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कुछ ज़रूरी दीनी और इस्लामी बातें (Deeni or Islami Baten)

कुछ ज़रूरी दीनी और इस्लामी बातें (Deeni or Islami Baten)

आज के आर्टिकल में हम आपको कुछ ज़रूरी इस्लामी बातों के बारे में बताएँगे। जिनका इल्म होना आपको बहुत ज़रूरी हैं। यह बातें आपको दीन के रास्तें पर चलने और आपकी ज़िन्दगी को एक नेक राह पर चलने में बहुत मदद करेगी। इन अच्छी इस्लामी बातों को पढ़कर अगर आप इस पर अमल करते हैं तो बेशक आप काफी गुनाहों से बच सकते हैं और नेकी पा सकते हैं। 

  • लोगों से अच्छे अख़लाक़ से पेश आना और तकलीफ देने वाली हर चीज़ को रास्ते से हटा देना नेकी हैं। 
  • नेक कामों से मोहब्बत करना और बुरे कामों से नफरत करना ईमान की पहचान हैं।
  • पल भर का सब्र दुनिया की तमाम चीज़ो से बेहतर हैं। 
  • लोगों को नेक रास्ता बताने वाले लोगों पर अल्लाह की रहमतें बरसती हैं। 
  • जो मेहनत करके हलाल रोज़ी कमाता हैं वह इंसान अल्लाह के बहुत करीब रहता हैं। 
  • किसी बीमार का हाल चाल पूछने वाले और उसकी अच्छी सेहत के लिए दुआ करने वाले लोग खुदा को बहुत पसंद हैं। 
  • माँ बाप की खिदमत करने वाली औलादों की खुदा हर दुआ कबूल फरमाता हैं। 
  • अपना माल बेचने के लिए झूटी कस्में न खाया करो इससे माल तो बिक जायेगा लेकिन उसकी बरकत खत्म हो जाएगी। 
  • खुदा और अपनी मौत को हमेशा याद करो। 
  • जब भी किसी दीनी भाई या रिश्तेदार से मिलो तो सलाम ज़रूर किया करो इससे आपस में और मोहब्बत बढ़ेगी और रिश्ते और मज़बूत होंगे।
  • खाना शुरू करने से पहले बिस्मिल्लाह शरीफ ज़रूर पढ़ा करो। 
  • अपनी ज़बान पर काबू रखा करो ताकि किसी और को तुम्हारी वजह से तकलीफ न हो। 
  • चलते फिरते वक़्त कलमा और दुरुद शरीफ पढ़ा करो और हर वक़्त खुदा को याद किया करो। 
  • हमेशा लोगों से अच्छी और मीठी बातें किया करो ताकि सामने वाला शख्स हमेशा आपसे खुश रहे। 
  • हर काम को करने से पहले लोगों से सलाह मशवरा लिया करो ताकि किसी गलती का अंदाज़ा पहले ही हो जाये। 
  • शराब पीने वाले और ब्याज खाने वाले लोगों से हमेशा दूर रहा करो। 
  • हमेशा मिलकर कर साथ में खाना खाया करो।
  • सुबह उठते ही अपने माँ बाप को ख़ुशी से सलाम किया करो और अल्लाह से उनकी अच्छी सेहत की दुआ करा करो।
  • जहाँ लोग एक दूसरे की ग़ीबत बुराई कर रहे हो उस जगह पर एक पल भी रुका मत करो। 
  • आपसे बड़े लोग जैसे आपके माँ बाप या बड़े भाई आपसे गुस्से में कुछ कह दे तो उनकी बातें सुन लो उनको जवाब मत दो। 
  • ज़कात देकर लोगो को जतलाया मत करो की मैंने इतनी ज़कात निकाली हैं। किसी गरीब की मदद करके लोगों को मत बताया करो की मैंने इतनी मदद की हैं।
  • जिस घर में क़ुरान की तिलावत नहीं होती उस घर की बरकतें खत्म हो जाती हैं। रहमत के फ़रिश्ते उस घर से चले जाते हैं। 
  • जिस घर में क़ुरान की तिलावत होती हैं वह घर शैतानी वसवसे से दूर रहता हैं। 
  • सबसे बेहतर मुसलमान वह है, जो खुद क़ुरान सीखे और दूसरों को भी सिखाये। 
  • जितना हो सके लोगो की मदद किया करो ताकि खुदा तुम्हे और दौलत से नवाज़े। 
  • जनाज़े में हमेशा शरीक हुआ करो क्यूंकि एक दिन आपका भी जनाज़ा किसी गली से निकलेगा। 
  • रात को सोने से पहले वज़ू कर लिया करो ताकि पूरी रात शैतानी साये से दूर रहो।
उम्मीद करते हैं आप इन सारी इस्लामी बातों पर अमल करेंगे और दीन के रास्ते पर चलने की तरफ एक कदम बढ़ाएंगे। 

अल्लाह हाफिज 

मग़रिब की नमाज़ और उसकी अहमियत (Magrib ki Namaz ki Ahmiyat)

मग़रिब की नमाज़ और उसकी अहमियत (Magrib ki Namaz ki Ahmiyat)

मगरिब की नमाज़ का वक़्त सूरज डूबने के बाद होता हैं और तकरीबन सवा घंटे तक रहता हैं। मतलब इस सवा घंटे के बीच में आप मगरिब की नमाज़ अदा कर सकते हैं। लेकिन सूरज डूब जाने का यकीन होने पर फ़ौरन नमाज़ अदा कर लेना चाहिए। नमाज़ में देरी नहीं करना चाहिए। देर करना मकरूह हैं। अगर कोई सफर कर रहा हो और मगरिब का वक़्त होते ही नमाज़ अदा करने का मौका नहीं मिला तब फिर आप एक घंटे के अंदर मगरिब की नमाज़ अदा कर सकते है। अगर आप अपने घर पर ही हैं तो तुरंत अज़ान की आवाज़ सुनते ही मगरिब की नमाज़ अदा कर लेना चाहिए। 

