Disabled Copy Paste

ज़ालिमों के ज़ुल्म का अंजाम (Zalimo Ke Zulm Ka Anjaam)

ज़ालिमों के ज़ुल्म का अंजाम (Zalimo Ke Zulm Ka Anjaam)

इंसान कितना ही बड़ा अमीर, वज़ीर, बादशाह बन जाये, वह हमेशा इंसान ही रहेगा खुदा नहीं हो सकता। इंसान को अल्लाह पाक ने बेपनाह इल्म व ताकत से नवाज़ा हैं। फिर भी वह मजबूर हैं। ज़िन्दगी में कदम कदम पर उसे अल्लाह के दरबार में हाथ फैलाना पड़ता हैं। इंसान न तो अपनी खुद की मर्ज़ी और खुशी से इस दुनिया में आया हैं और न ही अपनी मर्ज़ी से जा सकता हैं। अल्लाह जब चाहता हैं पैदा फ़रमा देता हैं और जब चाहता हैं उसे उठा लेता हैं। किसको कैसी मौत देनी हैं और किसको कैसी ज़िन्दगी सब अल्लाह के हाथ में हैं। कोई अचानक खड़े खड़े मर जाता हैं कोई बरसों तक बिस्तर पर एड़ियां रगड़ कर मरता हैं। किसी की मौत अस्पताल के आई सी यु में होती हैं जहाँ उसके पास कोई नहीं होता और किसी की मौत इस तरह होती हैं की सोच कर भी डर लग जाये।

अल्लाह पाक ने क़ुरान पाक में सब को इस हक़ीक़त से आगाह फ़रमा दिया हैं की हर पैदा होने वाले को किसी न किसी दिन मरना हैं और यह बात कोई नहीं जानता की कब कौन कहाँ और कैसे मरेगा। इस ज़मीन पर ऐसे भी ज़ालिम भी गुज़रे हैं जिन्होंने अपनी दौलत और हुकूमत के नशे में खुदाई होने का दावा किया और लोगो से अपनी पूजा करवाई। उनका जो भयानक अंजाम हुआ उसके कई वाकेआत क़ुरान मजीद में मौजद हैं।

नमरूद ने अपनी हुकूमत और ताकत में नशे में चूर होकर खुदाई होने का दावा किया तो उसे समझाने के लिए अल्लाह पाक ने हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम को भेजा। आपने उसे बहुत समझाया बरसों तक समझाते रहे वह नहीं माना तो अल्लाह पाक ने उसे हलाक (ख़त्म करके) उसका नामो निशान मिटा दिया।

फ़िरऔन का घमंड खाक में मिलाने के लिए अल्लाह ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को भेजा आपने उसे समझाया-फ़िरऔन ! तू खुदा नहीं हैं बल्कि खुदा का बंदा हैं। तेरा खुदा तो वह हैं जिसने तुझे पैदा फ़रमाया हैं लेकिन हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की बातें उसको समझ में न आयी वह लगातार लोगो से अपनी पूजा करवाता रहा और हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम और आपके साथियों को तरह तरह से सताने लगा। जब हद हो गयी तब अल्लाह पाक ने उसे उसकी फौज समेत समुन्दर में बहा दिया।

इसी तरह शद्दाद को भी अपनी दौलत पर बड़ा नाज़ और घमंड था। उस नादान ने तो खुदा से टक्कर लेने के लिए बेपनाह दौलत खर्च करके दुनिया में ही जन्नत बनवा डाली लेकिन अफ़सोस वह अपनी बनवाई जन्नत में कदम भी न रख सका। वह दाखिल होना ही चाहता था की एक मच्छर ने उसकी सारी हसरतों पर पानी फेर दिया और वह अपनी बनावटी जन्नत में कदम न रख सका। कारून भी अपनी दौलत के नशे में चूर हो गया था। अल्लाह पाक ने उसे भी उसके ख़ज़ानों समेत ज़मीन में धंसा दिया।

