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इमाम अहमद रज़ा खां फ़ाज़िले बरैलवी रहमतुल्लाह अलैह (आला हज़रत) की ज़िन्दगी

इमाम अहमद रज़ा खां फ़ाज़िले बरैलवी रहमतुल्लाह अलैह (आला हज़रत) की ज़िन्दगी

हमारे मुल्क हिंदुस्तान के बरैली शहर में 14 जून 1856 ईस्वी में सनीचर के दिन ज़ोहर के वक़्त हमारे आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खां फ़ाज़िले बरैलवी रहमतुल्लाह अलैह पैदा हुए। जिन्होंने इस्लाम को एक नयी ज़िन्दगी बख्शी। उनके किरदार उनके इल्म उनकी किताबों को पढ़कर आप इस्लाम के रास्ते पर चल सकते हैं। आपने ऐसी खूबियां मौजूद थी की आपके सामने दुनिया की बातिल ताकतें भी मात खा गयी। 14 साल की उम्र में आपमें इल्म का ऐसा दरिया था की उस वक़्त के बड़े बड़े आलिमों ने आपके इल्म का लोहा माना। आपने अपनी किसी खिदमत का कभी पैसा नहीं माँगा और मांगते भी क्यों? वह तो अपने आका के ऐसे गुलाम थे की दीन को फैलाना ही उनकी ज़िन्दगी का मकसद था। आपकी इल्मी व अमली काबिलियत को देखकर उस वक़्त के मशहूर बुज़ुर्ग हज़रत वारिस अली शाह आपके लिए बोल पड़े इसका मर्तबा अपने वक़्त के आलिमो और वलियों में आला हैं फिर तो आप आला हज़रत बनकर ही दुनिया में चमके।

आपने ज़िन्दगी भर दीन के दुश्मनो से कभी समझौता नहीं फ़रमाया। गुमराही फ़ैलाने वाली जमाअतों की नापाक हरकतों से हमेशा अवाम को खबरदार फरमाते रहे। आप ऐसी जमाअतों के गलत प्रचारों और अक़ीदों के जवाब में किताबें व रिसाले लिखते रहे। जब महात्मा गाँधी ने आपके मिलने की खवाहिश ज़ाहिर की तो आपने उनको पैगाम भिजवाया की मेरे यहाँ अगर आप दीनी मालूमात हासिल करना चाहते हो तो आ सकते हो सियासी मामलात पर बात करने के लिए आप तैयार नहीं। आपने कभी किसी दुनियादार, हाकिम, नवाब की कभी खुशामद नहीं की।

आपने महज़ 4 साल की उम्र में क़ुरान शरीफ पढ़ लिया था। छह साल की उम्र में आप पंजगाना नमाज़ के साथ साथ तहज्जुद की नमाज़ के भी पाबंद हो गए थे। 4 साल की उम्र के बाद आप कभी मदीना शरीफ और बगदाद शरीफ की तरफ पैर करके न सोये।

आप कितने ज़हीन और दीन के अलीम थे, यह आपके बचपन के वाक़ेआत से अंदाज़ा लगाया जा सकता हैं। आप बहुत छोटे ही थे की एक दीन आपके घर में कुछ मेहमान आये। उनमे काफी आलिम भी थे। आप के वालिद हज़रत नक़ी अली खां ने उन मेहमानों की मेजबानी फ़रमाई। एक मौलाना साहब को वज़ू के लिए पानी की ज़रूरत महसूस हुई। आप वही पास खड़े थे। मौलाना साहब ने फ़रमाया मियाँ ! वज़ू के लिए पानी ला दीजिये आपने फ़रमाया हज़रत ! पहले मुझे चवन्नी दीजिये फिर मैं पानी लाऊंगा। मौलाना साहब को यह बात अच्छी नहीं लगी और हज़रत नक़ी अली खां से आपकी शिकायत कर दी की आपका बच्चा वज़ू का पानी लाने के बदले पैसे मांग रहा हैं। जब मौलाना साहब आपकी शिकायत आपके वालिद से कर रहे थे तब आप भी वहां मौजूद थे। मौलाना साहब के मुँह से शिकायत सुनकर आप (आला हज़रत) बोले हज़रत मैं नाबालिग हूँ और नाबालिग से बिला उजरत या उसके वालेदैन की इजाज़त के बगैर खिदमत लेना मना हैं। आपकी बात सुनकर मौलाना साहब को अपनी गलती और हज़रत की इल्मी काबिलियत का अंदाज़ा हो गया।

हमारे आला हज़रत आशिके रसूल थे। कई बार ख़्वाब में मुस्तफा जाने रहमत सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम का दीदार फ़रमाया। यही नहीं आप हर जुमेरात को मदीना शरीफ पहुँच कर रोज़ए अक़दस पर हाजरी देते और वापिस तशरीफ़ लाया करते। यह बात हैरान करने थी की बरैली से मदीना हर जुमेरात को जाना और थोड़ी देर में हाजरी देकर आना कैसे मुमकिन हैं, लेकिन यह बात बिलकुल सच हैं। आप आला हज़रत में ऐसी करिश्माई ताकतें थी की आप हर जुमेरात को थोड़ी देर के लिए अचानक से गायब हो जाते और मदीना शरीफ पर हाजरी देकर वापिस आ जाते।