सूरज डूब जाने का यकीन हो जाने के पांच मिनट बाद अज़ान पढ़ी जाये और अज़ान सुनने के बाद नमाज़ पढ़ी जाये। आजकल तो मस्जिदों में नमाज़ के वक़्त किसी कागज़ पर लिखकर वह कागज़ चिपका दिया जाता है और उसी वक़्त को देखकर अज़ान पढ़ी जाती हैं लेकिन एहतियात इसी में हैं की सूरज डूबने का ख्याल रखा जाये। ताकि नमाज़ सही वक़्त पर अदा की जाये।

मगरिब की नमाज़ की रकातें और उसकी नियत

मगरिब की नमाज़ में कुल 7 रकातें होती है जो इस तरह हैं 3 फ़र्ज़, 2 सुन्नत और 2 नफ़्ल

फ़र्ज़ नमाज़ की नियत- नियत की मैंने तीन रकात नमाज़ फ़र्ज़ वास्ते अल्लाह तआला के पीछे इस इमाम के वक़्त मगरिब का मुँह मेरा काबा शरीफ की तरफ फिर अल्लाहो अकबर कहते हुए नमाज़ अदा करे (ध्यान रहे की नियत करते वक़्त पीछे इस इमाम के उसी वक़्त कहे जब आप इमाम साहब के पीछे नमाज़ अदा कर रहे हो अगर आप अकेले नमाज़ पढ़ रहे हो तब पीछे इस इमाम के कहने की ज़रूरत नहीं)

2 रकात सुन्नत नमाज़ की नियत- नियत की मैंने 2 रकात नमाज़ सुन्नत वास्ते अल्लाह तआला के पीछे इस इमाम के वक़्त मगरिब का मुँह मेरा काबा शरीफ की तरफ फिर अल्लाहो अकबर कहते हुए नमाज़ अदा करे।  

इन दोनों नमाज़ो को मगरिब की नमाज़ में पढ़ना ज़रूरी है नहीं पढ़ेंगे तो आप गुनहगार होंगे।

तीसरी नमाज़ नफ़्ल नमाज़ हैं जिसमे 2 रकात होती है। इसकी नियत भी उसी तरह हैं जैसे 2 रकात सुन्नत नमाज़ की नियत हैं बस आपको इस नमाज़ में नफ़्ल नमाज़ बोलना हैं और इस नमाज़ में आपको वक़्त का नाम लेना ज़रूरी नहीं। क्यूंकि किसी भी वक़्त की नमाज़ में नफ़्ल ज़रूरी नहीं। नफ़्ल मकरूह औकात के अलावा कभी भी पढ़ी जा सकती हैं। नफ़्ल की नमाज़ की बड़ी फ़ज़ीलत है। इससे आपको फैज़ हासिल होगा।

मगरिब के बाद 6 रकात नफ़्ल नमाज़ पढ़ने की बड़ी फ़ज़ीलत आयी हैं। इसे नमाज़े औवाबीन कहा जाता हैं। 2 -2 रकात की नियत से 6 रकात नफ़्ल नमाज़ अदा करे। और इसे पाबन्दी से अदा करते रहे। इंशाल्लाह आपको बेपनाह फैज़ हासिल होगा।

इसी तरह मगरिब की नमाज़ के बाद पाबन्दी से सूरए वाक़ेआ पढ़ते रहे। जिसकी बरकत से गरीबी दूर हो जाएगी और कारोबार में खैर बरकत होगी।

इसके अलावा मगरिब की नमाज़ के बाद 2 रकात नमाज़ "सलातुल असरार" पढ़ना बहुत फायदेमंद है। जब कोई मुश्किल या परेशानी हो तब इस नमाज़ की बरकत से वह परेशानी दूर हो जाएगी।

इस नमाज़ में हर रकात में अल्हम्दो शरीफ के बाद 11 -11 बाद कुल्हुवल्लाह शरीफ पढ़े। फिर नमाज़ ख़त्म हो जाने के बाद 11 बार दुरुद शरीफ पढ़े। फिर 11 बार यह पढ़े "या रसूलल्लाह या नबीयल्लाह अगिस्नी वम दुदनी फ़ी क़ज़ाए हाजती या काज़ियल हाजात। फिर बाग्दाद् शरीफ की तरफ 11 कदम चलें। हर कदम पर यह दुआ पढ़े या "गौसस सकलैन या करीमत तरफ़ैन अगिस्नी वम दुदनी फ़ी क़ज़ाए हाजती या काज़ियल हाजात"। फिर रसूले अकरम के वसीले से दुआ मांगे। इंशाल्लाह आपकी हर तकलीफ व परेशानी दूर हो जाएगी।

अल्लाह हम सब को पांच वक़्त की नमाज़ का पाबंद बनाये आमीन।  

रोज़ा और इफ्तार पार्टियां (Roza or Iftar Partiyan)

रोज़ा और इफ्तार पार्टियां (Roza or Iftar Partiyan)

क्या हैं इफ्तार? आइये जानते हैं। सूरज डूब जाने के बाद जो हलाल चीज़े दिन में छोड़ दी गयी थी या कहे जिन कामों खासकर के खाना,पानी पीना की इजाज़त मिल जाने को इफ्तार कहा जाता हैं। जिसे ज़्यादातर लोग या आम बोल चाल में रोज़ा खोलना कहा जाता हैं।