खुदाई का दावा करने वाले दौलतमंदो बादशाहो को अल्लाह पाक ने इसलिए ऐसी भयानक सज़ा दी ताकि दुसरो को सबक हासिल करने का मौका मिले और लोग अपनी दौलत और हुकूमत के नशे में खुदा बनने की भूल न करें, लेकिन अफ़सोस आज भी वह पुराना सिलसिला जारी हैं। दुनिया में चारों तरफ ऐसे ज़ालिमों के ज़ुल्म से अल्लाह के बन्दे तबाह और परेशान हो रहे हैं। आज भी ऐसे ज़ालिम लोग अपने रुतबे और दबंगई से लोगो के साथ ज़ुल्म कर रहे हैं। आज जवान लड़कियों के साथ ऐसे ज़ालिम और दबंग लोग गलत काम करते हैं और दौलत और पैसो के दम पर सब को उनके खिलाफ बोलने से चुप करवा देते हैं। दौलत के दम पर गरीबों के साथ ज़ुल्म करते हैं। गरीबों के बच्चो और औरतो को एक खिलौना समझते हैं। ऐसे लोगो के खिलाफ कोई आवाज़ नहीं उठाता। यह हम लोगों की कमज़ोरी हैं की हम ऐसे दौलत मंद और दबंग लोगो से डरते हैं। आज हम अगर मज़बूत हो जाये और हिम्मत करके ऐसे लोगो को ख़त्म कर दे तो दुनिया में कभी ऐसे ज़ालिम लोग पैदा नहीं होंगे।

बहरहाल हमें चाहिए की हम किसी भी इंसान को खुदा न समझ कर सिर्फ अल्लाह की इबादत करें। किसी ऐसे शख्स के चक्कर में न आये जो खुदा होने का दावा करता हो। जो भी मांगना हैं अल्लाह से मांगे और किसी के सामने हाथ न फैलाये बेशक अल्लाह बड़ा मेहरबान और रहम करने वाला हैं।

इस्लामी आदाब व तालीमात (Islami Adab and Taleemat)


इस्लामी आदाब व तालीमात (Islami Adab and Taleemat)

शायद लोग यही मानते हैं की इस्लाम तो मुसलमानों को नमाज़, रोज़े वगैरह जैसी इबादत की तालीम देकर उन्हें दुनिया व दुनियादारी से दूर रखने की तालीम देता हैं। यही तो हमारी सबसे बड़ी भूल हैं। हम इस्लाम के रूहानी पैगाम को समझने की कोशिश नहीं करते। इस्लाम हमें पाक साफ़,भाईचारा और अमन से ज़िन्दगी जीने की तालीम देता हैं ताकि हम दुनिया में एक इज़्ज़तदार इंसान की हैसियत से ज़िंदा रहे और हमारी पाक साफ़ ज़िन्दगी दुसरो के लिए एक मिसाल बने।

पाक साफ़ और इज़्ज़तदार ज़िन्दगी जीने की तालीम देते हुए अल्लाह पाक ने फ़रमाया ! ऐ ईमान वालो अपने घरो के अलावा दूसरे के घरों में घर वालो की इजाज़त के बगैर अन्दर न जाओ और जब तक उन्हें सलाम न कर लो तब तक घर के अन्दर दखिल न हो। यही तरीका तुम्हारे लिए बेहतर हैं। अगर घर में कोई न हो तो भी बिना इजाज़त के अन्दर न जाओ और अगर तुम्हे लौट जाने के लिए कहा जाये तो तुम लौट जाओ यही तुम्हारे लिए अच्छा हैं। तुम जो कुछ भी करते हो अल्लाह सब कुछ जनता हैं। अगर कोई घर आबाद न हो मतलब किसी घर का कोई मालिक न हो वहां बिना इजाज़त के जाया जा सकता हैं।

आबाद या रहने वाले वाले घर चार तरह के हो सकते हैं।  

1.हमारे अपने घर जिसमे हम अकेले रहते हैं उसमें जाने के लिए किसी से इजाज़त लेने की ज़रूरत नहीं।
2.दूसरे लोगों के घर। ऐसे घरों में जाने के लिए सब से पहले बाहर से ही सलाम करें। फिर घर के अन्दर आने के लिए घर वालों से इजाज़त लें। इजाज़त मिलें तो अन्दर जाये अगर इजाज़त न मिलें या मना कर दिया जाएं तो वापिस लौट जाएं।
3.ऐसे घर जो खाली पड़े हों या वहां कोई मौजूद नहीं हैं ऐसे घरों में भी घुसने की इजाज़त नहीं हैं। किसी को किसी की जायदाद में दखल देने का कोई हक़ नहीं।
4.वह घर जो आम लोगों के इस्तेमाल के लिए होते हैं जैसे रेलवे स्टेशन, स्कूल, होटल, रेस्टोरेंट वगैरह इन जगहों पर हम बिना इजाज़त के जा सकते हैं, लेकिन कानूनी तौर पर उसका किराया देना या पास हासिल करना हमारा इस्लामी फ़र्ज़ हैं।