मौलाना हमीदुर्रहमान साहब बयां फरमाते हैं की एक वक़्त की बात हैं जब में बहुत छोटा था और बरैली शरीफ हाज़िर हुआ। जुमेरात की बात हैं जब में आला हज़रत के घर पर ही था। अचानक कोई साहब आये और हज़रत से मिलने की खवाहिश ज़ाहिर की। मैं यानि मौलाना हमीदुर्रहमान साहब जैसे ही आपको (आला हज़रत) को किसी के आने का पैगाम देने पहुंचे तो आपने देखा की आपके खास कमरे में कोई नहीं था। आपने आला हज़रत को बहुत तलाश किया लेकिन वह कही नज़र न आएं। मौलाना हमीदुर्रहमान साहब हैरान रह गए और सोचने लगे की अभी कुछ देर पहले तो यहाँ थे अचानक कहाँ गायब हो गए? अचानक कुछ देर बाद कमरे से आप आला हज़रत बाहर निकले। आपको देखकर सभी लोग हैरान रह गए और उनसे फरमाने लगे की आप कमरे में तो थे नहीं फिर आप कैसे तशरीफ़ ला रहे हैं? हम तो इसी कमरे के बाहर खड़े हैं और थोड़ी देर पहले हमने कमरे को देखा लेकिन वहां आप नहीं थे इसमें क्या राज़ हैं? आपने फ़रमाया अल्हम्दुलिल्लाह ! मैं हर जुमेरात को इस वक़्त अपने इसी कमरे से बरैली से मदीना मुनव्वरा हाजरी देता हूँ। यह बात सुनकर सभी लोगो के मुँह से एक ही अल्फ़ाज़ निकला सुभानअल्लाह सुभानअल्लाह ! आप आला हज़रत में ऐसी खूबियां थी की आप हर जुमेरात चंद लम्हो में आँखों से ओझल हो जाते और कुछ देर बाद वापिस अचानक नज़र आ जाते। अल्लाहो अकबर ऐसी शान वाले हैं हमारे आला हज़रत।

अल्लाह तआला हमें उनके नक़्शे कदम पर चलने और मुस्तफा जाने आलम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम की सुन्नतों पर अमल करने की तौफीक अता फरमाए आमीन। 

अल्लाह के वलियों की करामातें (Allah Ke Waliyon Ki Karamaten)

अल्लाह के वलियों की करामातें (Allah Ke Waliyon Ki Karamaten)


अल्लाह पाक ने अपने बन्दों की हिदायत के लिए दुनिया में हज़ारों नबी व रसूल भेजे। अलग अलग कौमों की तरफ अलग अलग ज़मानो में अलग अलग नबी तशरीफ़ लाये। उन नबियों को अल्लाह पाक ने एक खास कमाल अता फ़रमाया जिसे मोज़ेज़ा कहा जाता हैं। उन सभी नबियों रसूलों को देखकर या कहे उनकी हिदायतों और नसीहतों को सुनकर अलग अलग ज़माने में काफी लोग ईमान लाएं और काफी लोग ऐसे भी थे जो मोज़ेज़ा देखकर भी ईमान ना लाएं। ऐसे लोगों ने नबियों की करामातों उनके कमाल को जादू कह कर ठुकरा दिया। ऐसे लोगों ने एक खुदा को मानने से इंकार कर दिया और नबियों रसूलों की बताई नसीहतों को नहीं माना। ऐसे लोग आगे जाकर अल्लाह पाक की तरफ से तरह तरह की सज़ाओं और अज़ाब से मुबतला किये गए। 

इसी तरह नबियों व रसूलों का सिलसिला बंद हो जाने के बाद अल्लाह पाक ने अपने जिन बन्दों को इस्लाह व तबलीग़ की ज़िम्मेदारियाँ दी उन्हें वली कहा जाता हैं। अल्लाह ने अपने इन वलियों को भी कुछ खास ताकतें अता फ़रमाई जिन्हे करामात कहा जाता हैं। ज़रूरत पड़ने पर अल्लाह के इन नेक बन्दों ने अल्लाह की बख़्शी हुई इस ताकत का इस्तेमाल फ़रमाया। आपने दूर व नज़दीक के सैकड़ों वलियों की करामातें देखी सुनी होगी। 

सुल्तानुल हिन्द, हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ रहमतुल्ला अलैह की बहुत सी करामातें आपने सुनी होगी। आप अपने प्यारे रसूल के फरमान के मुताबिक तबलीग़ व इस्लाह के लिए हिंदुस्तान तशरीफ़ लाये और अजमेर को अपना तबलीग़ मरकज़ बनाया। 

अजमेर पहुँचते ही आप आराम करने के लिए जिस पेड़ के नीचे बैठे, वहां उस वक़्त के राजा के जानवर(राजा के पले हुए ऊंट) बैठा करते थे। राजा के सिपाहियों ने जब आपको बैठे देखा तो राजा के सिपाहियों ने आपसे कहा यहाँ से उठ जाओ। यहाँ हमारे राजा के ऊंट बैठा करते हैं।  आप (हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ रहमतुल्ला अलैह) ने फ़रमाया ऊंट तो कहीं और भी बैठ सकते हैं। यह सुनकर राजा की सिपाहियों ने आपको तेज़ आवाज़ में उठने को कहा। आप उसी वक़्त वहाँ से उठ गए और चल दिए। अगले दिन एक अजीब से वाक़ेया हुआ। जब राजा के सिपाहियों ने बैठे ऊंट को अपनी जगह से उठाना चाहा तो ऊंट तमाम कोशिशों के बावजूद नहीं उठे। यह देखकर सिपाही दंग रह गए और सारी बात अपने राजा को बताई। राजा ने सिपाहियों को हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ रहमतुल्ला अलैह से माफ़ी मांगने को कहा और कहा की उन्हें ढुंढो और उनसे माफ़ी मांगो। राजा के ऐसा कहते ही सिपाहियों ने आप हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ रहमतुल्ला अलैह को ढूंढ कर आपसे उनके किये बर्ताव की माफ़ी मांगी। हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ रहमतुल्ला अलैह ने उसी वक़्त उन्हें माफ़ कर दिया और कहा की तुम जाओ तुम्हारे ऊंट अब खड़े हो जायेंगे। सिपाहियों ने जब वापिस जाकर ऊंट को उठाना चाहा तो ऊंट उसी वक़्त उठ गए। सुभानअल्लाह ! यह हैं हमारे ख्वाजा गरीब नवाज़ का मर्तबा। 