ध्यान रहे की सूरज डूब जाने का जब यकीन हो जाये तब ही इफ्तार किया जाये। अँधेरा होने का इंतज़ार करना या सूरज डूब जाने के बाद रोज़ा खोलना यहूदियों का तरीका हैं। रोज़ा खोलने में एक मिनट की भी देरी न की जाये। इसलिए इफ्तार में देर करना या नमाज़ पढ़ लेने के बाद इफ्तार करना मकरूह हैं। हदीस शरीफ में हैं की रब फरमाता हैं ! जो इफ्तार करने में जल्दी करते हैं वह बन्दे मुझे बहुत प्यारे लगते हैं लेकिन इतनी जल्दी भी न की जाये की सूरज डूबने से पहले की इफ्तार कर लिया जाये। ऐसे जल्दबाज़ी करने से तो रोज़े का सवाब भी नहीं मिलेगा और दिन भर की भूक प्यास बेकार चली जाएगी। 

छुहारे या खजूर से इफ्तार करना सुन्नत हैं। अगर यह न हो तो पानी से ही रोज़ा खोल लिया जाये। चूँकि खाली पेट मीठी चीज़ खाना तंदरुस्ती के लिए बेहतर हैं। इसलिए हमारे रसूल के अलावा सारे नबियों ने छुहारे या खजूर से ही रोज़ा इफ्तार करना बेहतर बताया हैं। पानी से भी इफ्तार करना बेहतर इसलिए हैं की क्यूंकि यह बदन में जमा सारी गंदगी को बाहर निकल देता हैं। ध्यान रहे रोज़ा हलाल चीज़ो से ही इफ्तार करे। अगर कहीं से रोज़ा खोलने के लिए कोई खाने पीने का सामान आये तो पहले गौर करे की यह सब सामान हराम कमाई का हैं या हलाल कमाई का। अगर वह हराम कमाई का हैं तो उससे परहेज़ करना ज़रूरी हैं। 

हदीस शरीफ में हैं जिसने पानी से इफ्तार किया। उसे 10-10 नेकियां मिलेगी। खुदा उस बन्दे की 10-10 बुराइयां मिटाएगा। क्यूंकि पानी ऐसी चीज़ हैं जो गरीब से गरीब आदमी को भी नसीब हो सकता हैं। पानी से रोज़ा खोलने वाले यह न समझे की हम गरीब हैं, हमारे पास सिवाय पानी के और कुछ नहीं जिसे पी कर इफ्तार कर सके। पानी तो अल्लाह के दी हुई एक नेअमत है, जिसकी बरकत से आपको नेकियां भी मिल रही हैं और आपकी बुराइयां और गुनाह भी माफ़ हो रहे हैं। जो लोग इस हकीकत से वाकिफ हैं, वह काफी लज़ीज़ चीज़े अपने सामने होते हुए भी पानी से रोज़ा इफ्तार करते हैं। 

अल्लाह के रसूल ने फ़रमाया रोज़ा हमेशा पुरे परिवार यानि बीवी बच्चे माँ बाप भाई बहन वगैरह के साथ इफ्तार करा कीजिये। ऐसा करने वालो को एक लुक़मे के बदले एक गुलाम आज़ाद करने का सवाब मिलेगा। अल्लाह को वह लोग पसंद नहीं जो अलग अलग अपने कमरे में अपने परिवार के साथ अलग से रोज़ा इफ्तार करते हो। हमेशा आपस में मिलजुल कर रोज़ा इफ्तार किया जाये। ध्यान रहे रोज़ा इफ्तार करते वक़्त अगर कोई मुसाफिर या कोई रिश्तेदार अगर घर में आ जाये तो उसे इफ्तार के लिए ज़रूर बुलाया जाये। किसी को रोज़ा इफ्तार करवाना बड़े सवाब का काम हैं। 

एक हदीस में अल्लाह के रसूल फरमाते हैं! जो रमज़ान में किसी रोज़ेदार को इफ्तार कराएगा उसके गुनाह बख्श दिए जायेंगे और वह जहन्नम से आज़ाद कर दिया जायेगा। ध्यान रहे रोज़ा हमेशा हलाल कमाई से इफ्तार कराया जाये। दूसरी तरफ जो शख्स ख़ुशी से रोज़ा इफ्तारी में शामिल होगा वह भी उतने ही सवाब का हक़दार होगा जितना इफ्तारी करवाने वाले शख्स को मिला हैं। एक सहाबा ने अर्ज़ किया या रसूलल्लाह ! अगर किसी शख्स के पास इतना माल या खाना न हो जिससे वह किसी को अच्छे से रोज़ा न खुलवा सके उस सूरत में क्या वह भी उतने ही सवाब का हक़दार होगा? आपने फ़रमाया यह सवाब तो उसे भी मिलेगा जिसने एक घूँट पानी या दूध से किसी को रोज़ा इफ्तार करवाया हो। सुभानअल्लाह

एक और हदीस में अल्लाह के रसूल ने फ़रमाया ! जिसने किसी रोज़ेदार को पेट भर खाना खिलाया। अल्लाह पाक क़यामत में उसे मेरे हौज से ऐसा शरबत पिलायेगा की उसे कभी प्यास नहीं लगेगी। इससे ही आप अंदाज़ा लगा सकते हो की किसी को रोज़ा इफ्तार करवाना किस हद तक सवाब का काम हैं। एक चीज़ आप को बता दे की हालाँकि रोज़ा खुलवाना बड़ा सवाब का काम हैं इसका मतलब यह नहीं की आप खुद रोज़ा न रखे और सिर्फ रोज़ा खुलवाते रहे। आप को लगे की रोज़ा खुलवाने से इतना सवाब मिल रहा हैं तो रोज़ा रखने की क्या ज़रूरत? यह आपकी गलत फहमी हैं। रोज़ा हर हाल में फ़र्ज़ हैं। सिर्फ इफ्तार करवाने से सवाब तो मिलता हैं, लेकिन रोज़े का फ़र्ज़ अदा नहीं होता। रोज़ा का फ़र्ज़ अदा किये बिना कोई इबादत कबूल नहीं होती।  