हज़रत अता बिन यसार रदियल्लाहो अन्हो का बयान हैं, एक सहाबी दरबारे रसूल में हाज़िर होकर कहने लगें या रसूलल्लाह ! मैं अपनी माँ के साथ घर में रहता हूँ तो क्या मैं भी अन्दर जाने के लिए अपनी माँ से इजाज़त लूँ? आपने फ़रमाया तुम्हे इजाज़त लेकर ही अन्दर जाना चाहिए। उन सहाबी ने फिर रसूलल्लाह से फ़रमाया की उस घर में मैं और मेरी माँ ही रहते हैं तो फिर मुझे अपनी माँ से इजाज़त लेने की क्या ज़रूरत हैं? रसूलल्लाह ने सहाबी को समझाते हुए फ़रमाया ! तुम्हें इजाज़त लेकर ही अन्दर जाना चाहिए। क्या तुम अपनी माँ को ऐसी वैसी हालत में देखना पसंद करते हो जो तुम्हें पसंद नहीं? उसने कहा या रसूलल्लाह मुझे यह गवारा नहीं। आपने फ़रमाया ! इसीलिए तो इस्लाम इजाज़त लेकर घर के अन्दर दाखिल होने की तालीम देता हैं।

इबने कसीर का कहना हैं की अगर घर में सिर्फ तुम्हारी बीवी रहती हैं तो इजाज़त की कोई ज़रूरत नहीं। फिर भी अपने आने का इशारा कर दिया जाये तो बेहतर हैं। हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद की बीवी फरमाती हैं ! मेरे शौहर घर में आने से पहले दरवाज़ा खटखटा दिया करते थे। इसलिए उन्होंने मुझे कभी ऐसी हालत में नहीं देखा जिसमे वह मुझे देखना पसंद न करते थे। 

किसी की घर जाये तो सलाम करें अगर अन्दर से कोई जवाब न मिलें तो दरवाज़ा खटखटाने के बाद किसी के आने के इंतज़ार करें अगर फिर भी कोई न आये या कोई जवाब न मिलें तो हरगिज़ अन्दर न जाएं। दूसरी तरफ अगर किसी के घर में कोई मुसीबत आ जाये जैसे घर में आग लग जाये या कोई और हादसा हो जाएं जिससे जान माल का खतरा हो, ऐसे हालात में बिना इजाज़त के घर में घुसकर घर वालों की मदद करना इंसानियत और इस्लाम का पैगाम हैं।

बहरहाल हमारे लिए ज़रूरी हैं की हम इस्लामी उसूलों की पाबन्दी करें ताकि कोई दूसरा इंसान हम पर कोई गलत इल्ज़ाम न लगा सके की इस्लाम इन्हे कोई गलत काम सिखाता हैं। अल्लाह हमें इस्लाम पर चलने और उस पर अमल करने की तौफीक दें आमीन । 

मोमिन का आख़िरत का सफर (Momin Ka Akhirat Ka Safar)

मोमिन का आख़िरत का सफर (Momin Ka Akhirat Ka Safar)

एक दिन अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम एक अन्सारी सहाबी के जनाज़े में कब्रिस्तान तशरीफ़ ले गए। कब्र के पास पहुंचे तो कब्र तैयार नहीं थी इसलिए आप वहाँ बैठ गए। साथ जाने वाले सहाबा भी आप के गिर्द इस तरह खामोश बैठ गए जैसे की उनके सरो पर परिंदे बैठे हो। आप के हाथ में छड़ी थी आप उससे ज़मीन कुरेदने लगे फिर सहाबा से फरमाने लगे ! कब्र के अज़ाब से बचने के लिए अल्लाह से पनाह मांगो।

फिर फ़रमाया ! मोमिन का जब आखरी वक़्त करीब आता हैं और आख़िरत का सफर सामने होता हैं तो उसके पास आसमान से फ़रिश्ते नाज़िल होते हैं। जिनके चेहरे सफ़ेद होते हैं जैसे की सूरज चमक रहा हो उनके पास जन्नती कफ़न और जन्नती खुशबु होती हैं। वह फ़रिश्ते मरने वाले के पास बैठ जाते है। मरने वाले की नज़र जहाँ तक जाती हैं वहाँ तक फ़रिश्ते ही फ़रिश्ते नज़र आते हैं। फिर मलकुल मौत अलैहिस्लाम तशरीफ़ लाते हैं और उनके सिरहाने बैठ कर फरमाते हैं ! एक पाक जान अल्लाह की मगफिरत और रिज़वान की तरफ चल। फिर मोमिन की रूह इस तरह बहती हुई बदन से निकलती हैं जैसे मशक से पानी निकलता हैं। मलकुल मौत उस रूह को ले लेते हैं। उनके लेते ही दूसरे फ़रिश्ते फ़ौरन उस रूह को लेकर जन्नती कफ़न व खुशबु में डाल देते हैं। उस रूह से मुश्क की तरफ खुशबु निकलती हैं।