हज़रत ख्वाजा उस्मान हारूनी रहमतुल्ला अलैह हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ के पीर मुर्शिद थे। यह वही बुज़ुर्ग हैं जिनकी खिदमत में हमारे ख्वाजा गरीब नवाज़ ने अपनी जवानी के 20 साल गुज़ारे। एक बार की बात हैं एक दिन आप अपने पीर हज़रत ख्वाजा उस्मान हारूनी रहमतुल्ला अलैह के साथ सफर में थे। सफर पर चलते चलते आप दजला नदी के किनारे पहुंचे। नदी पार करने के लिए कोई कश्ती नहीं थी। हज़रत ने फ़रमाया मोईनुद्दीन ! अपनी आंखे बंद कर लो फिर थोड़ी देर बाद फ़रमाया आँखे खोल दो। जब ख्वाजा गरीब नवाज़ ने अपनी आंखे खोली तो आप देखते हैं की दोनों दजला नदी के पार पहुँच चुके हैं। आपने हज़रत ख्वाजा उस्मान हारूनी रहमतुल्ला अलैह से पूछा हम दोनों नदी के पार कैसे आ गए? हज़रत ने फ़रमाया मैंने सिर्फ 5 मर्तबा सुरह फातेहा पढ़ी थी, उसकी बरकत से अल्लाह पाक ने हम दोनों को खैरियत के साथ दरिया के पार पहुंचा दिया। 

यह मक़ाम और मर्तबा उन्ही को नसीब होता हैं जो अपनी ज़िन्दगी अल्लाह की मर्ज़ी के मुताबिक ढाल लेते हैं और फिर उसी के हो जाते हैं। इसलिए अल्लाह पाक उनकी ज़बानों में ऐसी तासीर अता फ़रमा देता हैं की वह जो कहते हैं वह हो जाता हैं। यह ताकत हर किसी को नहीं मिलती यह सिर्फ अल्लाह के खास बन्दों को दी जाती हैं। जिसने अपने आप को अल्लाह के हवाले कर दिया समझो उसने अपनी ज़िन्दगी में सब कुछ पा लिया। बहरहाल ऐसे कैसे कई वली और पीर पैगम्बर की कहानियां हदीसों में मौजूद हैं, जिनके कारनामे हैरान करने वाले हैं। हम कोशिश करेंगे आगे भी ऐसे वलियों के करामातों की जानकारी आगे भी देते रहेंगे। 

अल्लाह हाफिज   

हर परेशानी और मुश्किल की इस्लामी दुआएं और वज़ीफ़ा (Har Pareshani Ki Duayen)

हर परेशानी और मुश्किल की इस्लामी दुआएं और वज़ीफ़ा

हर परेशानी और मुसीबत से निजात की इस्लामी दुआयें। आज हर शख्स तरह तरह की परेशानियों और मुसीबतों में मुब्तला हैं। आज के इस आर्टिकल में हम कुछ खास दुआओं के बारे में बातएंगे। जिस पर अमल करके आप इन परेशानियों को ख़त्म कर सकते हो।      

 

बीमारी से परेशानी के लिए 

अगर आप किसी बीमारी से परेशान हैं और काफी इलाज कराने के बावजूद बीमारी जा नहीं रही हैं तो इस अमल को करने से इंशाल्लाह बीमारी खत्म हो जाएगी। 

11 मर्तबा दुरुद शरीफ पढ़कर 41 बार सूरह फातेहा पढ़े। फिर दोबारा 11 मर्तबा दुरुद शरीफ पढ़े। फिर उसे पानी पर दम करके वह पानी पियें हो सके तो उसमें थोड़ा आबे ज़म ज़म का पानी भी मिला ले। सात दिन तक उसका पानी थोड़ी थोड़ी देर में जब भी प्यास लगे एक एक घूंट वह पानी पीते रहें। सांतवे दिन शाम को औलियाँ और अम्बियां, पैग़म्बरों के नाम पर फातेहा लगाकर अल्लाह से दुआ करें और अपने गुनाहों की माफ़ी मांगे और कुछ खाना गरीबों, ज़रूरतमंदों में तकसीम कर दें इंशाअल्लाह ये अमल करने से आपकी बीमारी दूर हो जाएगी। 


कामयाबी के लिए वज़ीफ़ा- 

अगर आपको अपनी ज़िन्दगी में कामयाबी नहीं मिल पा रही हैं तो ये अमल ज़रूर करें।  

11 बार दुरूदे ताज पढ़कर 2 रकात नफ़्ल नमाज़ पढ़े हर रकात में सूरह फातेहा के बाद सूरह नस्र 3 बार पढ़े। सलाम फेरने के बाद 11 मर्तबा दुरूदे जुमा पढ़कर अपनी कामयाबी के लिए दुआ मांगे और सुबह शाम यह दुआ पढ़े "अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मदीव व आलिही व असहाबिहि बि-अदा-दी मा-फ़ी जमीइल क़ुरआनी हरफन हरफव्वा बि अदा दी कुल्लि हर्फिन अलफ़न अलफ़न" 

ये पढ़ने से इंशाल्लाह आपको ज़बरदस्त कामयाबी हासिल होगी।


रोज़ी में बरकत के लिए 

जो शख्स हमेशा अपनी रोज़ी में बरकत चाहता और चाहता हैं की उसका माल बढ़ जायें तो वह सुबह शाम पाबन्दी से यह दुआ पढ़े।  

"अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मदिन अब्दिक़ा व रसूलिका व सल्लि अलल- मुअमिनिना वल मुअ मिनाती वल मुस्लीमीना वल मुस्लिमाती" इंशाल्लाह आपके माल में और बरकत होगी और कभी तंगी नहीं आएगी। 


नौकरी में तरक्की के लिए 

फज्र की नमाज़ के बाद 100 मर्तबा दुरुद शरीफ और 100 बार कुल्हुवल्लाह शरीफ साथ ही साथ दुआ "अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मदीव व आलिही व असहाबिहि बि-अदा-दी मा-फ़ी जमीइल क़ुरआनी हरफन हरफव्वा बि अदा दी कुल्लि हर्फिन अलफ़न अलफ़न" पाबन्दी से पढ़े। बेशक आपको अपनी नौकरी में तरक्की हासिल होगी। 