आजकल देखा जाता हैं लोग मस्जिदों में इफ्तार का सामान भेजते हैं। कुछ लोग इफ्तार पार्टी का इंतेज़ाम करते हैं। ऐसे मौको पर कई बेरोज़दार लोग भी जमा हो जाते हैं। जो अच्छी सेहत होते हुए भी रोज़ा नहीं रखते। हालाँकि आप किसी को मना नहीं कर सकते लेकिन जो शख्स रोज़ा न होते हुए भी रोज़ेदार के हिस्से का खाना खा रहा हैं उसे खुद ही सोचना चाहिए की मैं सही हूँ या गलत। इसके अलावा कई इफ्तार पार्टियों में बड़े बड़े राजनेता रसूखदार लोग इफ्तार पार्टी के बहाने राजनीतिक रिश्तो को मज़बूत करने में लग जाते हैं। ऐसे लोगो को इफ्तार या रोज़े से कोई मतलब नहीं होता। वह सिर्फ अपने आपसी रिश्तो और दुनियावी फ़ायदा हासिल करने के मकसद से ऐसी पार्टियां करते हैं। अगर आप एक सच्चे मोमिन हैं तो ऐसी पार्टियों से दूर रहे। क्यूंकि अक्सर ऐसी इफ्तार पार्टियों में इस्तेमाल किया जाने वाला खाना हराम कमाई का होता हैं। जिसे खाकर आप भी गुनहगार बन जायेंगे। 

बहरहाल हम सभी को चाहिए की इफ्तार प्रोग्राम में ऐसे बड़े लोगो को बुलाने से बेहतर हैं आस पास के गरीब लोगों को इफ्तार पार्टी का न्योता दे। क्यूंकि ऐसे गरीब लोगों को मुश्किल से ही इस तरह का खाना नसीब होता हैं। ऐसे लोग बेरोज़दार भी हैं तो भी उनके लिए हर तरह के अच्छे खाने का इंतेज़ाम किया जाये। क्यूंकि ऐसे लोगों की ज़िन्दगी अक्सर कुछ दिन पुराना खाने पीने से ही निकलती हैं। ऐसे लोग इस तरह का अच्छा खाना इफ्तारी में देखकर बड़े खुश हो जाते हैं। जिनकी ख़ुशी से अल्लाह भी बड़ा खुश होता हैं। आप सभी से गुज़ारिश है इफ्तार पार्टी का मज़ाक न बनाये और जो ऐसी पार्टियों का असली हक़दार हैं उसे शरीक करके सवाब हासिल करे। अल्लाह हाफिज

इमाम बुखारी की ज़िन्दगी (Imam Bukhari Ki Zindagi)

इमाम बुखारी की ज़िन्दगी (Imam Bukhari Ki Zindagi)

आपका पूरा नाम मोहम्मद बिन इस्माईल बिन इब्राहिम था। लेकिन आप इमाम बुखारी के नाम से ऐसे मशहूर हुए की आपका पूरा नाम बहुत कम लोग ही जानते हैं। आप 13 शव्वाल 194 हिजरी में जुमा के दिन नमाज़ के बाद दुनिया में तशरीफ़ लाये। बचपन में ही आपकी आँखों की रौशनी चली गयी थी। यह देखकर आपकी माँ को बड़ी तकलीफ हुई और वह हर वक़्त रो रो कर आपकी आँखों की रौशनी के लिए अल्लाह से दुआ करती रहती थी। ऐसे गमगीन माहौल में एक दिन एक बड़ा चमत्कार हुआ। जिससे एक रात में आपकी किस्मत का तारा चमक गया। हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम आपकी माँ के ख्वाब में तशरीफ़ लाये और फ़रमाया ! अल्लाह पाक ने तेरी दुआ कबूल फरमा ली हैं और तेरे बेटे की आँखों में रौशनी अता फरमा दी हैं। जब आपकी वालेदा सुबह नींद से जागी तो देखा की वाकई में आपके बेटे इमाम बुखारी की आँखों में रौशनी आ चुकी थी। 

हज़रत इमाम बुखारी को बचपन से ही हदीसें याद करने का बड़ा शौक था। यह देखकर आपकी माँ ने आपको हदीसों का पाठ पढ़ाना शुरू कर दिया। 10 साल की उम्र में आप इस कदर माहिर हो चुके थे की जो भी हदीसें सुनते उन्हें मुँह ज़बानी याद फरमा लिया करते। इस उम्र के दौर में आप हज़रत इमाम दाख़िली की खिदमत में जाया करते थे। जिन्होंने आपको हदीसों के बारे में और पढ़ाया। 16 साल की उम्र होते होते आपने हज़रत अब्दुल्लाह बिन मुबारक और हज़रत वकिअ की लिखी सारी हदीसें याद कर ली। फिर आप अपनी माँ और भाई अहमद बिन इस्माईल के साथ हज के लिए तशरीफ़ ले गए। हज के बाद माँ और भाई तो अपने वतन वापिस आ गए लेकिन आप नहीं आये। आप हिजाज (एक पवित्र स्थान) में ही रुक कर 1080 आलिमों की खिदमत में हाजरी देकर 6 लाख हदीसें मुँह ज़बानी याद फ़रमाली। इल्मे हदीस के इसी शौक में आपने मक्का, मदीना, कूफ़ा, बसरा, बग़दाद, मिस्र और कई सारे शहरों का बार बार सफर फ़रमाया। 

