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हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम और मछली का किस्सा

हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम और मछली का किस्सा

अल्लाह ने अपने बन्दों की हिदायत के लिए जिन नबियों को दुनिया में भेजा उनमे से एक हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम भी हैं। जो मछली वाले नबी के नाम से मशहूर हैं। क्यूंकि आपने 40 दिन मछली के पेट में गुज़ारे थे। चलिए जानते हैं की आखिर क्यों हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम को मछली वाले नबी कहा जाता हैं? 

अल्लाह ने आपको लोगो की हिदायत के लिए नबी बनाकर भेजा उस वक़्त आप इराक का एक शहर नैनवा में नबी बनकर आये। मतलब अल्लाह ने आपको नैनवा शहर के लिए नबी चुना। आपका काम था लोगो को हिदायत देना उन्हें एक अल्लाह को मानने पर राज़ी करना और बुतपरस्ती से उनका ध्यान हटाना। आप ने आपके शहर की बस्ती के लोगों को एक अल्लाह की इबादत का पैगाम दिया और बुतपरस्ती के लिए मना किया लेकिन वहाँ के लोगों ने आपकी एक बात नहीं मानी और उन्होंने आप को बहुत परेशान किया नतीजतन उन्होंने अपना शहर छोड़ने का फैसला कर लिया और लोगों को बोला की मैं यहाँ से जा रहा हूँ लेकिन अगर तुमने बुतपरस्ती को नहीं छोड़ा तो बहुत जल्द इस शहर पर अल्लाह का बहुत बड़ा अज़ाब आएगा। 

ये कह कर आप यानि  हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम अपनी बस्ती से निकल गए और दूसरे देश जाने के लिए कश्ती पर सवार हो गए। लेकिन कश्ती कुछ देर बाद बीच नदी में पहुंची तो डूबने लगी तो मल्लाह (कश्ती चलाने वाला) ने कश्ती में बैठे लोगों से फ़रमाया ! जब कोई गुलाम अपने मालिक से भागकर हमारी कश्ती में आ बैठता हैं तो कश्ती डूब जाती हैं (चूँकि आप हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम भी अल्लाह को बताये बिना अपने शहर से भाग निकले थे)। मल्लाह के मुताबिक आज भी कुछ ऐसा ही मालूम हो रहा हैं मल्लाह ने लोगों से कहा जो भी अपने मालिक से भाग कर जा रहा हैं वह दरिया में कूद जाये ताकि दूसरे मुसाफिरों की जान बचायी जा सके। 

मल्लाह की बात सुनकर आपने फ़रमाया अपने मालिक से भगा हुआ गुलाम में ही हूँ इसलिए मुझे पानी में डाल दिया जाये।आपने कश्ती पर सवार सभी लोगों से वापिस कहा की मैं अल्लाह के हुक्म के बगैर ही कौम वालों के सितम से तंग आकर अपना वतन छोड़ कर कहीं और जाने के लिए निकला हूँ। इतना कहते ही आप पानी में डाल दिए गए पानी में जाते ही अल्लाह ने आपकी हिफाज़त के लिए एक बड़ी मछली को भेजा जो काफी देर तक कश्ती के किनारे चक्कर लगा रही थी। जैसे ही आप यानि हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम पानी में पहुंचे उस मछली ने आपको निगल लिया। 

अल्लाह ने मछली से फ़रमाया जिसको तूने निगला है वह तेरी रोज़ी नहीं हैं बल्कि मैंने अपने नबी को तेरे पेट में उनकी हिफाज़त के लिए पहुँचाया हैं। उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए। चुनाँचे आप 40 दिनों तक उस मछली के पेट में रहे। अल्लाह मछली का पेट इस तरह कांच की तरह साफ कर दिया था की आप आप मछली के पेट में रहते हुए भी समंदर के अंदर की हर चीज़ देखते और अल्लाह की तस्बीह बयां फरमाते रहे। आप मछली के पेट में रहते हुए ला इलाहा इल्ला अन्ता सुबहानका इन्नी कुन्तु मिन अज़ ज़ालिमिन (لَّا إِلَـٰهَ إِلَّا أَنتَ سُبْحَانَكَ إِنِّي كُنتُ مِنَ الظَّالِمِينَ ) पढ़ते रहे। इस तस्बीह की बरकत से अल्लाह करीम ने आप की सारी मुश्किल आसान फ़रमा दी और इसकी बदौलत आपको 40 दिनों तक हर वक़्त सुकून मिलता रहा।