शैतानी ख़यालात दूर करने के लिए- 

जिन लोगों के दिमाग में हर वक़्त बुरे और शैतानी ख़यालात चलते रहे हैं वह ये अमल ज़रूर करें।  

हर नमाज़ के बाद दुरुद शरीफ पढ़कर 13 -13 बार सूरह फलक पढ़ लिया करें आखिर में दोबारा दुरुद शरीफ पढ़कर ऐसे खयालातों से छुटकारा पाने के लिए अल्लाह से दुआ करें। अल्लाह ने चाहा तो आप शैतानी वसवसों से महफूज़ रहेंगे।


कान में दर्द के लिए 

कान में दर्द से छुटकारा पाने के लिए 3 बार सूरह फ़लक पढ़ कर पानी में दम करके पियें इंशाल्लाह कान का दर्द दूर हो जायेगा। 


क़र्ज़ अदा करने के लिए 

जो शख्स कर्ज़दार हैं और क़र्ज़ चूका पाने में अपने आप को लाचार और कमज़ोर महसूस कर रहा हैं। वह सूरह आले इमरान सुबह शाम रोज़ाना 7 मर्तबा पाबन्दी से पढ़े। अल्लाह के करम से उसका क़र्ज़ अदा हो जायेगा और खुद के लिए रोज़ी के इंतेज़ाम भी हो जायेगा। 


कैंसर से निजात ( छुटकारे) की दुआ  

क़ुरान में हर बीमारी में इलाज हैं। जो लोग कैंसर की बीमारी की चपेट में आ चुके हैं या कहे जिनको कैंसर की बीमारी हैं या जो इस बीमारी से बचना चाहते हैं। वो निचे दिए गए फोटो में दी गयी दुआ को ज़रूर देखें इंशाल्लाह आपको इस बीमारी से निजात मिलेगी।

कैंसर के इलाज की दुआ


डिप्रेशन से छुटकारे के लिए दुआ 

अगर आप डिप्रेशन के शिकार हो गए हैं और उससे निकल नहीं पा रहे तो पाबन्दी से ये 2 दुआएँ पढ़े इंशाल्लाह बहुत जल्द आप इस बीमारी से निकल जायेंगे। 

या हय्यू या कय्यूम बिन रहमतिका अस्तगीसु शयन 

दूसरी दुआ "अल्लाहु अल्लाहु रब्बी ला उशरिकु बिहि शिआ (اللَّهُ اللَّهُ رَبِّي لا أُشْرِكُ بِهِ شَيْئًا)"


ऐसे ही और वज़ीफ़े और दुआएं जानने के लिए हमारे फेसबुक पेज इस्लाम इल्म https://www.facebook.com/islamilm786/ को फॉलो करें ताकि आगे भी आपको ऐसी दुआओं की जानकारी मिलती रहें। 

नमाज़ और आजकल के मुसलमानो के हालात (Namaz or Musalman)

नमाज़ और आजकल के मुसलमानो के हालात (Namaz or Musalman)

आज कल देखा जाता हैं की लोगो के पास नमाज़ पढ़ने के लिए बिलकुल वक़्त नहीं हैं। सब के पास खाने का वक़्त हैं, घूमने का वक़्त हैं, रिश्तेदारों के यहाँ जाने का वक़्त हैं, फिल्मे गाने सुनने का वक़्त हैं लेकिन नमाज़ के लिए वक़्त नहीं। अफ़सोस आजकल के मुसलमान और पहले के ज़माने के पंज वक्ता नमाज़ी मुसलमान दोनों में कितना फर्क हैं। हालाँकि ऐसे काफी मुसलमान आज भी हैं जो आज भी नमाज़ो को पाबन्दी से अदा कर रहे हैं और नेक अमल कर रहे हैं। यह उन लोगो की बात हो रही हैं जो ऐसा नहीं कर रहे हैं। 

जिस तरह आप अपने कारोबार को सँभालने के वक़्त अगर कोई खरीददार (ग्राहक) आ जाये। उससे काफी देर तक बहस करने के बाद आप अपना सामान बेचते हैं और कुछ रुपया कमाते हैं। ग्राहक कुछ खरीदने में ज़िद करता हैं मोल भाव करता हैं उसके लिए भी तो आप वक़्त निकाल लेते हैं, अगर कुछ दूसरा काम आ जाये तो आप दुकान छोड़कर 10 मिनट के लिए और उससे ज़्यादा वक़्त के लिए उस काम को करने चले जाते हैं तो अज़ान की आवाज़ सुनकर सब कुछ छोड़कर अल्लाह के दरबार में कुछ वक़्त इबादत करने में क्या हर्ज़ हैं। अगर आप ऐसा कर लेते हैं तो बेशक आप के कारोबार में और बरकत होगी क्यूंकि रोज़ी देने वाला और उसमे बरकत देने वाला सिर्फ अल्लाह हैं। 

जिस तरह सख्त कारोबारी मसरूफियात के वक़्त अगर आपका लाडला बेटा या बेटी बीमार हो जाये तो आप दुकान और सारा काम काज छोड़कर उसके इलाज के लिए वक़्त निकाल लेते हैं। उस वक़्त आप अपने कारोबार के नुक़सान के बारे में बिलकुल नहीं सोचते। बेशक आपको ऐसा ही करना चाहिए लेकिन जब अज़ान हो रही होती हैं और अल्लाह आपको बुला रहा होता हैं तब आप दुकान छोड़कर नमाज़ पढ़ने क्यों नहीं जाते। क्या आपको खुदा से कोई मतलब नहीं? अगर औलाद के लिए दुकान बंद हो सकती हैं तो औलाद अता करने वाले अल्लाह के लिए भी दुकान बंद करके नमाज़ के लिए भी वक़्त निकाला जा सकता हैं। 