आप में ऐसी काबिलियत थी की आप जो सुनते और उसे याद कर लेते। आप को कभी कागज़ कलम की ज़रूरत नहीं पड़ी। एक वक़्त की बात हैं आपके एक साथी ने आपसे फ़रमाया मोहम्मद ! तुम खाली हाथ दर्सगाह में आते हो और सिर्फ हदीसें सुनते हो लिखते नहीं तो तुम्हारे आने का क्या मतलब? आपने फ़रमाया तुम मेरा इम्तेहान ले सकते हो की मैंने दर्सगाह में आकर क्या हासिल किया। इस दौरान आपने जो 1500 हदीसें वहां सुनी थी। आपने वह सारी हदीसें एक एक करके आपके साथी को सुनाना शुरू कर दी तो वह और आस पास मौजूद लोग आपकी याददाश्त देखकर दंग रह गए। यहाँ तक आपकी सारी हदीसें सुनकर आस पास मौजूद लोगों ने अपनी लिखी गलतियाँ सुधारी।

एक और वाक़ेआ सुनिए एक दिन की बात हैं। हज़रत इस्हाक़ बिन राहवैह के कुछ दोस्तों ने कहा की अच्छा होता अगर किसी आलिम को अल्लाह तआला यह तौफीक देता की वह हदीस की एक किताब लिख देता। उस वक़्त हज़रत इमाम बुखारी वहां मौजूद थे। दोस्तों की कही बात आपके दिल में समा गयी और आपने हदीसों की एक किताब लिखने का पक्का इरादा फरमा लिया। चुनांचे आपने अपनी याद की हुई 6 लाख हदीसों में से 9082 हदीसें 16 सालों की सख्त मेहनत के बाद एक किताब की शक्ल में तहरीर फ़रमाई। जिसे आज बुखारी शरीफ कहा जाता हैं। यह काम आपने मस्जिदे नबवी में मिम्बरे रसूल और रोज़ए रसूल के बीच जन्नत की क्यारी में बैठकर अंजाम दिया। आप उस वक़्त हदीस शरीफ लिखने से पहले ग़ुस्ल फरमाते ,2 रकत नमाज़ अदा करते और फिर हदीस शरीफ लिखते। इसी खुलूस का नतीजा हैं की आपकी यह किताब पूरी दुनिया में मशहूर हो गयी और आज भी पढ़ी जाती हैं। 

आप बड़े खुद्दार किस्म के इंसान थे बुखारा (एक जगह) के हाकिम खालिद बिन अहमद ने आपको हुक्म दिया की आप शाही महल में आकर शहज़ादों को बुखारी शरीफ और दूसरी मज़हबी किताब पढ़ाया करें। आपने फ़रमाया मैं इल्मे हदीस को ज़लील नहीं करना चाहता। आप अपने बच्चों को मेरी दर्सगाह भेज दिया करें। मैं वही उन्हों पढ़ा दूंगा। बुखारा के हाकिम खालिद बिन अहमद ने फ़रमाया ठीक हैं लेकिन जब तुम शहज़ादों को पढ़ाओ तो उस वक़्त और कोई और पढ़ने वाला नहीं होना चाहिए। आपने फ़रमाया इल्म तो सभी के लिए हैं। इसको हासिल करना गरीब अमीर सब का हिस्सा हैं। मैं किसी और को पढ़ाने से मना नहीं कर सकता। मेरे यहाँ सब मिलकर कर साथ में बैठ कर ही दीनी तालीम हासिल करते हैं। हाकिम को आपकी यह बात बुरी लगी और आपको बुखारा से निकलने पर मजबूर कर दिया। आप बुखारा से चलकर नेशाबूर पहुंचे लेकिन वहां के हाकिम ने भी आपके साथ ऐसा ही बर्ताव किया। वहां से निकलकर आप खरतंग नाम के छोटे से गाँव में तशरीफ़ लाये और वहीं हदीस का दर्स देना शुरू कर दिया। आखरी उम्र तक आप उसी गाँव में रहे और 62 साल की उम्र पाकर 256 हिजरी में ईद के दिन इन्तेकाल फ़रमाया।

इंसानी खिदमत के बारे में इस्लाम क्या कहता हैं? (Insani Khidmat in Islam)

इंसानी खिदमत

इस्लाम में इंसान को खिदमत की एक बहुत बड़ी अहमियत बताया गया हैं। इंसानी खिदमत को इस्लाम में एक इबादत कहा गया हैं। इस्लाम पुरे इंसानी समाज को एक खानदान मानता हैं। इसलिए तो अल्लाह के रसूल ने फ़रमाया हैं ! खुदा की सारी मखलूक अल्लाह का कुंबा हैं। अल्लाह को हर वह इंसान पसंद हैं जो उसकी बनायीं मखलूक के साथ अच्छा बर्ताव करता हो और उसकी इज़्ज़त करता हो। 

अल्लाह एक हैं वह अकेला सारी कायनात इस दुनिया का मालिक और उसे पालने वाला हैं। अल्लाह को अपनी मखलूक से बहुत प्यार हैं। वही सब को रोज़ी देता हैं। और सब की ज़रूरतें पूरी करता हैं। अल्लाह ने अपने रसूलों नबियों के ज़रिये ये पैगाम दिया हैं की हर इंसान की इज़्ज़त करो। उसके साथ अच्छे से पेश आओ। अगर वह आपका दुश्मन हैं तो उससे दोस्ती का हाथ बढ़ाओ। यहाँ हर इंसान का मतलब पूरी दुनिया में मौजूद तमाम इंसान चाहे वो किसी भी समाज या धर्म के हो आप को चाहिए की आप सभी इंसानो की इज़्ज़त करे। 

