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इस्लामी आदाब व तालीमात (Islami Adab and Taleemat)


इस्लामी आदाब व तालीमात (Islami Adab and Taleemat)

शायद लोग यही मानते हैं की इस्लाम तो मुसलमानों को नमाज़, रोज़े वगैरह जैसी इबादत की तालीम देकर उन्हें दुनिया व दुनियादारी से दूर रखने की तालीम देता हैं। यही तो हमारी सबसे बड़ी भूल हैं। हम इस्लाम के रूहानी पैगाम को समझने की कोशिश नहीं करते। इस्लाम हमें पाक साफ़,भाईचारा और अमन से ज़िन्दगी जीने की तालीम देता हैं ताकि हम दुनिया में एक इज़्ज़तदार इंसान की हैसियत से ज़िंदा रहे और हमारी पाक साफ़ ज़िन्दगी दुसरो के लिए एक मिसाल बने।

पाक साफ़ और इज़्ज़तदार ज़िन्दगी जीने की तालीम देते हुए अल्लाह पाक ने फ़रमाया ! ऐ ईमान वालो अपने घरो के अलावा दूसरे के घरों में घर वालो की इजाज़त के बगैर अन्दर न जाओ और जब तक उन्हें सलाम न कर लो तब तक घर के अन्दर दखिल न हो। यही तरीका तुम्हारे लिए बेहतर हैं। अगर घर में कोई न हो तो भी बिना इजाज़त के अन्दर न जाओ और अगर तुम्हे लौट जाने के लिए कहा जाये तो तुम लौट जाओ यही तुम्हारे लिए अच्छा हैं। तुम जो कुछ भी करते हो अल्लाह सब कुछ जनता हैं। अगर कोई घर आबाद न हो मतलब किसी घर का कोई मालिक न हो वहां बिना इजाज़त के जाया जा सकता हैं।

आबाद या रहने वाले वाले घर चार तरह के हो सकते हैं।  

1.हमारे अपने घर जिसमे हम अकेले रहते हैं उसमें जाने के लिए किसी से इजाज़त लेने की ज़रूरत नहीं।
2.दूसरे लोगों के घर। ऐसे घरों में जाने के लिए सब से पहले बाहर से ही सलाम करें। फिर घर के अन्दर आने के लिए घर वालों से इजाज़त लें। इजाज़त मिलें तो अन्दर जाये अगर इजाज़त न मिलें या मना कर दिया जाएं तो वापिस लौट जाएं।
3.ऐसे घर जो खाली पड़े हों या वहां कोई मौजूद नहीं हैं ऐसे घरों में भी घुसने की इजाज़त नहीं हैं। किसी को किसी की जायदाद में दखल देने का कोई हक़ नहीं।
4.वह घर जो आम लोगों के इस्तेमाल के लिए होते हैं जैसे रेलवे स्टेशन, स्कूल, होटल, रेस्टोरेंट वगैरह इन जगहों पर हम बिना इजाज़त के जा सकते हैं, लेकिन कानूनी तौर पर उसका किराया देना या पास हासिल करना हमारा इस्लामी फ़र्ज़ हैं।

हज़रत अता बिन यसार रदियल्लाहो अन्हो का बयान हैं, एक सहाबी दरबारे रसूल में हाज़िर होकर कहने लगें या रसूलल्लाह ! मैं अपनी माँ के साथ घर में रहता हूँ तो क्या मैं भी अन्दर जाने के लिए अपनी माँ से इजाज़त लूँ? आपने फ़रमाया तुम्हे इजाज़त लेकर ही अन्दर जाना चाहिए। उन सहाबी ने फिर रसूलल्लाह से फ़रमाया की उस घर में मैं और मेरी माँ ही रहते हैं तो फिर मुझे अपनी माँ से इजाज़त लेने की क्या ज़रूरत हैं? रसूलल्लाह ने सहाबी को समझाते हुए फ़रमाया ! तुम्हें इजाज़त लेकर ही अन्दर जाना चाहिए। क्या तुम अपनी माँ को ऐसी वैसी हालत में देखना पसंद करते हो जो तुम्हें पसंद नहीं? उसने कहा या रसूलल्लाह मुझे यह गवारा नहीं। आपने फ़रमाया ! इसीलिए तो इस्लाम इजाज़त लेकर घर के अन्दर दाखिल होने की तालीम देता हैं।

इबने कसीर का कहना हैं की अगर घर में सिर्फ तुम्हारी बीवी रहती हैं तो इजाज़त की कोई ज़रूरत नहीं। फिर भी अपने आने का इशारा कर दिया जाये तो बेहतर हैं। हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद की बीवी फरमाती हैं ! मेरे शौहर घर में आने से पहले दरवाज़ा खटखटा दिया करते थे। इसलिए उन्होंने मुझे कभी ऐसी हालत में नहीं देखा जिसमे वह मुझे देखना पसंद न करते थे। 

किसी की घर जाये तो सलाम करें अगर अन्दर से कोई जवाब न मिलें तो दरवाज़ा खटखटाने के बाद किसी के आने के इंतज़ार करें अगर फिर भी कोई न आये या कोई जवाब न मिलें तो हरगिज़ अन्दर न जाएं। दूसरी तरफ अगर किसी के घर में कोई मुसीबत आ जाये जैसे घर में आग लग जाये या कोई और हादसा हो जाएं जिससे जान माल का खतरा हो, ऐसे हालात में बिना इजाज़त के घर में घुसकर घर वालों की मदद करना इंसानियत और इस्लाम का पैगाम हैं।

बहरहाल हमारे लिए ज़रूरी हैं की हम इस्लामी उसूलों की पाबन्दी करें ताकि कोई दूसरा इंसान हम पर कोई गलत इल्ज़ाम न लगा सके की इस्लाम इन्हे कोई गलत काम सिखाता हैं। अल्लाह हमें इस्लाम पर चलने और उस पर अमल करने की तौफीक दें आमीन । 

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