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नमाज़ और आजकल के मुसलमानो के हालात (Namaz or Musalman)

नमाज़ और आजकल के मुसलमानो के हालात (Namaz or Musalman)

आज कल देखा जाता हैं की लोगो के पास नमाज़ पढ़ने के लिए बिलकुल वक़्त नहीं हैं। सब के पास खाने का वक़्त हैं, घूमने का वक़्त हैं, रिश्तेदारों के यहाँ जाने का वक़्त हैं, फिल्मे गाने सुनने का वक़्त हैं लेकिन नमाज़ के लिए वक़्त नहीं। अफ़सोस आजकल के मुसलमान और पहले के ज़माने के पंज वक्ता नमाज़ी मुसलमान दोनों में कितना फर्क हैं। हालाँकि ऐसे काफी मुसलमान आज भी हैं जो आज भी नमाज़ो को पाबन्दी से अदा कर रहे हैं और नेक अमल कर रहे हैं। यह उन लोगो की बात हो रही हैं जो ऐसा नहीं कर रहे हैं। 

जिस तरह आप अपने कारोबार को सँभालने के वक़्त अगर कोई खरीददार (ग्राहक) आ जाये। उससे काफी देर तक बहस करने के बाद आप अपना सामान बेचते हैं और कुछ रुपया कमाते हैं। ग्राहक कुछ खरीदने में ज़िद करता हैं मोल भाव करता हैं उसके लिए भी तो आप वक़्त निकाल लेते हैं, अगर कुछ दूसरा काम आ जाये तो आप दुकान छोड़कर 10 मिनट के लिए और उससे ज़्यादा वक़्त के लिए उस काम को करने चले जाते हैं तो अज़ान की आवाज़ सुनकर सब कुछ छोड़कर अल्लाह के दरबार में कुछ वक़्त इबादत करने में क्या हर्ज़ हैं। अगर आप ऐसा कर लेते हैं तो बेशक आप के कारोबार में और बरकत होगी क्यूंकि रोज़ी देने वाला और उसमे बरकत देने वाला सिर्फ अल्लाह हैं। 

जिस तरह सख्त कारोबारी मसरूफियात के वक़्त अगर आपका लाडला बेटा या बेटी बीमार हो जाये तो आप दुकान और सारा काम काज छोड़कर उसके इलाज के लिए वक़्त निकाल लेते हैं। उस वक़्त आप अपने कारोबार के नुक़सान के बारे में बिलकुल नहीं सोचते। बेशक आपको ऐसा ही करना चाहिए लेकिन जब अज़ान हो रही होती हैं और अल्लाह आपको बुला रहा होता हैं तब आप दुकान छोड़कर नमाज़ पढ़ने क्यों नहीं जाते। क्या आपको खुदा से कोई मतलब नहीं? अगर औलाद के लिए दुकान बंद हो सकती हैं तो औलाद अता करने वाले अल्लाह के लिए भी दुकान बंद करके नमाज़ के लिए भी वक़्त निकाला जा सकता हैं। 

जिस तरह एक रिश्तेदार के इंतेक़ाल पर सब काम छोड़ कर आप मैयत में इस ख्याल से शिरकत करना ज़रूरी समझते हैं की अगर आप न गए तो रिश्तेदार नाराज़ हो जायेंगे और ऐसे वक़्त में अपने यहाँ भी कोई नहीं आएगा। इसी तरह नमाज़ का वक़्त हो जाने पर भी वक़्त निकलकर नमाज़ अदा कीजिये वरना अल्लाह आप से नाराज़ हो जायेगा। जब रिश्तेदार को नाराज़ करना आपको मंज़ूर नहीं तो अपने परवरदिगार को नाराज़ करना कैसे आपको मंज़ूर हो सकता हैं। 

