबारक महीने में इबादत करने की तौफीक अता फरमाए आमीन।

पैगम्बर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम की खूबियां और चमत्कार

पैगम्बर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम की खूबियां और चमत्कार

हमारे नबी पैगम्बर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम में ऐसी कई खूबियां और खसूसियत थी, जिनके बारे में काफी लोगो को मालूमात नहीं हैं। आज के इस आर्टिकल में हम आपको उनकी कुछ खूबियां चमत्कार और खसूसियत के बारे में बताएँगे। 

अल्लाह पाक ने सब से पहले अपने नूर से अपने प्यारे रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के नूर को पैदा फ़रमाया। सब से पहले आप ही को नुबूवत बख्शी गयी। 

आपका नाम अर्श पर लिखा गया। 

हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के दुनियां में तशरीफ़ लाने की बशारतें पहली आसमानी किताबों में मौजूद थी। 

पैदाइश के वक़्त हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के बदन पर किसी तरह की कोई गन्दी चीज़ नहीं थी। 

आप की पैदाइश के वक़्त ऐसा नूर ज़ाहिर हुआ जिसकी रौशनी में आपकी वालिदा हज़रत बीबी आमेना ने ईरान के बादशाह के महल को देख लिया था। 

आप में ऐसी खूबियां थी की आप आसमान की तरफ ऊँगली से इशारा फरमाते तो चाँद इधर उधर हो जाया करता। 

आप पीठ पीछे से उसी तरह देखते थे जिस तरह सामने देखा करते थे। 

खारा पानी आपके मुबारक थूक के असर से मीठा हो जाया करता।

हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम कभी किसी पर गुस्सा नहीं किया करते थे। 

आपकी बगल सफ़ेद थी। आपकी बगल में बाल नहीं थे। 

आपकी मुबारक आवाज़ दूर दूर तक पहुँच जाया करती थी। 

आप जब छोटे थे तब फ़रिश्ते आप को झूला झुलाया करते थे। 

आप दूर दराज़ की बातें सुन लिया करते थे और आज भी आप अपनी उम्मत का पढ़ा दुरुद और सलाम सुन लिया करते हैं। 

आप को ज़िन्दगी भर कभी उबासी नहीं आयी। 

आपके मुबारक पसीने से मुश्क की (एक खास तेज़ खुशबू) आया करती थी।

आप के अलावा किसी और नबी,रसूल को मेराज नसीब नहीं हुई। (मेराज का अर्थ सीढ़ी अथवा मुलाकात है। इस रात को हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम की अल्लाह से मुलाकात की रात भी कहते हैं।

आपके लिए पूरी ज़मीन मस्जिद बना दी गयी थी।

जब आप धुप में चलते तो उस वक़्त बादल भी आप पर साया कर लिया करते थे।

हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने 1400 साल पहले ही लोगो को महामारी से बचने के तरीके बता दिए थे।  

आपकी परछाई ज़मीन पर नहीं पड़ती थी। 

आपके बदन और कपड़ो पर कभी मक्खी नहीं बैठती थी। 

आपके पेशाब वगैरह का निशान ज़मीन पर नहीं रहता था बल्कि ज़मीन उसे खा पी जाया करती थी।

आप जब किसी जानवर पर सवार होते तो वह जानवर पेशाब वगैरह नहीं करा करता था। 

आपने अपने सिर की आँखों से अपने रब का दीदार फ़रमाया। 

आप जब खुदा की राह में जिहाद (संघर्ष करना) के लिए निकलते तब फरिश्तों की फौज आपकी मदद के लिए उतरा करती। (जिहाद का मतलब अमन शांति के लिए संघर्ष करना हैं)। जिहाद कई तरह का होता हैं जैसे अन्याय के खिलाफ लड़ना, हक़ के लिए लड़ना,अमन और शांति के लिए संघर्ष करना धर्म का प्रचार करना इत्यादि।  

आपने अपनी ऊँगली मुबारक के एक इशारे से चाँद के 2 टुकड़े कर दिए थे। 

आपने हज़रत जिब्राइल अलैहिस्सलाम को उन की असली सूरत में देखा। 

सोते वक़्त आपकी आंखे बंद रहा करती लेकिन आपका दिल बेदार रहा करता था। 

अज़ान और इक़ामत में आप ही का नाम लिया जाता हैं।

आप नींद में भी अल्लाह की इबादत किया करते थे।  

क़यामत के दिन सब से पहले आप अपनी कब्र से बाहर तशरीफ़ लाएंगे आप उस वक़्त बुराक़ (जन्नती घोडा) पर सवार होंगे और 70 हज़ार फ़रिश्ते आप के साथ होंगे।