आज पूरी दुनिया में अरबो लोगो की तादाद मौजूद हैं। उनमे से कुछ इंसान हैं और ना जाने कितने इंसान के भेष में हैवान मौजूद हैं। आपको चाहिए आप इंसान को पहचाने हैवानो से बच कर रहे। अगर हो सके तो ऐसे हैवानो को इंसान बनाने में अपनी पूरी कोशिश करे। 

चलिए बात करते हैं अल्लाह के मखलूक की खिदमत के बारे में आप को बता दे की अल्लाह की मखलूक से नेक सुलूक करने का मतलब यह हैं की उस पर रहम किया जाये। उसकी खिदमत की जाये। उस पर कोई ज़ुल्म ना किया जाये। ना ही उसे बेवजह परेशान किया जाये। इस्लाम कहता हैं की अपने आस पास के माहौल को हमेशा अच्छा बनाने की कोशिश करे। अमन व सुकून से रहे और आस पास के लोगो को भी रहने दे। अगर कोई पड़ोसी या आपके मोहल्ले में रहने वाला परेशान हैं तो उसकी मदद करे चाहे वो कोई भी हो अगर वह एक सच्चा इंसान हैं तो ज़रूर उसकी मदद करे। 

हर मुसलमान को चाहिए की अपनी हैसियत के मुताबिक लोगो की मदद करे। उनके काम आये। अल्लाह के रसूल ने फ़रमाया हैं बेसहारा का सहारा बने ज़रूरत मंदो की मदद करे। लोगो के उलझे मसायल को सुलझाए। यही इस्लाम कहता हैं। आज लोग इन सब चीज़ो पर ध्यान नहीं देते उन्हें बस अपनी ज़िन्दगी की पड़ी हैं यह इस्लाम ने उन्हें नहीं सिखाया हैं बल्कि यह वह लोग हैं जो इस्लाम के कायदों के हिसाब से नहीं चलते। इस्लाम में तो हर छोटी से छोटी मदद को भी एक इबादत कहा गया हैं सुभानअल्लाह। 

अल्लाह को वह लोग बहुत पसंद आते हैं जो एक दूसरे की मदद करते हैं। उनका सहारा बनते हैं। अल्लाह को ऐसे भी लोग बहुत पसंद हैं। जो किसी से आस (उम्मीद) लगा कर नहीं रखते और बिना किसी की मदद लिए लोगो की मदद में लग जाते हैं। अल्लाह को ऐसे लोग बिलकुल पसंद नहीं जो पहले यह सोचते हैं की कोई मदद नहीं कर रहा तो मैं क्यों करुँ। ऐसे लोगो को पहले यह सोचना चाहिए की अल्लाह भी तो सब लोगो की मदद करता हैं चाहे उसके बन्दे कितने ही गुनहगार हो। 

आप आज जो पैसा बचा रहे हैं और ज़रूरत मंदो की मदद करने मेँ कतराते हैं। उन पैसो को बाज़ारों में घूमने खरीदारी करने महंगे कपडे पहनने महंगा खाना खाने में खर्च कर देते हैं और चंद रूपये किसी गरीब को देने में सोचते हैं। खुदा ना करे अगर आपके ऐसे हालात हो जाये की आप जो पैसा बचा रहे थे वही पैसा चंद दिनों में ख़तम हो जाये और आप बर्बाद हो जाये और आपकी माली हालत बद से बदतर हो जाये। इसलिए आपको चाहिए की ज़्यादा से ज़्यादा सदक़ा खैरात करे ताकि अल्लाह आप को और दौलत से नवाज़े और आप ऐसी परेशानियों से बच सके। 

अल्लाह के प्यारे रसूल मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के पास जब कोई ज़रूरतमंद आता तो आप हमेशा उसकी मदद फरमाते। आपने लोगों की मदद करने में कभी कोताही नहीं की। आपने यही फ़रमाया की नेक और ईमानदार इंसान जो हलाल कमाई से अपना गुज़ारा करता हैं अगर वह किसी मुसीबत में हैं या ज़रूरतमंद हैं तो आप हमेशा उसकी मदद करे। आपने यह भी फ़रमाया की जो आदमी किसी को खुश करने के लिए उसकी मदद करता हैं उसकी ज़रूरत पूरी करता हैं वह हक़ीक़त में मुझे खुश करता हैं। अल्लाह को खुश करता हैं और अल्लाह को खुश करने वाला जन्नत का हक़दार हैं। 

बहरहाल आज के इस ज़माने में ऐसे लोग बहुत कम बचे हैं जो बेझिझक बिना सोचे लोगो की मदद करते हैं। आजकल तो यह भी देखने को मिलता हैं लोग अपनी बिरादरी या धर्म देखकर लोगो को मदद करते हैं। जो की गलत हैं। कोई यह नहीं सोचता की किसी इंसान की मदद की जाये। खैर हमें चाहिए की हम हर इंसान की इज़्ज़त करे। उसकी खिदमत करे। क्यूंकि अगर हर आदमी अगर किसी के काम आने लग गया तो इंशाल्लाह कभी किसी को किसी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा। 

अल्लाह से यही दुआ हैं की अल्लाह हमें इतनी दौलत दे की हम ज़्यादा से ज़्यादा लोगो की मदद कर सके और उनके दुःख दर्द में उनका सहारा बन सके आमीन। 

पीर कौन होते हैं? और कौन हो सकते हैं?

पीर कौन होते हैं? और कौन हो सकते हैं?