फिर मछली को अल्लाह की तरह से हुक्म आया की जहाँ से तूने हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम को निगला था उन्हें वही जाकर अपने मुँह से उन्हें निकाल दे। अल्लाह ने फ़रमाया ! अब मैं उनसे खुश हूँ। वह यानि हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम अल्लाह के दिए इम्तेहान में पास हो गए थे। अल्लाह का हुक्म पाते ही मछली ने आपको किनारे पर उगल दिया उस किनारे पर अल्लाह ने आप के रहने के लिए एक पेड़ पैदा फ़रमा दिया और आप की खुराक के लिए एक हिरनी को आपको दूध पाने के लिए कह दिया।

कुछ दिनों बाद आप अपनी बस्ती की तरह फिर लौटे। तब वहाँ पर आपको एक ग्वाला मिला आपने उस ग्वाले से से फ़रमाया की यहाँ पर कोई अज़ाब आया था क्या? उस ग्वाले ने आपसे फ़रमाया की यूनुस नाम के एक शख्स ने काफी दिनों पहले एक बात कही थी की अगर बुतपरस्ती यहाँ के लोगो ने नहीं छोड़ी तो इस शहर पर अल्लाह का बहुत बड़ा अज़ाब नाज़िल होगा। आपने उस ग्वाले से फ़रमाया की क्या ऐसा हुआ था? ग्वाले ने कहा की जब वह शख्स यानि हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम जब बस्ती से रात को निकले तो अगले दिन पुरे शहर में बदल छा गए थे और चारों तरफ धुआँ ही धुआँ हो गया था। 

ऐसा लग रहा था जैसे अज़ाब आने वाला हैं। उस वक़्त हमे लगा की यूनुस की बात बिलकुल सही थी। तब सारे शहर के काफी लोग अपना सारा सामान और अपने परिवार को लेकर शहर छोड़ रहे थे और अल्लाह से दुआ कर रहे थे की अल्लाह उन्हें माफ़ कर दे। उस वक़्त वहाँ के लोगों ने अल्लाह से दुआ की के अब शहर का कोई भी आदमी बुतपरस्ती नहीं करेगा और कुछ ही देर में सारे बदल छंट गए और धुआँ एकदम से गायब हो गया। मतलब अल्लाह ने वहाँ के लोगों को माफ़ कर दिया था। यह सुनकर आप हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम ने ग्वाले से फ़रमाया की जिस यूनुस की तुम बात कर रहे हो वह मैं ही हूँ। यह सुनकर ग्वाला आप के कदमो में झुक गया और आपसे माफ़ी मांगने लगा। इस तरह आप वापिस अपने शहर की तरफ लौटे उसके बाद आपने वहाँ पर इस्लाम का परचम लहराया और वहाँ के सभी लोगों को एक अल्लाह की इबादत के लिए बताया। 

सदक़ा करने की फ़ज़ीलत (Sadka Karne ki Fazilat)

सदक़ा करने की फ़ज़ीलत (Sadka Karne ki Fazilat)

अल्लाह की राह में खर्च करना बड़े सवाब का काम हैं। जो लोग अल्लाह की राह में अपनी दौलत खर्च करते हैं अल्लाह ऐसे लोगों को बहुत पसंद करता हैं। अगर अल्लाह ने आप को दौलत से नवाज़ा हैं और आप उस दौलत को अपने ऐशो आराम और दुनियावी रंगो रौनक में खर्च कर रहे हो तो ऐसी दौलत का भी कोई फ़ायदा नहीं हैं। उल्टा आप अपनी आख़िरत को बिगाड़ रहे हो। अपनी आख़िरत सुधारने के लिए हम सब को चाहिए की हम अपनी दौलत अल्लाह की राह में खर्च करे यानि की ज़कात खैरात या सदके में खर्च करे अपनी दौलत का कुछ हिस्सा गरीब लोगों की मदद करने में लगाए।

अल्लाह की राह में खर्च करने के क्या फायदे हैं ?

अल्लाह की राह में अपना माल खर्च करने की बड़ी फ़ज़ीलत हैं। जो आदमी सवाब की नियत से अपना माल खर्च करता हैं। वह शख्स अल्लाह के बहुत नज़दीक रहता हैं। अल्लाह ऐसे लोगों को हर मुसीबत और परेशानी से बचाता हैं। अपनी ज़रूरत होते हुए भी अल्लाह की राह में अपना माल खर्च करना बेहतरीन सदक़ा कहलाता हैं। अपने माल में से एक रूपए खर्च करके किसी गरीब को देना मौत के वक़्त के सौ रूपए खर्च करने से बेहतर हैं। 