फिर फ़रिश्ते उस रूह को लेकर आसमान की तरफ बढ़ते हैं। उस खुशबूदार महकती रूह को देखकर आसमान के फ़रिश्ते पूछते है किस की रूह हैं? रूह ले जाने वाले फ़रिश्ते जवाब देते हैं, यह फलां इंसान की रूह हैं। इस तरह फ़रिश्ते उसे लेकर सातवें आसमान पर पहुँच जाते हैं उसके बाद अल्लाह का हुक्म आता हैं इस बन्दे के कामों का हिसाब किताब इल्लीइन में लिखो और रूह को वापिस ज़मीन पर ले जाओ क्यूंकि मैंने उसे ज़मीन से पैदा किया हैं वहीं लौटाऊंगा और फिर वहीँ से उठाऊंगा।

चुनांचे उसकी रूह वापिस लाकर उसके बदन में डाल दी जाती हैं। मुन्कर-नकीर उससे 3 सवाल करते हैं वह तीनो सवालो के सही जवाब देता हैं तो अल्लाह का हुक्म होता हैं ऐ फ़रिश्तो ! इसके लिए जन्नती फर्श बिछा दो इसे जन्नती जोड़ा पहना दो और इसके लिए जन्नत का एक दरवाज़ा खोल दो। इस तरह एक मोमिन का आख़िरत का सफर खत्म होता हैं।

अल्लाह तआला हमें इस्लामी ज़िदगी जीने की तौफीक दे और हमें अपने ईमान पर चलने की तौफीक अता फरमाए और ऊपर बयान हदीस के मुताबिक हमारा आखरी सफर आसान करके अंजाम बेहतर कर दे आमीन।

ईदुल फ़ित्र की इबादतें (Eid Ul Fitr Ki Ibadaten)

ईदुल फ़ित्र की इबादतें (Eid Ul Fitr Ki Ibadaten)

शौवाल इस्लामी साल का दसवां महीना हैं। इस महीने का चाँद देखकर सुरह फतह पढ़ कर हरा कपड़ा देखे या सुरह लहब पढ़ कर रंगीन कपड़ा देखे।
जो इंसान ईद की रात 4 रकात नफ़्ल नमाज़ पढ़े हर रकात में अल्हम्दो शरीफ के बाद 21 बार कुल हुवल्लाह शरीफ पढ़ेगा तो अल्लाह पाक उसके लिए जन्नत के आठों दरवाज़े खोल देगा।

इस महीने की पहली रात 4 रकात नफ़्ल नमाज़ पढ़े। अल्हम्दो शरीफ के बाद कुल हुवल्लाह, सुरह फ़लक, सुरह नास एक एक बार पढ़े तो अल्लाह पाक 6 महीने की इबादत का सवाब अता फरमाएगा। जो इंसान शौवाल की पहली रात में 20 रकात नफ़्ल नमाज़ पढ़े, हर रकात में अल्हम्दो शरीफ के बाद 5 बार कुल हुवल्लाह पढ़े।  अल्लाह पाक उसके आमाल नामे में एक साल की इबादत का सवाब लिखवाएगा।

जो इंसान इस महीने की पहली रात या दिन में 8 रकात नफ़्ल नमाज़ पढ़ेगा। हर रकात में सुरह फातेहा के बाद 25 बार कुल हुवल्लाह पढ़े, नमाज़ से फारिग होने के बाद 70 बार सुब्हानल्लाह,70 बार अस्तग़्फ़िरुल्लाह और 70 बार दुरुद शरीफ पढ़ेगा तो अल्लाह पाक इसकी बरकत से उसकी 70 ज़रूरते पूरी फरमाएगा और जन्नत में बेहतरीन मक़ाम अता फरमाएगा।