आजकल आप सुनते होंगे ये साहब पीर हैं और हम इनके मुरीद हैं। तो आज जानेंगे आखिर पीर कौन होते हैं? और पीर कैसे बना जा सकता हैं? पीर वह हो सकता हैं, जो आपको रब की तरफ जाने का रास्ता दिखाए। कहने का मतलब जो आपको अल्लाह के बताये रास्तों पर चलने को कहे। ध्यान रहे की पीर का मर्तबा जितना बड़ा हैं। उतना ही मुश्किल व खतरनाक हैं। यह इतना बड़ा बोझ हैं, जिसे हर कोई नहीं उठा सकता। पीर होना ज़िम्मेदारियों का एक ज़बरदस्त पहाड़ हैं। पीर बन जाना कोई आसान काम नहीं हैं बल्कि जान खोदने से भी ज़्यादा मुश्किल काम हैं। 

मगर अफ़सोस आजकल लोगों ने इसे एक खेल तमाशा समझ लिया हैं। जिसे देखो वही अपने आपको एक पीर बता रहा है और लोगो को अपना मुरीद बनाकर फख्र करता हैं की मेरे इतने सारे मुरीद हैं और उनके मुरीदो को भी कह देता है की मेरा प्रचार प्रसार करो। उन पीर मुरीदों को पता नहीं की आखिर हक़ीक़त में पीर क्या होता हैं? पीर कैसा होना चाहिए? मुरीद किसे कहते हैं? और कोई अपने आपको पीर बता रहा हैं तो पहले उसे जानना चाहिए की हम पीर बनने के काबिल है भी या नहीं। कोई सिर्फ दाढ़ी मूँछ बढाकर पगड़ी बांधने या गले में छल्ले तावीज़ पहनने से पीर नहीं बन सकता। 

आजकल पीर की आड़ में लोगों ने अपना एक धंधा बना लिया हैं। जो की शरीयत के हिसाब से बिलकुल गलत हैं। ऐसे लोग अगर अपने आप को पीर बताये तो आपको ऐसे लोगो से बचना चाहिए। 

आज हम आपको बताएँगे की एक पीर में क्या क्या खूबियां होना चाहिए तब जाकर वह पीर बनने लायक हो सकता हैं। 

  • पीर वही बन सकता हैं जो क़ुरान मजीद और शरीयत के मसाइल की जानकारी रखता हो। कोई भी जाहिल आदमी जिसे क़ुरान और शरीयत का इल्म नहीं वो पीर नहीं बन सकता। 
  • पीर वह नहीं बन सकता हैं जो गुमराह जमाअतों से ताल्लुक रखता हो। जो लोगो को गुमराही के रास्तो पर चलने को कहता हो। 
  • पीर वह बन सकता हैं जो सुन्नत व शरीयत का पाबंद हो। जो गुनाहे कबीरा सग़ीरा से बचता हो। सुन्नत दाढ़ी रखता हो नमाज़ रोज़े का पाबंद हो। 
  • जो आदमी शरीयत के खिलाफ काम करे वह पीर बनने लायक नहीं। 
  • पीर का सिलसिला नबी करीम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम तक पहुँचता हो। उसके बीच में कही टूटता न हो। कहने का मतलब जो पुराने पीर रह चुके हैं अगर उनकी औलादें उन पीर के मरने के बाद अगर अपने आपको पीर बताये अगर उनमे पीर बनने जैसे कोई गुण न हो तो वो भी गलत हैं। ऐसे को मुरीद होना हराम हैं। 
  • फ़र्ज़ व वाजिब अरकान अदा करने के अलावा तरह तरह के वज़ीफ़ों का आमील हो। 
  • लोगों को नेक रास्ते पर चलने और गलत कामों को करने के लिए मना करता हो। 
  • अपने मुरीदों का बराबर ध्यान रखता हो और उन्हें शरीयत के खिलाफ काम करने पर टोकता हो। 

अगर कोई पीर हैं तो उसे चाहिए की वह फ़ौरन किसी को अपना मुरीद न बनाये। पहले उसे शरीयत का पाबंद करके और कुछ नसीहत करके जाने दे। अगर किसी मुरीद को सच्ची अकीदत होगी तो वह दोबारा हाज़िर होगा। मुरीद को चाहिए अगर कोई पीर होने का दावा कर रहा हैं उसके बारे में पहले अच्छे से जान ले। आजकल के कुछ लोग अपने आपको पीर बताने लग गए हैं और पहले नज़राने की मांग करते हैं। उन्हें मुरीद से मतलब नहीं चाहे वो कैसा भी हो। कुछ लोग आसपास के लोगो को यह बताते हैं की हमारे मुरीद हो जाओ तुम्हारा सब परेशानी और काम ठीक हो जायेंगे। ऐसे लोगो का मुरीद बनने से पहले उनके बारे में जान ले की आखिर में ऐसे लोग पीर है भी या नहीं। 

पीर को चाहिए की मर्दो का हाथ अपने हाथ में लेकर बैअत करे और औरतों को परदे में बिठाकर अपना रूमाल, अमामा, पकड़ा कर मुरीद बनायें और मुरीद बनाते वक़्त उन्हें शरीयत की पाबन्दी की सख्त ताकीद करे। औरतों को बेपर्दा या हाथ पकड़ कर मुरीद बनाना जाइज़ नहीं। जो पीर यह कहते हैं की औरत को पीर से पर्दा करने की ज़रूरत नहीं। मुरीद हो जाने के बाद औरत पीर की बेटी बन जाती हैं। यह कहना बिलकुल गलत हैं और शैतानी ख्याल हैं। औरतों को अपने पीर से भी पर्दा करना चाहिए।