आजकल की दुनिया में अक्सर देखने में आता हैं की अच्छे दिनों में लोग सदक़ा खैरात की तरफ बिलकुल ध्यान नहीं देते। ऐसे लोग ये सोचते हैं की मैं कमा रहा हूँ तो अपने ऊपर ही खर्च करूँ या अपने परिवार के लिए खर्च करूँ। लेकिन ऐसे लोगों की जब मौत करीब आती हैं या वह किसी बीमारी से परेशान हो जाते हैं तब वह सदक़ा खैरात की तरफ ध्यान देते हैं। ऐसे लोग अल्लाह को बिलकुल पसंद नहीं। आजकल देखा जाता हैं की लोग जब किसी बीमारी से परेशान हो जाते हैं या कोई मुसीबत में फंस जाते हैं तब वह अपना माल सदक़ा खैरात में लगाते हैं। लेकिन जब सब कुछ अच्छा चल रहा होता हैं तो वह ऐसा कुछ नहीं करते। 

सदक़ा किन मुसीबतों से बचाता हैं?

आजकल लोग बड़ी बड़ी बीमारियों जैसे कैंसर, हार्ट से जुडी बीमारी या डिप्रेशन से परेशान हैं या जो लोग अचानक से कंगाल हो जाते हैं उसकी पीछे सबसे बड़ी वजह यही हैं की वह अपना माल अल्लाह की राह में खर्च नहीं करते। ऐसे लोग जब ऐसी मुसीबत में फंस जाते हैं या किसी बीमारी के शिकार हो जाते हैं तब लाखो रूपए हॉस्पिटल में लगाकर अपना इलाज करवाते हैं फिर भी बिलकुल सही नहीं होते। अगर हम अपना माल का कुछ हिस्सा सदक़ा खैरात में लगा दे तो बेशक इन सारी मुसीबतों से बच सकते हैं। 

लाखो रूपए अपने इलाज में लगाने से बेहतर हैं अपने माल का कुछ हिस्सा सदक़ा खैरात ज़कात या फ़ितरा में लगाए। अगर आप दिन के 100 रूपए भी कमाते हैं तो उसमे से एक रूपया या 5 रुपये रोज़ किसी गरीब को दे दें तो वह गरीब जो आपको दुआ देगा उस दुआ से आप हज़ारों मुसीबतों से बच सकते हैं। अल्लाह के रसूल फरमाते हैं की सदक़ा और खैरात आपको बलाओं से महफूज़ रखता हैं सदक़ा खैरात करने से आप बड़ी से बड़ी मुसीबतों से बच सकते हो सदक़ा बलाओं को टाल देता हैं। 

सदक़ा किस किस तरह का होता हैं?

माल पैसा खर्च करना ही सदक़ा नहीं बल्कि सवाब का छोटे से छोटा काम भी सदक़ा कहलाता हैं। अल्लाह के रसूल फरमाते हैं इन्साफ करना भी सदक़ा हैं। किसी को सवारी पर सवार करने में मदद देना भी सदक़ा हैं। रास्ते में पड़ी तकलीफ देने वाली चीज़ को हटा देना भी सदक़ा हैं। जो आदमी खेती करता हैं और हज़ारों लोगों को अपनी मेहनत से उगाया अनाज देता हैं वह भी सदक़ा हैं। किसी ने छांव के लिए पेड़ लगा दिया ये भी एक तरह का सदक़ा हैं। परिंदो को खाना देना भी सदक़ा हैं। अपने भाई से मुस्कुरा कर बात करना भी सदक़ा हैं। किसी को अच्छी या नेक सलाह देना और किसी को गलत काम से रोकना भी सदक़ा हैं। 

हदीस शरीफ में हैं जिस शख्स ने किसी शख्स को जिसके पास पहनने के लिए कपड़ा नहीं था उसे कपड़ा पहनाया और उसकी इज़्ज़त बढ़ाई अल्लाह करीम ऐसा करने वाले शख्स को जन्नत का जोड़ा पहनायेगा। जिसने किसी भूके को खाना खिलाया अल्लाह उसे जन्नत के फल खिलायेगा जिसने किसी प्यासे को पानी पिलाया और उसकी प्यास बुझाई अल्लाह करीम उसे जन्नती शरबत पिलायेगा। 

सदक़ा की बरकत से अल्लाह का अज़ाब ठंडा हो जाता हैं। अगर अल्लाह को राज़ी रखना चाहते हो तो सदक़ा खैरात करते रहो ताकि उसकी बदौलत आपको दुनिया और आख़िरत में खुशहाली मिल सके और ज़िंदा रहते आपको किसी मुसीबत का सामना न करना पड़े। 

अल्लाह हमें अपने माल का कुछ हिस्सा सदक़ा और खैरात में लगाने की तौफीक अता फरमाए आमीन। 


इस्लाम में जिहाद क्या हैं? (Islam me Jihad Kya Hain?)