जिस तरह एक रिश्तेदार के इंतेक़ाल पर सब काम छोड़ कर आप मैयत में इस ख्याल से शिरकत करना ज़रूरी समझते हैं की अगर आप न गए तो रिश्तेदार नाराज़ हो जायेंगे और ऐसे वक़्त में अपने यहाँ भी कोई नहीं आएगा। इसी तरह नमाज़ का वक़्त हो जाने पर भी वक़्त निकलकर नमाज़ अदा कीजिये वरना अल्लाह आप से नाराज़ हो जायेगा। जब रिश्तेदार को नाराज़ करना आपको मंज़ूर नहीं तो अपने परवरदिगार को नाराज़ करना कैसे आपको मंज़ूर हो सकता हैं। 

जिस दिन बरसो की कमाई आप अपने बच्चो की शादी में लगा देते हैं। शादी के प्रोग्राम में हफ़्तों तक कारोबार बंद रखते हैं। अगर आप अपने बच्चो की ख़ुशी के लिए अपना कारोबार हफ्तों तक बंद रख सकते हैं तो अपने रब की ख़ुशी के लिए क्यों बंद नहीं कर सकते। इसमें तो आपको हफ़्तों तक बंद रखने की भी ज़रूरत नहीं। बस दिन में कुछ वक़्त निकालना हैं वो भी आपसे नहीं होता। इसके पीछे वजह यही हैं की मुसलमानो के दिलों में अल्लाह का खौफ अब नहीं रहा। उनको सिर्फ दुनियादारी से मतलब हैं। लोग सोचते हैं की मरने के बाद जब हिसाब होगा तब देखा जायेगा और बात को टाल देते हैं और वही दुनियादारी और मौज मस्ती के दुनिया में लग जाते हैं। उनको न अल्लाह से मतलब हैं न ही अल्लाह की इबादत से ! ऐसा करने वाले लोग बेशक जहन्नम के हक़दार हैं। आज मुसलमान एक दूसरे को काटने में लगा हैं एक दूसरे की तरक्की नहीं देखना चाहता एक दूसरे से जल रहा हैं क्या यही हमारे प्यारा आका पैगंबर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सिखाया हैं?

आज अज़ान की आवाज़ होती हैं तो कुछ घरों में टीवी की आवाज़ कम कर दी जाती हैं और कहते हैं की अज़ान हो रही हैं आवाज़ कम कर दो लेकिन अज़ान खत्म होते ही वापिस आवाज़ बढ़ा दी जाती हैं। ये सोच कर की अज़ान खत्म हो गयी हैं। ये नहीं सोचते की नमाज़ का वक़्त हो गया हैं। सभी काम छोड़ दिए जाये और नमाज़ कायम की जाये। आजकल के मुसलमानो के पास मोबाइल चलाने, वीडियो देखने, फिल्मे देखने, नाच गाने देखने का बहुत वक़्त हैं लेकिन अफ़सोस अल्लाह की इबादत के लिए सब बहाना बनाते हैं। जिस अल्लाह ने पूरी कायनात बनायीं जो रिज़्क़ दे रहा हैं। ज़िन्दगी दे रहा हैं। उसी के लिए लोगो के पास वक़्त नहीं रहा। इसका अंजाम क्या होगा आज हम देख ही रहे हैं। 

मुसलमानो पर कितनी मुसीबते आ रही हैं। मुसलमानो पर कई मुल्को में ज़ुल्म हो रहे हैं जैसे सीरिया,म्यानमार के हालत आप देख ही चुके हैं। बेगुनाह लोग मारे जा चुके हैं। इतने मुस्लिम मुल्क हैं दुनिया में लेकिन कोई मुसलमानो पर हो रहे ज़ुल्म के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाता। यही कमज़ोरी हैं मुसलमानो की ऐसा क्यों हो रहा है सोचने वाली बात हैं। मुसलमान आज इतना कमज़ोर हो गया हैं की लोगो की ग़ीबत उनसे नफरत के सिवा कुछ कर नहीं पा रहा। गलत कामो को करके हराम की कमाई खा रहा हैं। रिश्वत ले रहा हैं और दुनियावी मौजमस्ती को ही असली ज़िन्दगी समझ रहा हैं।

ऐ मुसलमानो दुनियादारी के चक्कर में अपनी आख़िरत को न भूलो। ये दुनियावी ज़िन्दगी तो एक दिन खत्म हो जाएगी। असली ज़िन्दगी इसके बाद ही शुरू होगी। अगर आपने खुदा के बताये रास्तों के मुताबिक काम किये और खुदा की इबादत में अपनी ज़िन्दगी निकाल दी हैं तो यकीनन आख़िरत का अंजाम बहुत अच्छा होगा और अगर आपने इसके खिलाफ काम किये तो यकीनन आख़िरत बहुत ही भयानक होगी। जिसके बारे में सोच कर ही रूह कांप जाये। सभी मुसलमानो को चाहिए की पाबन्दी से नमाज़ अदा करें। गलत कामों से बचे क्यूंकि ज़िन्दगी में भले ही आप बच जाओ लेकिन आख़िरत में अल्लाह के दरबार में नहीं बच पाओगे। आप कितने दिन ज़िन्दगी जी लोगे एक न एक दिन सभी को अल्लाह से सामना करना हैं और जो यह कहता हैं अल्लाह कुछ नहीं जो हैं यही ज़िन्दगी हैं। वह इंसान काफिर हैं। 

बहरहाल नमाज़े कायम करो। अल्लाह के बताये रास्तो पर अमल करो और बुरे कामो को करने से बचो आमीन 