जिस दिन बरसो की कमाई आप अपने बच्चो की शादी में लगा देते हैं। शादी के प्रोग्राम में हफ़्तों तक कारोबार बंद रखते हैं। अगर आप अपने बच्चो की ख़ुशी के लिए अपना कारोबार हफ्तों तक बंद रख सकते हैं तो अपने रब की ख़ुशी के लिए क्यों बंद नहीं कर सकते। इसमें तो आपको हफ़्तों तक बंद रखने की भी ज़रूरत नहीं। बस दिन में कुछ वक़्त निकालना हैं वो भी आपसे नहीं होता। इसके पीछे वजह यही हैं की मुसलमानो के दिलों में अल्लाह का खौफ अब नहीं रहा। उनको सिर्फ दुनियादारी से मतलब हैं। लोग सोचते हैं की मरने के बाद जब हिसाब होगा तब देखा जायेगा और बात को टाल देते हैं और वही दुनियादारी और मौज मस्ती के दुनिया में लग जाते हैं। उनको न अल्लाह से मतलब हैं न ही अल्लाह की इबादत से ! ऐसा करने वाले लोग बेशक जहन्नम के हक़दार हैं। आज मुसलमान एक दूसरे को काटने में लगा हैं एक दूसरे की तरक्की नहीं देखना चाहता एक दूसरे से जल रहा हैं क्या यही हमारे प्यारा आका पैगंबर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सिखाया हैं?

आज अज़ान की आवाज़ होती हैं तो कुछ घरों में टीवी की आवाज़ कम कर दी जाती हैं और कहते हैं की अज़ान हो रही हैं आवाज़ कम कर दो लेकिन अज़ान खत्म होते ही वापिस आवाज़ बढ़ा दी जाती हैं। ये सोच कर की अज़ान खत्म हो गयी हैं। ये नहीं सोचते की नमाज़ का वक़्त हो गया हैं। सभी काम छोड़ दिए जाये और नमाज़ कायम की जाये। आजकल के मुसलमानो के पास मोबाइल चलाने, वीडियो देखने, फिल्मे देखने, नाच गाने देखने का बहुत वक़्त हैं लेकिन अफ़सोस अल्लाह की इबादत के लिए सब बहाना बनाते हैं। जिस अल्लाह ने पूरी कायनात बनायीं जो रिज़्क़ दे रहा हैं। ज़िन्दगी दे रहा हैं। उसी के लिए लोगो के पास वक़्त नहीं रहा। इसका अंजाम क्या होगा आज हम देख ही रहे हैं। 

मुसलमानो पर कितनी मुसीबते आ रही हैं। मुसलमानो पर कई मुल्को में ज़ुल्म हो रहे हैं जैसे सीरिया,म्यानमार के हालत आप देख ही चुके हैं। बेगुनाह लोग मारे जा चुके हैं। इतने मुस्लिम मुल्क हैं दुनिया में लेकिन कोई मुसलमानो पर हो रहे ज़ुल्म के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाता। यही कमज़ोरी हैं मुसलमानो की ऐसा क्यों हो रहा है सोचने वाली बात हैं। मुसलमान आज इतना कमज़ोर हो गया हैं की लोगो की ग़ीबत उनसे नफरत के सिवा कुछ कर नहीं पा रहा। गलत कामो को करके हराम की कमाई खा रहा हैं। रिश्वत ले रहा हैं और दुनियावी मौजमस्ती को ही असली ज़िन्दगी समझ रहा हैं।

ऐ मुसलमानो दुनियादारी के चक्कर में अपनी आख़िरत को न भूलो। ये दुनियावी ज़िन्दगी तो एक दिन खत्म हो जाएगी। असली ज़िन्दगी इसके बाद ही शुरू होगी। अगर आपने खुदा के बताये रास्तों के मुताबिक काम किये और खुदा की इबादत में अपनी ज़िन्दगी निकाल दी हैं तो यकीनन आख़िरत का अंजाम बहुत अच्छा होगा और अगर आपने इसके खिलाफ काम किये तो यकीनन आख़िरत बहुत ही भयानक होगी। जिसके बारे में सोच कर ही रूह कांप जाये। सभी मुसलमानो को चाहिए की पाबन्दी से नमाज़ अदा करें। गलत कामों से बचे क्यूंकि ज़िन्दगी में भले ही आप बच जाओ लेकिन आख़िरत में अल्लाह के दरबार में नहीं बच पाओगे। आप कितने दिन ज़िन्दगी जी लोगे एक न एक दिन सभी को अल्लाह से सामना करना हैं और जो यह कहता हैं अल्लाह कुछ नहीं जो हैं यही ज़िन्दगी हैं। वह इंसान काफिर हैं। 

बहरहाल नमाज़े कायम करो। अल्लाह के बताये रास्तो पर अमल करो और बुरे कामो को करने से बचो आमीन 

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