ईद के दिन ईद की नमाज़ के बाद घर पर आकर 4 रकात नफ़्ल नमाज़ पढ़े। पहली रकात में अल्हम्दो के बाद सुरह अअला दूसरी में सुरह शम्स तीसरी में सुरह वद दुहा और चौथी में कुल्हुवल्लाह पढ़ेगा तो अल्लाह पाक हज़ारो साल की इबादत का सवाब अता फरमाएगा।

जो गरीब इंसान ईद की नमाज़ के बाद घर आने पर 2 रकात नफ़्ल पढ़ेगा। हर रकात में अल्हम्दो शरीफ के बाद एक बार सुरह माऊन और तीन बार कुल्हुवल्लाह शरीफ पढ़ेगा तो उसे सदक़ए फ़ित्र अदा करने का सवाब मिलेगा। जो इंसान ईद के बाद 6 रोज़ा रखे जिसे शश ईद की रोज़े कहा जाता हैं।अल्लाह ऐसे इंसान को एक साल के रोज़े का सवाब अता फरमाएगा और उस पर दोज़ख की आग हराम कर देगा।

घर के ज़िम्मेदार को अपनी तरफ और अपने बीवी बच्चो की तरफ से ईद से पहले सदक़ए फ़ित्र (फ़ितरा) अदा करना वाजिब हैं। यह रकम रमज़ान के महीने में भी दी जा सकती हैं। फ़ितरा अदा करने वाले को एक दाने के बदले एक साल की इबादत का सवाब मिलता हैं। जो हैसियतदार होते हुए भी फ़ितरा ज़कात अदा न करे गरीबो का हक़ न दें, ऐसे लोग क़यामत में वह गरीबो का दामन पकड़ेंगे।

ईद के दिन ग़ुस्ल करे। हैसियत के ऐतबार से नए और साफ़ कपड़े पहनें, खुशबु लगाएं। ईदगाह जाकर नमाज़ अदा करें। नमाज़ के लिए जाने से पहले कुछ मीठी चीज़ खा ले। ईद का खुत्बा सुनना वाजिब हैं इसलिए नमाज़ पढ़ते ही घर न आये बल्कि खुत्बा सुनकर आये। लोगो से सलाम व मुसाफहा करें, ईद की मुबारकबाद पेश करें और क़ब्रिस्तान जाकर मुर्दो के लिए दुआएं मग़फ़ेरत करें। 

कब्र और गुनाह से जुड़ा एक बूढी औरत और एक आदमी का किस्सा

कब्र और गुनाह से जुड़ा एक बूढी औरत और एक आदमी का किस्सा

एक गांव में एक औरत रहा करती थी। वह पाबन्दी से पांचो वक़्त की नमाज़ पढ़ती थी, और मोहल्ले वालो को दीन की बातें बताया करती थी। एक दिन वह रात को कब्रिस्तान के करीब से गुज़री तो उसने कब्रिस्तान की निगरानी करने वाले आदमी को देखा की वह किसी मुर्दे का कफ़न चुरा कर ला रहा था। यह देख कर वह दंग रह गयी और सोचने लगी की जब मै मरूंगी तो यह आदमी मेरा कफ़न भी चुरा लेगा। यह सोच कर वह अपने घर गयी और अगले दिन पांच रुपये लेकर वापिस उसी जगह लोटी। उसने कब्रिस्तान की निगरानी करने वाले आदमी को पांच रूपए देते हुए कहने लगी! की देखो यह रूपए रख लो और मेरे मरने के बाद मेरा कफ़न मत चुराना। यह सुनकर वह आदमी चौंक गया और बड़ा शर्मिंदा हुआ की उसका पर्दाफाश हो गया। औरत ने कहा तुम इत्मीनान रखो मै इस बारे में किसी से नहीं कहूँगी। क्यूंकि किसी का ऐब छुपाना भी एक इबादत हैं। यह सुनकर उस आदमी को बड़ा अफ़सोस हुआ। उसने तौबा की और इक़रार किया की वह अब किसी का कफ़न नहीं चुरायेगा।