क़यामत के दिन हज़रत आदम अलैहिस्सलाम और आपकी सारी औलादें आपके झंडे की नीचे होगी।  

क़यामत के दिन हर नबी आपकी उम्मत के साथ आपके पीछे होंगे। 

सब से पहले आपको अल्लाह का दीदार नसीब होगा। 

सब से पहले आप अपनी उम्मत के साथ पुलसिरत पार करेंगे। 


इन सब के अलावा ऐसी कई खूबियां थी, जो अल्लाह ने आपको अता फ़रमाई। हमें अपने ऐसे मुअज़्ज़म नबी का उम्मती होने पर फख्र हैं। 

गुज़ारा नहीं होता? (Guzara Nahi Hota)

guzara nahi hota

आजकल काफी लोग जो अच्छी कमाई कर रहे हैं, उनको यह कहते आपने सुना होगा की साहब इतने में गुज़ारा नहीं होता। एक वक़्त वह भी था जब काम आमदनी में भी लोग अच्छी तरह से ज़िन्दगी गुज़ार लिया करते थे। उनकी ज़रूरतें उनकी मामूली आमदनी में पूरी हो जाया करती थी। लेकिन आज हालात बिलकुल बदल चुके हैं। आज आदमी खूब कमाता हैं, अच्छे से खाता हैं, बेहतरीन जोड़े पहनता हैं, अच्छे मकानों में रहता हैं, फिर भी वह शिकायत करता हैं की इस आमदनी में गुज़ारा नहीं होता। आज हर तरफ यही हाहाकार मचा हैं की इतनी तनख्वाह या आमदनी में हम खुश नहीं हैं। इसके पीछे एक बड़ी वजह यह हैं की आजकल के लोग अपने आस पास के लोगों रिश्तेदारों को देख कर अपनी ज़िन्दगी जीते हैं। कहने का मतलब ये हैं की फलाना आदमी का कोई रिश्तेदार, दोस्त या पड़ोसी बहुत अमीर हैं या अच्छा कमा रहा हैं तो आदमी यह सोचता हैं की मै ऐसा क्यों नहीं हूँ। मैं इतना अमीर क्यों नहीं हूँ। मै इतना अच्छा क्यों नहीं कमा रहा हूँ। बस यह सोच से आजकल की पीढ़ियों का चैन और सुकून गायब हो चूका हैं। लोग एक दूसरे से जलने लग गए है। नतीजा यह होता हैं की काफी लोग अच्छा कमाते हुए भी ये कहते हैं गुज़ारा नहीं होता। 

ऐसे इंसान यह हकीकत भूल गए हैं की इस दुनिया को बसाने चलाने वाला सिर्फ अल्लाह हैं। वही हमें रोज़ी देता हैं। वही हमारी ज़रूरतें पूरी फरमाता हैं। सब इंसानो की किस्मत उसके पैदा होते ही लिख ली जाती हैं की वह अपनी ज़िन्दगी में क्या करेगा और कब मरेगा। कोई इंसान इस चीज़ को बदल नहीं सकता हैं। कहने का मतलब अल्लाह ने जिस इंसान की जैसी किस्मत लिख दी उसे कोई बदल नहीं सकता। 

आजकल के लोगो को इस बात की फ़िक्र नहीं की अगर हवा बंद हो जाये तो क्या होगा? बादल न हो तो बारिश कैसे आएगी? बारिश न हुई तो पानी कौन देगा? ज़मीन न हो तो अनाज कौन देगा? ये बातें कोई नहीं सोचता। बस उन्हें फ़िक्र रहती हैं तो बस अपनी कमाई की ! अल्लाह भी ऐसे लोगो से खफा रहता हैं जो हर वक़्त यह कहते रहते हैं की घर चलाना मुश्किल हो रहा हैं। इस आमदनी में गुज़ारा नहीं हो रहा और न जाने तरह तरह की बातें। ऐसा सोचने वाले लोग कभी आगे नहीं बढ़ पाते न ही अल्लाह उनकी मदद करता हैं। बल्कि अल्लाह उनकी मदद करता हैं जो अल्लाह की दी हुई ज़िन्दगी से खुश हैं। जो अपनी कमाई अल्लाह की राह में क़ुर्बान कर देते हैं, यानि लोगो की मदद करते हैं। ज़कात खैरात देते हैं। ऐसे लोगो को अल्लाह ज़बरदस्त कामयाबी देता हैं और ऐसे लोगों को और कमज़ोर करता हैं जो हर वक़्त अपनी कमाई को कोसते हैं। 