Jihad Kya hain

आज के दौर में हमारे देश में जिहाद शब्द का इस्तेमाल काफी हो रहा हैं। लोग इस शब्द को लेकर तरह तरह की बातें बना रहे है और जिहाद की परिभाषा को गलत तरीके से पुरे देश और दुनिया के लोगों बता रहे हैं। आखिर इस्लाम में जिहाद हैं क्या? आज के ब्लॉग में हम इसी विषय पर चर्चा करेंगे की इस्लाम और जिहाद का क्या ताल्लुक हैं। 

इस्लाम में जिहाद क्या हैं?

आजकल के दौर में गैर मुसलमान जिहाद का मतलब लड़ाई, धोखा और किसी पर हमला ही समझते हैं। लेकिन क्या उन्हें मालूम हैं की हक़ीक़त में जिहाद की परिभाषा क्या हैं? हक़ीक़त में जिहाद का मतलब मेहनत, कोशिश करना,किसी चीज़ को पाने के लिए संघर्ष करना, ज़ुल्म के खिलाफ आवाज़ उठाना, इल्म हासिल करने के लिए हर मुसीबत का सामना करना यह जिहाद के मायने हैं। क़ुरान मजीद में जिहाद और जंग दोनों का बयान आया हैं और दोनों के मतलब अलग अलग हैं। इससे मालूम चलता हैं की हर जिहाद कोई जंग या युद्ध नहीं। 

जिहाद कई तरह का होता हैं जैसे की अगर कोई बेवजह इस्लाम के मानने वाले लोगो को परेशान कर रहा हैं उनको नुकसान पहुंचा रहा हैं और उन्हें मार रहा हैं ऐसे लोगो के खिलाफ जंग लड़ना जिहाद हैं। इसका मतलब यह नहीं की किसी भी बेगुनाह या ऐसा जो नहीं कर रहा हैं उसके खिलाफ जंग की जाये। जिहाद सिर्फ उनके लिए हैं जो दीन को नुकसान पहुँचाना चाहते हैं। इस्लाम यह इजाज़त देता हैं की अगर कोई आपके ऊपर हमला कर रहा हैं। आपके बीवी बच्चो को मार रहा हैं। आप को उससे अपने और अपने परिवार की जान का खतरा हैं तो आप ऐसे लोगो के खिलाफ जंग कर सकते हैं और अपना और अपने दीन का बचाव कर सकते हैं। एक और उदाहरण लेते हैं की हमारे देश के सैनिको को पड़ोसी मुल्क के ज़ालिम सैनिक मार देते हैं उन पर बेवजह ज़ुल्म करते हैं तो ऐसे मुल्क के सैनिको के खिलाफ जंग लड़ना भी जिहाद हैं। 

हालाँकि हमारे देश और कई देशो में ऐसे ज़ुल्म के खिलाफ कानून बने हैं। हमें पहले उसी की मदद लेना चाहिए लेकिन अगर कानून किसी समय में आपकी मदद नहीं कर पाता हैं तो आप ऐसे ज़ुल्मी लोगो के खिलाफ आवाज़ उठा सकते हो जैसा की कई मर्तबा कुछ हमले और ऐसी घटनाएं अचानक हो जाती हैं। ऐसे समय में आप ही को अपनी जान बचाने के लिए दुश्मनो से सामना करना पड़ता हैं। ऐसे समय में इस्लाम इजाज़त देता हैं की आप ऐसे मौको पर दुश्मनो से लड़े और उनका सामना करे। इसकी इजाज़त सिर्फ इस्लाम में नहीं बल्कि कई और धर्मो में भी यह बात कही गयी हैं अगर ज़ुल्म बढ़ता ही जा रहा हैं और कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा हैं तो इन्हे रोकने के लिए जंग कर सकते हो। 

इस्लाम ने जिहाद की इजाज़त कब दी? 