पीर के लिए ज़रूरी हैं की अपने मुरीदों को इस्लाम की अच्छी तालीम से रूबरू करवाए। तरह तरह के वज़ीफ़ों को पढ़ने का तरीका सिखाये। खुदा के रास्ते पर चलने की राह दिखाए। जिससे मुरीदों में एक रूहानी इंक़ेलाब पैदा हो सके जिससे वह दीन का पाबंद हो जाये। 

क़ुरान मजीद खुदा का कलाम (Quran Majeed Khuda Ka Kalam)

क़ुरान मजीद खुदा का कलाम (Quran Majeed Khuda Ka Kalam)

क़ुरान मजीद खुदा का वह कलाम हैं जो हज़रत जिब्राइल अलैहिस्सलाम के ज़रिये हमारे प्यारे रसूल पैगम्बर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम पर नाज़िल हुआ। क़ुरान मजीद एक ही बार में हमारे रसूल पर नहीं नाज़िल हुआ बल्कि जब जब जैसे जैसे ज़रूरत पड़ी आप पर उतरता रहा। उसकी शुरुआत गारे हिरा से हुई और पूरा क़ुरान नाज़िल होने में 23 साल लग गए। 

क़ुरान मजीद अल्लाह की वह मुबारक किताब हैं जो लोगो की हिदायत के लिए नाज़िल हुई हैं। इसलिए उसमे इंसानी फ़लाह बहबूत की हर बात मौजूद हैं। जो हमारी रहनुमाई करती हैं। इसके बाद अब किसी और किताब की ज़रूरत नहीं रही। इसमें पैदाइश से लेकर मौत और उसके बाद तक के हालात मौजूद हैं। इबादत, तिजारत, सियासत, दीन और दुनिया की भलाई की हर तालीम क़ुरान में मौजूद हैं। यह किताब दुनिया वालों को हक़ की तरफ बुलाती और रहनुमाई करती हैं और बुराइओं से रोकती हैं। 

कुफ्फारे मक्का इसे बेबुनियाद और बनावटी किताब कहा करते थे और इसमें मौजूद आयतों को जादू बताते। उनकी इस बकवास पर उनका मुँह बंद करने के लिए अल्लाह पाक ने फ़रमाया ! हमने अपने रसूल पर जो किताब उतारी हैं अगर उसके कलामे इलाही होने में तुम्हे शक हैं तो तुम उस जैसी कोई आयत या सूरत पेश करके बताओ। अगर तुम अपने दावे में सच्चे हो तो अपने सारे मददगारों को भी बुलवा लो और उन सब की मदद से एक ही आयत बना कर बता दो। लेकिन कोई भी क़ुरान जैसी एक भी आयत पेश ना कर सका। फिर भी जिनके नसीब में ईमान नहीं था वह महरूम ही रहे और आज भी महरूम हैं। क़ुरान का यह चैलेंज आज भी बाकि हैं और क़यामत तक बाकि रहेगा। 

यूँ तो तौरात, ज़बूर, इन्जील भी आसमानी किताबी थी लेकिन आज उनमे से एक भी किताब अपनी असली हालत में मौजूद नहीं। क्यूंकि उनके मानने वालो ने उसमे अपनी तरफ से ज़बरदस्त हेराफेरी कर रखी हैं। आज वह काबिले कबूल नहीं रही। क़ुरान मजीद के पहले पन्ने पर यह एलान कर दिया गया हैं की यह अल्लाह की किताब हैं। इसमें कोई शक शुब्हे की गुंजाइश नहीं। क़ुरान पाक की हिफाज़त की ज़िम्मेदारी खुद अल्लाह पाक ने ले रखी हैं। यही वजह हैं की दुनिया में लोगों ने इसमें हेरा फेरी करने की लाख कोशिश की लेकिन वह कामयाब ना हो सके। क़ुरान आज दुनिया के कोने कोने में करोड़ो मोमिनो के सीने में महफूज़ हैं और इंशाअल्लाह आगे भी मौजूद रहेगा। आज दुनिया के कोने कोने में आबाद मुसलमान चाहे कोई भी ज़बान बोलता हो लेकिन उनके दिलों में अरबी क़ुरआन महफूज़ हैं। यही तो क़ुरान मजीद को मोज़ेज़ा हैं। सुभानअल्लाह ।

आज दुनिया में जितनी भी किताब पढ़ी जाती हैं उनमे सबसे ज़्यादा क़ुरान मजीद की तिलावत होती हैं। क़ुरान मजीद ऐसी किताब हैं जो दुनिया के हर हिस्से में हर दिन हर पल पढ़ा जाता हैं। सुभानअल्लाह । दुनिया में ऐसे कितने ही खुशनसीब मौजूद हैं जो रोज़ाना क़ुरान मजीद की तिलावत करते हैं। 

क़ुरान का फैज़ान ऐसा हैं की गैर मुस्लिम लोग भी इसे पढ़ने और समझने को कोशिश करते हैं। याद रखिये क़ुरान मजीद एक मुबारक किताब हैं। इसे सिर्फ घरों में रखने या दिखाने या धुल खाने के लिए ना रखे। यह अल्लाह की एक मुबारक किताब हैं। जो लोगों को हिदायत का रास्ता बताती हैं। इसे पढ़ना भी चाहिए और समझना भी चाहिए और अल्लाह से उस पर अमल करने की तौफीक भी मांगनी चाहिए। अल्लाह हमें क़ुरान को शौक से पढ़ने और उस पर अमल करने की तौफीक अता फरमाए आमीन ।

कुछ ज़रूरी दीनी और इस्लामी बातें (Deeni or Islami Baten)

आज के आर्टिकल में हम आपको कुछ ज़रूरी इस्लामी बातों के बारे में बताएँगे। जिनका इल्म होना आपको बहुत ज़रूरी हैं। यह बातें आपको दीन के रास्तें पर...

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