आबे ज़मज़म कुँवें की कहानी और इस पानी की फ़ज़ीलत

Abe Zam Zam Ka Pani

खानए काबा से महज़ 20 मीटर दुरी पर ज़म ज़म का कुआँ स्थित हैं। जो लगभग 5000 साल से भी ज़्यादा पुराना हैं। इसका पानी आज तक न कभी सूखा हैं न ही कभी ख़राब हुआ हैं। सुभानअल्लाह ! हदीस में हैं की एक बार हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम अपनी बीवी हज़रत बीबी हाज़रा और बेटे हज़रत इस्माइल को एक बीहड़ रेगिस्तान में छोड़ कर चले गए थे। उसी वक़्त हज़रत इब्राहिम के बेटे हज़रत इस्माइल जो की उस वक़्त एक दूध पीते बच्चे थे को बहुत प्यास लगी, तभी उनकी माँ हज़रत बीबी हाज़रा पानी की तलाश में इधर उधर दौड़ने लगी। जबकि ऐसे बीहड़ रेगिस्तान में पानी का कही नामोनिशान नहीं था। तभी अचानक आपके बेटे हज़रत इस्माइल के पैरों की रगड़ से एक पानी का फव्वारा जारी हो गया। हज़रत बीबी हाजरा ने उसी चमत्कारिक फव्वारे से अपने बेटे की प्यास बुझाई और आपने भी वह पानी पिया। यही फव्वारा जो आज आबे ज़म ज़म के नाम से जाना जाता हैं।

रसूले कायनात सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया ज़मज़म का पानी मुबारक हैं। यह पानी भूके के लिए खाना और बीमार के लिए दवा हैं। इस पानी में बहुत बड़ी शिफा हैं। यही वजह हैं की अल्लाह के प्यारे रसूल सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम इसे हमेशा साथ ले जाते। इसलिए हज और उमराह के मुबारक सफर पर जाने वालों के लिए वहां से ज़म ज़म शरीफ का पानी लाना सुन्नत हैं।
हमारे प्यारे रसूल को यह पानी बहुत पसंद था। आपने मक्का शरीफ के मशहूर खतीब हज़रत सहल बिन अम्र को खत लिखकर आबे ज़म ज़म तलब फ़रमाया। चुनांचे आपने दो मश्क़े आबे ज़म ज़म से भरकर ऊंट पर लदवा कर मदीना शरीफ भिजवाई।

आज के इस दौर में रासायनिक परीक्षणों से यह मालूम हुआ हैं की

1.ज़म ज़म के पानी में ऐसी चीज़ मिली हुई हैं जिससे बदन की जलन व गर्मी दूर होती हैं।
2.ज़म ज़म का पानी उलटी, मतली और सरदर्द में बहुत फायदेमंद हैं।
3.ज़म ज़म का पानी बदन को नुक्सान पहुँचाने वाले जरासीम को ख़त्म कर देता हैं।
4.इस पानी के अंदर जो सोडियम हैं उससे पेट साफ़ होता हैं और कब्ज़ की शिकायत दूर होती हैं।
5.यह पानी गठिया की बीमारी में बहुत फ़ायदा देता हैं।
6.यह पानी शुगर, खुनी पेचिश, पथरी, खुनी मस्सो के मरीज़ो के लिए बहुत मुफीद हैं।
7.इस पानी के अंदर मौजूद सोडियम क्लोराइड खून को साफ़ करता हैं पेट के दर्द और कॉलरा (हैजा) में यह पानी पीना बेहद मुफीद हैं।
8.कोयले के धुंए की ज़हरीली गैस से होने वाली तकलीफ इस पानी से दूर हो जाती हैं यह पानी बदन की कमज़ोरी को भी दूर करता हैं।
9.इस पानी में कैल्शियम कार्बोनेट भी मौजूद हैं जो खाना हज़म करने और पाचन शक्ति को मज़बूत करने में मदद करता हैं।
11.यह पानी गर्मी में लू का असर भी खत्म कर देता हैं।
12.इसमें मौजूद पौटेशियम नाइट्रेट गुर्दे के लिए बेहद मुफीद हैं यह पानी पेशाब को साफ़ करता हैं।

चालीसवां(चेहल्लुम) की फातेहा के खाने का असली हक़दार कौन?

चालीसवां(चेहल्लुम) की फातेहा का खाना किन लोगों के लिए?

इस्लामी अक़ीदा हैं की बदन से आज़ाद होने के बाद भी रूह ज़िंदा रहती हैं अज़ाब व सवाब की सजा और जज़ा उसी को भुगतनी होती हैं नेक लोगो की रूहें जन्नत की हक़दार होती हैं तो दूसरी तरफ गुनाहगारो की रूहें सज़ायें झेलती हैं।

इस्लामी अक़ीदा हैं की अगर किसी नेक काम का सवाब मरने वाले की रूह को पहुँचाया जाये तो वह ज़रूर पहुचंता हैं। अल्लाह तआला उसकी बरकत से मुर्दे का मर्तबा बुलंद करता हैं और उसकी सज़ा में भी कमी फ़रमा देता हैं और दरियाए रहमत जोश में आ जाये तो बख्श भी देता हैं। इसी अक़ीदे के तहत हम मुसलमानो में क़ुरआन ख्वानी, फातेहा, मीलाद वगैरह का दस्तूर कायम हुआ। यही रस्में बदलते बदलते अब दसवां, बिसवां, चालीसवां के नाम से मशहूर हो गयी। बेशक ऐसे खानो का सवाब भी मुर्दो को पहुँचता हैं जब तक वह सवाब की नियत से हक़दारो को खिलाया जाये। समाज के डर से या खानदान का नाम ख़राब न हो इस वजह से ऐसे खिलाना पिलाना गलत हैं। उससे न तो कोई सवाब मिलता हैं और न ही मुर्दे तक पहुंचता हैं। बिरादरी या रिश्तेदारों को चेहल्लुम का खाना खिलाना किसी भी ऐतबार से मुनासिब नहीं। हम इसे नाजाइज़ नहीं कह सकते लेकिन जो इस फातेहा के खाने के असली हक़दार हैं बेहतर हैं उन्ही को खाना खिलाया जाये।