कुछ दिनों तक वह अपने वादे का पाबंद रहा लेकिन फिर उसने कफ़न चुराने वाला पुराना धंधा शुरू कर दिया। इसके कुछ दिनों बाद उस औरत का भी इंतेक़ाल हो गया। लोग जब उसे दफ़न करके कब्रिस्तान से चले गए तब रात को वही कब्रिस्तान की निगरानी करने वाला आदमी उस औरत की कब्र की और आया और आकर सोचने लगा की इस औरत का कफ़न निकालू या न निकालू। सोचते सोचते काफी देर हो गयी। आखिरकार उस आदमी को उसकी लालच ने फिर मजबूर कर दिया और वह उस औरत का कफ़न चुराने के लिए कब्र के और करीब पहुंचा। उसने उसी वक़्त उस औरत की कब्र खोदी कब्र खोदने के बाद जैसे ही उस औरत की लाश नज़र आयी तो वह डर के मारे काँप गया। उसने देखा की उस औरत के सीने पर एक काला खतरनाक साँप बैठा हुआ हैं। उसकी घबराहट देख कर एक आवाज़ आयी ! ऐ इंसान तूने वादे के बावजूद फिर ऐसी हरकत की एक साँप देख कर तू डर गया। क्या तुझे मालूम हैं की यह साँप मेरे सीने पर क्यों बैठा हैं? सुन एक बार मैंने अपने दाँत साफ़ करने के लिए बिना पूछे अपने पड़ोसी के घर पर लगे एक पेड़ से एक छोटी लकड़ी तोड़ दी थी। ज़िन्दगी में कभी यह ख्याल भी न आया की यह भी कोई गुनाह हैं। लेकिन आज उस चोरी की मुझे यह सज़ा मिल रही हैं। ज़रा तुम सोचो तुमने अपनी ज़िन्दगी में न जाने कितनी चोरियां की हैं। तुम्हारा क्या हाल होगा। इतना सुनते ही उसने उस औरत की कब्र बंद कर दी और सच्चे दिल से अपने गुनाहो से तौबा कर ली।

आज हम भी कुछ चीज़ो को मामूली गुनाह समझ कर उसे कर लेते हैं और उसका एहसास भी नहीं करते की हमने कुछ गलत किया हैं। आज का मुसलमान ग़ीबत कर रहा हैं, बेवजह नमाज़ छोड़ रहा हैं, लड़ाई झगडे कर रहा हैं, दीन की बातें कम फिल्मो गानो की बातें ज़्यादा कर रहा हैं। आज की पीढ़ी यह सोचती हैं की गुनाह कर लेते हैं जब हिसाब होगा तब देखा जायेगा और उसे मज़ाक में ले लेते हैं। आज हमे बड़े से बड़ा गुनाह करने पर रद्दी भर भी अफ़सोस नहीं होता तो फिर कब्र में हमारा क्या होगा ये सोचने वाली बात हैं। बहरहाल अल्लाह से हर वक़्त अपने किये गुनाहो की माफ़ी मांगो और कोई भी गुनाह चाहे छोटा हो या बड़ा वह करने से बचो।  

पांच वक़्त नमाज़ के राज़ और उसकी अहमियत

पांच वक़्त नमाज़ के राज़ और उसकी अहमियत
दुनिया की ज़िंदगी खत्म होने के बाद मुसलमानों पर पांच मुसीबते आती है। मौत,कब्र,हश्र, पुल सिरात और जन्नत का दरवाजा बंद होना। अल्लाह ने इन मुसीबतों को टालने व आसान करने के लिए पांच नमाजे फ़र्ज़ फ़रमाई हैं। दिन और रात की भी पांच हालतें होती है। सुबह, दोपहर, सेहपहर, शाम और रात इन वक्तो में नमाज़े फ़र्ज़ की गई ताकि मोमिन के हर वक्त की शुरुआत अल्लाह की इबादत से हो सुबह होने पर फज्र की नमाज़ अदा करके बंदा अपने दिन की शुरुआत अल्लाह के जिक्र व इबादत से करता है।

दोपहर में कारोबारी मसरूफियात के बाद खाना खाता है और थोड़ी देर आराम करता है। फिर ज़ोहर की नमाज अदा करके अपने दूसरे वक्त की शुरुआत अल्लाह की इबादत से करता है। कामकाज में लग जाने के बाद फिर अस्र की नमाज अदा करके वापिस कारोबार में लग जाने का तीसरा मौका मिलता है। यहां तक कि सूरज डूब जाता है और मगरिब की नमाज अदा करके इंसान अपने दिन भर के हिसाब किताब को समेटता है और ईशा की नमाज अदा करके दिन भर के थके दिल व दिमाग को आराम व सुकून देने के लिए सो जाता है। इस तरह एक मोमिन की जिंदगी का हर दिन और दिन का हर-हर पहर अल्लाह के जिक्र से शुरू और आबाद रहता है।