हज़रत मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया, अगर तुमने खुदा से सोना चाँदी हीरे जवाहरात की मांग कर ली और खुदा ने अगर तुम्हे वह सब दे भी दिया और दूसरी तरफ खाने का अनाज, पीने के पानी, अगर ये खुदा ने बंद कर दिया तो इतने पैसे हीरे मोती का क्या मतलब? क्या करोगे उसे रखकर जब ज़िंदा ही नहीं रहोगे। इसलिए अल्लाह से हर वक़्त यह दुआ करें की उसने जो भी चीज़े दुनिया में बनायीं हैं, चाहे वो खाना हो या पानी चाहे पैसा हो या अच्छा मकान, आप हर वह चीज़ जो आप अपनी ज़िन्दगी में चाहते हो उसे पाने के लिए हर वक़्त अल्लाह से सच्चे दिल से दुआ करें, उसको पाने के लिए मेहनत करें। बेशक अल्लाह आपको वो हर चीज़ देगा जिसकी ख़्वाहिश आप रखते हैं और अल्लाह का हर वक़्त शुक्र अदा करें की अल्लाह ने आपको यह कीमती ज़िन्दगी दी हैं। जिससे आप जी रहे है। 

मुसीबतें और परेशानियां तो अल्लाह की दी हुई एक आज़माइश हैं। अल्लाह भी देखता हैं की मेरे बन्दे किस वक़्त मुझे याद करते हैं, क्यूंकि मुसीबतों के वक़्त तो लोगों को अल्लाह की याद आ जाती हैं और सब कुछ सही चल रहा हो तो कोई खुदा को याद नहीं करता। फिर भी अल्लाह बड़ा मेहरबान हैं। वह अपने बन्दों को ज़िंदा रखने के लिए उनकी हर ज़रूरते पूरी कर रहा हैं जिससे वो दुनिया में जी सके। 

लेकिन आजकल का इंसान ऐसा नहीं रहा। उसे अल्लाह का बिलकुल खौफ नहीं रहा। वह दौलत के नशे में इस कदर चूर हो चुका हैं की जो चीज़े शरीयत के खिलाफ हैं। वह कर रहा हैं।आज इंसान हलाल और हराम में फर्क नहीं करता, उसे बस पैसो से मतलब हैं चाहे जैसा भी काम हो। ये एक बहुत बड़ी तबाही का एक इशारा हैं। ऐसे लोगों का आख़िरत में जो हश्र होगा अगर वह सपने में उसकी हक़ीक़त देख ले तो वह सोच कर ही डर से मर जाये। आपको ये बता दे की ऐसी चीज़े क़यामत का एक इशारा हैं। आप ऐसी गलत चीज़ों,कामों से बचे। 

आखिर में यही सलाह देंगे की आप हर वक़्त अपने रब का शुक्र अदा करें क्यूंकि उसने हर वो चीज़ जिससे आप ज़िंदा हो वो आपको दी हैं। गलत कामों से बचे।अपने आस पास के लोगों से जलना बंद करे। चाहे कोई कितना भी अमीर हो अगर वो हलाल कमाई से अमीर बना हैं तो बिलकुल उसके जैसा बनने की सोचे और मेहनत करें। अल्लाह आपकी मदद करेगा। दूसरी तरफ अगर कोई झूठ फरेब हराम कमाई से अमीर बना हैं तो उसके आस पास भी न घूमे क्यूंकि ऐसे लोग ज़िंदा शैतान की तरह हैं। जो मांगना हैं अल्लाह से मांगे। अगर कोई आप को ऐसा बोल रहा हैं की तुम कहाँ हम कहाँ वगैरह बातें तो उनकी बातों पर ध्यान न दो। क्यूंकि अल्लाह सब देख रहा हैं वह ऐसे इंसानो को किसी न किसी दिन उनके ऐसे बर्ताव का हश्र ज़रूर देता हैं और आखिर में सबसे बड़ी बात आप जो कमा रहे हैं, उसका अल्लाह से शुक्र अदा करें और दुआ करो की अल्लाह तुम्हे इतनी दौलत दे की तुम ज़्यादा से ज़्यादा गरीबो मिस्कीनों के लिए ज़कात खैरात दे सको।  आमीन

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