इसाले सवाब के हिसाब से दसवां, बिसवां, चालीसवां का खाना सिर्फ गरीबो और मिस्कीनों के लिए ही हैं अगर मालदार खाते हैं तो यकीनन वह गरीबो का हक़ खाते हैं। मौजूदा दौर में चालीसवें का जो अंदाज़ हैं वह किसी भी ऐतबार से फायदेमंद नहीं बल्कि नुकसान देह हैं। आजकल देखा जाता हैं की गरीब को न बुलाकर मालदार रिश्तेदारों को चालीसवें का न्योता भेजा जाता हैं। 

ज़्यादातर लोग ऐसे मौकों पर गरीबो को अनदेखा कर देते हैं।  तमाम रिश्तेदार लोग इस तरह भर कर आते हैं जैसे किसी शादी में आये हों। खाना अच्छा लगा तो तारीफ कर देते हैं नहीं लगा तो घर जाकर बोलते हैं सही नहीं बनाया और तरह तरह की बेमतलब की बातें करते हैं। जिसका कोई मतलब नहीं। ऐसे रिश्तेदार व लोग इकठ्ठा होकर एक दूसरी की ग़ीबत में लग जाते हैं। ऐसे लोगों को बुलाना बेमतलब हैं।

दूसरी तरफ कई घरो में ऐसा होता हैं बाप अकेला कमाने वाले होता हैं और बच्चो के पास इतना पैसा नहीं होता की इतना बड़ा खाना कर सके फिर होता यूँ हैं की दसवां, बिसवां, चालीसवां के खाने के लिए बाप की बचाई रकम या कोई ज़मीन बेच कर खाने का इंतेज़ाम करते हैं क्यूंकि ज़्यादातर लोग कम आमदनी होने या पैसा न होने की वजह से एक दूसरे पर खाने का खर्च ढोल देते हैं। जिससे आपस में भाईओं के रिश्तों में कड़वाहट आ जाती हैं। भाई भाई आपस में ऐसे मौकों पर ज़मीन जायदाद के लिए लड़ जाते हैं। इससे बेहतर हैं आप कम लोगो गरीब और मिस्कीन को बुलाकर जितना आपकी हैसियत हो उस हिसाब से खाना खाना खिला दें। रूह को अज़ाब से बचाने या कम करने के लिए क़ुरान ख्वानी कर दें। गरीबों को पहनने का कपडा दे दें। यह बेहतर तरीका हैं इसाले सवाब करने का। जब भी आपके पास पैसा हो जितना हों आप यह काम उतने पैसो के हिसाब से कर दें।

कुछ बिरादरियों में दस्तूर हैं की चालीसवें के खाने के बाद सब घर वाले रिश्तेदार वगैरह जमा होते हैं और जिस तरह शादी के मौके पर घर वालों को रिश्तेदार अपने अपने रिश्ते के हिसाब से कपड़े पहनाते हैं उसी तरह चालीसवें के खाने के बाद पहनाते हैं अफ़सोस हैं की ऐसी ऐसी गलत और गैर इस्लामी हरकतें हाजियों और नमाज़ियों के सामने होती हैं लेकिन कोई टोकता नहीं।

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने हज्जतुल विदा के मौके पर मैदाने अरफ़ात में अपने ख़ुत्बे के दौरान फ़रमाया था की मैं सारी गैर इस्लामी रस्मों को अपने पैरों से कुचल रहा हूँ। अल्लाह ने तुम्हारे लिए इस्लाम पसंद फ़रमा लिया हैं। लेकिन आजकल कुछ जाहिल लोगों ने अवाम को जहालत की ऐसी ही गैर इस्लामी रस्मों में इतना उलझा दिया हैं की लोग उन रस्मों को ही इस्लाम समझते हैं। कुछ आलिम लोग इस तरह बताते हैं की इतना नज़राना दो इस तरह यह करो इससे यह होगा उससे वह होगा जिससे आदमी उनकी बातों में आ जाता हैं और गैर इस्लामी रस्मों को अपना लेता हैं।

अल्लाह तआला हमें इस्लाम पर अमल करने की तौफीक दे आमीन 

या लतिफु की फ़ज़ीलत (ya latifu ki fazilat)

या लतिफु की फ़ज़ीलत (ya latifu ki fazilat)

"या लतिफु " यह वह इस्मे पाक हैं जिसके फायदे और बरकते बेपनाह हैं। एक हदीस हैं की एक मर्तबा एक बुज़ुर्ग बड़े परेशान और बदहाल थे। एक अजीब सा खौफ उनके दिमाग पर छाया हुआ था। उनके दिल में हर वक़्त एक खौफ सा रहता था। जिसकी वजह से उन्हें कभी आराम नहीं मिलता। उन बुज़ुर्ग ने एक दिन सोचा की हर दर्द की दवा हैं मुहम्मद के शहर में है तो फिर क्यों न मक्का मुअज़्ज़मा का सफर किया जाये। इससे हज का फ़र्ज़ भी अदा हो जायेगा और दरबारे रसूले पाक में हाज़री भी हो जाएगी और अपने मर्ज़ का इलाज भी हो जायेगा। लेकिन फिर वह सोचने लगे आखिर सफर करें तो कैसे? न सफर के खर्चे के लिए कोई पैसा है और न ही इतना खाने पीने का सामान जो पुरे सफर में चल जाये। लेकिन वह (बुज़ुर्ग) किसी भी हाल में वहां (मक्का मुअज़्ज़मा) जाना चाहते थे। उन्हें बस एक धुन सवार थी की मक्का मुअज़्ज़मा का सफर करना हैं। फिर क्या था उन्होंने खुदा का नाम लिया और चल पड़े मक्का मुअज़्ज़मा के सफर के लिए यह भी नहीं सोचा के आगे उनके साथ क्या होगा। कैसे बिना पैसे और खाने के सफर होगा।