नुज़हतुल मजालिस में पांच नमाज़ो की खसूसियात यह भी लिखी है कि फज्र व ईशा की नमाज़ का वक्त कब्र और क़यामत के अंधेरे की तरह है। जिसने ईशा की नमाज़ अदा की उसने अपनी कब्र में रोशनी का इंतेज़ाम कर लिया। इसलिए तो कहा गया है कि नमाज़ कब्र के अंधेरे में रोशनी का काम करेगी और फज्र की नमाज़ के बदले नमाज़ी को दोज़ख से बरी कर दिया जाएगा। ज़ोहर के वक्त जहन्नम भड़कायी जाती है। ज़ोहर की नमाज़ अदा करने वाला गुनाह से साफ कर दिया जाता है। अस्र के वक्त हज़रत आदम अलैहिस्सलाम ने जन्नत में गेहूं का दाना खाया था। जिसने यह नमाज़ अदा की उस पर जहन्नम हराम कर दी जाती है। मगरिब के वक्त हज़रत आदम अलैहिस्सलाम की तौबा कबूल हुई थी। जो आदमी इस वक्त में नमाज़ अदा करेगा, वह अल्लाह से जो मांगेगा उसे वह दिया जाएगा।

बुखारी शरीफ की हदीस है ताजदार ए मदीना सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम फरमाते हैं ! पंज वक्ता नमाज़ो की मिसाल उस नहर जैसी है जो हर मुसलमान के घर के आगे से जारी है। जो आदमी यह पांचों नामज़े पढ़ता रहेगा गोया उसने 5 बार नहर में ग़ुस्ल किया। जिस तरह रोज़ाना पांच बार नहाने वाले के बदन पर मैल नहीं रहती, उसी तरह पाबंदी से पांचो नमाज़े पढ़ने वाले के गुनाह बाकी नहीं रहेंगे।

पांच का इंसानी जिंदगी से बड़ा गहरा रिश्ता है। खुद इंसान की पैदाइश भी पांच मंजिलें तय करने के बाद इंसानी शक्ल सूरत में आती है। नुतफा, अलक़ा मुज़गह, अज़मा, लहमा इसी तरह इंसान की भी पांच हैसियत होती है, बैठना,सोना,जागना,लेटना,उठना। इस तरह इंसान पांच वक्त की नामज़े अदा करके अल्लाह पाक के एहसानों का शुक्रिया अदा करता है।

मेराज की रात 50 वक्त की नमाज़े फ़र्ज़ हुई थी, जिनमें से 45 माफ कर दी गई। अब पांच बाकी है वही पांच नमाज़े फ़र्ज़ हैं। इन पांच नमाज़ो के बदले आपको सवाब 50 नमाज़ो का मिलता हैं। क्यूंकि अल्लाह पाक ने अपने कलाम में हर नेकी का बदला 10 गुना अता फरमाने की बशारत सुनाई है। इसलिए पढ़ने में पांच नमाज़े ही है लेकिन सवाब में 50 के बराबर है। अल्लाह पाक हमें पांच वक़्त की नमाज़ पढ़ने की तौफीक अता फरमाए आमीन।

कुर्सी पर बैठ कर नमाज़ पढ़ने के अहकाम (Kursi Par Namaz K Ahkam)

कुर्सी पर बैठ कर नमाज़ पढ़ने के अहकाम (Kursi Par Namaz K Ahkam)

कुर्सी स्टूल सोफा वगैरह जैसी ऊँची चीज़ पर बैठ कर नमाज़ पढ़ना जायज़ नहीं।  मरीज़ और मजबूर आदमी ज़मीन पर नमाज़ अदा करे क्यूंकि ऊँची चीज़ पर बैठ कर नमाज़ अदा करने को सरकार ने मना फ़रमाया हैं।

हज़रत जाबिर रदियल्लाहो अन्हो का बयान हैं, अल्लाह के रसूल एक मरीज़ को पूछने के लिए तशरीफ़ ले गए। आपने देखा की वह किसी तकिये पर बैठ कर नमाज़ अदा कर रहे हैं। नमाज़ हो जाने पर आपने फ़रमाया ज़मीन पर नमाज़ पढ़ो अगर इसकी ताकत न हो तो इशारे से नमाज़ पढ़ो और सज्दा को रुकू से कुछ नीचा करो। छोटी छोटी तकलीफो वाला मजबूर नहीं। मरीज़ वह हैं जो नमाज़ के अरकान सही तरीके से अदा करने से मजबूर हो। आजकल अक्सर देखने में आता हैं की मामूली सा बुखार आया या कोई मामूली से तकलीफ होने लगी तो बैठ कर नमाज़ शुरू कर दी इस तरह नमाज़ नहीं होती और पढ़ ली तो वह दोबारा पढ़नी चाहिए।