सफर शुरू होते ही पहले दिन उन्होंने काफी गर्मजोशी से सफर किया, लेकिन दूसरे दिन भूक प्यास से उनकी हालत ख़राब हो गयी। फिर सफर के चौथे दिन तो हाथ पैरों ने पूरी तरह से जवाब दे दिया। उन्हें महसूस हुआ की अब वह अब कुछ ही देर के मेहमान हैं। फिर उन्होंने काबा शरीफ की तरफ रुख किया और बैठ गए और सोचा की अगर मर भी गया तो मुँह तो काबा शरीफ की तरफ रहेगा। इतने में उन्हें कमज़ोरी से नींद आ गयी। सपने में आपने (उस बुज़ुर्ग) ने देखा की एक नूरानी चेहरे वाले बुज़ुर्ग आपके करीब आये जिन्होंने अपना नाम खिज्र बताया और उन्होंने आपसे मुसाफहा किया और बशारत दी की तुम बहुत जल्द मक्का मुअज़्ज़मा पहुँच जाओगे और तुम्हारी जो भी ख़्वाहिशें है वो भी पूरी होगी। बस तुम मेरी बताई एक दुआ को दिल से तीन मर्तबा पढ़ लो। यह दुआ मेरी जानिब से तुम्हारे लिए एक तोहफा हैं। जब भी तुम्हें कोई मुश्किल पेश आये तुम इसे तीन मर्तबा पढ़ लेना। इंशाल्लाह तुम्हारी हर मुश्किल आसान हो जाएगी। दुआ इस तरह हैं या लतीफ़म बिखलकेहि या अलिमन या ख़बीर" इस तरह आपने नींद में ही हज़रते खिज्र अलैहिस्सलाम  के साथ यह दुआ दुहराई और उसके फ़ौरन बाद किसी शख्स ने आपको नींद से जगा दिया वह शख्स ऊंट पर सवार था और हज के लिए जा रहा था। एक दूसरे की हालत जानने के बाद उस शख्स ने बुज़ुर्ग शख्स को अपने साथ ले लिया। खाने पीने के सामान के अलावा आपको ऊंट की सवारी भी मिल गयी। इस तरह वह बुज़ुर्ग मक्का मुअज़्ज़मा पहुँच गए।

मक्का में पहुंचते ही कोई शख्स आया और उसने रूपए से भरी थैली आपको दी और फ़रमाया की मेरी तरफ से घर वापसी के लिए आप यह रख लीजिये गोया आपकी वापसी के लिए खुदा ने इंतज़ाम फरमा दिया था। उसके बाद बुज़ुर्ग आदमी मदीना मुनव्वरा तशरीफ़ ले गए। रौज़ए रसूले पाक की ज़ियारत की और अपने हर मर्ज़ के इलाज की दुआ के साथ वापिस घर वापिस आ गए। कुछ दिन के बाद आपकी जितनी भी परेशानियां थी वह दूर हो गयी। सुभानअल्लाह।

एक और किस्सा सुनिए ! सैरुल आरिफ़िन में हज़रत शेख औहदुद्दीन किरमानी रहमतुल्लाह अलैहि ने भी एक रिवायत में फ़रमाया हैं की एक दिन वह हज़रत शेख जलालुद्दीन तबरेज़ी रहमतुल्लाह अलैहि के हमराह काबा शरीफ के ज़ियारत के लिए जा रहे थे। साथ में उनका काफिला भी था। रेगिस्तान की गर्मी अपनी इंतेहा पर थी। पहाड़ी रास्ते और पानी की किल्लत क़यामत बरपा रही थी। नतीजा यह हुआ की काफिले वालों के तमाम ऊँटो ने दम तोड़ दिया। पहाड़ी लोगो को पता चला तो वह इस मौके का फ़ायदा उठाने की गरज़ से अपने ऊंटों के साथ वहां आ पहुंचे और मुहमांगे दामों में ऊंट बेचने लगे। जो अमीर लोग थे उन्होंने बेझिझक ऊंट खरीदना शुरू कर दिया लेकिन गरीब लोग मायूसी और बेबसी से हाथ मलने लगे। हज़रत शेख जलालुद्दीन तबरेज़ी रहमतुल्लाह अलैहि से यह देखा न गया। आप आगे तशरीफ़ लाये और अपने कपड़ो में से एक थैली निकाली, फिर "या लतीफो पढ़ा" फिर थैली में हाथ डाला और अशरफियां निकल कर ऊंट वालो को देना शुरू कर दी। इसी अमल से आपने एक एक करके पांच सौ ऊंट ख़रीदे और गरीबों में तकसीम फरमा दिए लेकिन खुद पैदल बैतुल्लाह तक तशरीफ़ ले गए।

इस इस्मे पाक (या लतिफु) की ख़ैरो बरकत का ज़िक्र कई और हदीसों में मौजूद हैं। पाबन्दी के साथ इसे पढ़ना कई बलाओं से महफूज़ रखता हैं और कई मुराद पूरी करता हैं। अगर कोई बेरोज़गार हो या तंगदस्ती और फाकाकशी (भूक से मर रहा हो) या किसी और मुसीबत से परेशान हो तो हर नमाज़ के ख़तम होने के बाद 100 मर्तबा "या लतिफु" और 21 मर्तबा दुरुद शरीफ पढ़कर दुआ मांगे। इंशाअल्लाह दुआ कबूल होगी। शर्त यह हैं की जब तक मकसद पूरा न हो तब तक पुरे यकीन और ऐतमाद के साथ यह अमल जारी रखा जाये।

अल्लाह हम सबको इस्लाम में बताये रास्तो पर चलने की तौफीक अता फरमाए आमीन 

रोज़मर्रा की दुआएं: 12 जरूरी दुआएं अरबी, हिंदी उच्चारण और अर्थ के साथ

इस्लाम में दुआ केवल किसी परेशानी या जरूरत के समय अल्लाह से मांगने का नाम नहीं है। रोज़मर्रा के छोटे-बड़े कामों में भी अल्लाह को याद करना...

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