हज़रत इमरान बिन हसीन रदियल्लाहो का बयान हैं मै बीमार था तो सरकार से नमाज़ पढ़ने के बारे में पूछा। आका ने फ़रमाया ! खड़े होकर पढ़ो अगर खड़े होकर पढ़ने की ताकत न हो तो बैठ कर पढ़ो और अगर बैठने की भी हिम्मत न हो तो लेट कर पढ़ो।

अल्लाह पाक किसी बन्दे को उसकी हिम्मत से ज़्यादा तकलीफ नहीं देता। इस हदीस से अंदाज़ा हुआ की किसी ऊँची चीज़ पर जैसे की कुर्सी, स्टूल, सोफा वगैरह पर बैठ कर नमाज़ पढ़ना और रूकु सज्दा इशारे से करना दुरुस्त नहीं। नमाज़ ज़मीन पर ही बैठ कर अदा करे जिस तरह भी हो सके जैसा भी आसान व मुमकिन हो बैठ कर नमाज़ पढ़े।

अगर बैठ नहीं सकते तो दीवार वगैरह से टेका लगा कर पढ़े अगर टेका लगाना भी मुश्किल हो तो फिर लेटे लेटे पढ़े। अगर मरीज़ खड़ा हो सकता हैं लेकिन रूकु सज्दा नहीं कर सकता तो खड़े खड़े नमाज़ अदा करे, अगर रूकु नहीं कर सकता तो इशारे से रूकु करे और ज़मीन पर बैठ जाये और इशारे से सज्दा करे।

नमाज़ के लिए बीच में कुर्सी लगाने से सफ़ भी टूटती हैं। सफ़ सीधी व बराबर नहीं रह पाती कंधे से कंधा नहीं मिलता और सफ़ के बीच जगह खली रह जाती हैं। सफ़े सीधी रखना सुन्नत हैं। सरकार ने फ़रमाया ! सफ़ो को सीधा करो खाली जगह को बंद कर दो, शैतान के लिए बीच में कोई जगह न छोड़ो।जिसने सफ़ो को मिलाया अल्लाह उसे मिलाएगा। जिसने सफ़ को काटा अल्लाह की रहमत उससे अपना रिश्ता तोड़ लेगी।

एक और हदीस पढ़ते चले, हज़रत नोमान बिन बशीर रदियल्लाहो अन्हो फरमाते हैं ! सरकार हमारी सफ़े तीर की तरह सीधी करते हैं। एक दिन की बात हैं सरकार तशरीफ़ लाए तकबीर होने ही वाली थी की आपने एक नमाज़ी का सीना सफ़ से बाहर निकलते देखा। आपने फ़रमाया ! अल्लाह के बन्दों अपनी सफ़े तीर की तरह सीधी और बराबर किया करो वरना अल्लाह पाक तुम्हारे बीच इख़्तेलाफ़ (दरार) दाल देगा।

जुमा हो या ईद, बकरा ईद या आम दिन जो आदमी खड़ा हो सकता हैं अगर कुर्सी पर बैठ कर रूकु सज्दा करेगा तो उसकी नमाज़ नहीं होगी। अफ़सोस हैं की जो लोग गाड़ी चला लेते हैं पैदल चल लेते हैं घंटो खड़े खड़े यार दोस्तों के साथ बातें कर लेते हैं, और मस्जिद में आते ही बीमार मजबूर बन कर कुर्सियों का सहारा लेकर नमाज़ पढ़ने लगते हैं। ऐसे लोगो की नमाज़ नहीं होती। मस्जिद में इस तरह की चीज़ो से बचना चाहिए। अगर आप में हिम्मत हैं खड़े खड़े नमाज़ पढ़ने की तो कोशिश करे की उसी हिम्मत से मस्जिद में नमाज़ अदा करे ।

रोज़मर्रा की दुआएं: 12 जरूरी दुआएं अरबी, हिंदी उच्चारण और अर्थ के साथ

इस्लाम में दुआ केवल किसी परेशानी या जरूरत के समय अल्लाह से मांगने का नाम नहीं है। रोज़मर्रा के छोटे-बड़े कामों में भी अल्लाह को याद करना...

Popular Posts