उस दौर में मक्का में रहने वाले मुसलमानो पर ज़ालिम बहुत ज़ुल्म कर रहे थे और वहाँ के मुसलमान उस ज़ुल्म को बर्दाश्त कर रहे थे। ऐसा 13 साल तक चलता रहा।  ऐसे समय में मक्का के मुसलमानो को अपना घर व कारोबार छोड़ कर मदीना शरीफ जाना पड़ा।  मदीना पहुँचने के बाद भी ज़ालिमों ने वहां भी मुसलमानो पर ज़ुल्म शुरू कर दिया। ऐसे नाज़ुक मौके पर अल्लाह ने अपने मोमिन बन्दों को दीन के उन दुश्मनो से मुकाबला करने या जिहाद की इजाज़त नबी करीम सल्ललाहो अलैहि वसल्लम के ज़रिये दी। 

इजाज़त मिलने पर हज़ार हथियार बन्द पहलवानों से मुकाबला करने के लिए 313 मुजाहिद अपने रसूल सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के साथ बद्र के मैदान में पहुंचे। यह इस्लाम की पहली जंग थी और इस जंग में आपकी फतह हुई थी। अल्लाह के रसुल ने तलवार के ज़ोर से कभी इस्लाम नहीं फैलाया बल्कि दुनिया को तलवार के इस्तेमाल का सलीका सिखाया। उन्होंने बताया की ज़ुल्म को रोकने के लिए कभी कभी हथियार उठाना एक ज़रूरत ही नहीं बल्कि फ़र्ज़ बन जाता हैं।  

आपने फ़रमाया की जब ज़ालिम इंसानियत और धर्म को नुकसान पहुँचाने लगे और इंसानी जान माल की कोई कीमत न रह जाये ऐसे नाज़ुक वक़्त में सिर्फ ज़ुल्म को देखते रहना और घरो या इबादतगाहों में पनाह लेना कोई समझदारी की बात नहीं। ऐसे मौके पर ज़ुल्म के खिलाफ मैदान में उतर जाना और ज़ालिमों का सफाया करके पूरी दुनिया को सुकून और चैन का माहौल देना ही इंसानी फ़र्ज़ हैं। इस्लाम ने सिर्फ ऐसे मौको पर ही जिहाद की इजाज़त दी हैं।  

आजकल जो देखने को मिलता हैं की कुछ ग्रुप के लोगों ने इस्लाम के नाम पर बेगुनाह कुछ लोगों का गला काट दिया। औरतों पर ज़ुल्म किया उनके साथ गलत बर्ताव किया। ऐसे कामो और ऐसे लोगों का इस्लाम से कोई लेना देना नहीं। जो लोग पैगम्बर सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लमके बताई बातों के हिसाब से ज़ालिमों से लड़ता हैं। वही इस्लाम में जिहाद हैं। बेगुनाह लोगों को मारने की इजाज़त इस्लाम नहीं देता। इस्लाम सिर्फ उन्ही लोगों से लड़ने को कहता हैं जो आप पर ज़ुल्म कर रहे हो। 

आज हमारे देश में जिहाद को जो तरह तरह की नाम दिए जा रहे हैं इनका ज़िक्र कही भी क़ुरान में नहीं हैं। आज कुछ लोग हर गलत चीज़ को जिहाद से जोड़ रहे हैं। ऐसे लोगो से यही दरख्वास्त है की हर गलत चीज़ को इस्लाम से न जोड़े। जो गलत कर रहा हैं उसे इस्लाम ने यह करना नहीं सिखाया हैं। किसी की गलती को पुरे इस्लाम से जोड़ना बेवकूफी हैं। कौम के लोगों से गुज़ारिश हैं की कोई भी ऐसा गलत काम न करे जिससे दूसरे लोग सिर्फ आपके नाम को देखकर पुरे इस्लाम पर ऊँगली उठाये। बेशक आप अपने हक़ के लिए लड़ो, कामयाब बनो, देश और दुनिया में अपना और क़ौम का नाम रोशन करो, ज़रूरत पड़ने पर ज़ालिमों का ख़ात्मा करो यही असली जिहाद हैं।

इस्लामी सूरह और उन्हें पढ़ने के फायदे (Islami Surah or unhe Padhne ke Faide)

इस्लामी सूरह और उन्हें पढ़ने के फायदे (Islami Surah or unhe Padhne ke Faide)

 

आज के इस ब्लॉग आर्टिकल में हम आपको कुछ खास इस्लामी सूरह के बारे बताएँगे जिन्हें पढ़ कर आप अपनी ज़िन्दगी सुधार सकते हैं और काफी मुसीबतों से बच सकते हैं।  


सूरह आले इमरान 

जो आदमी क़र्ज़ से मुब्तला हो या कहे बहुत कर्ज़दार हो गया हो अगर वह रोज़ाना सात मर्तबा यह सूरह पढ़ेगा तो इंशाल्लाह वह उस क़र्ज़ से आज़ाद हो जायेगा और अल्लाह तआला क़र्ज़ से आज़ाद करने के बाद उसकी रोज़ी का इंतेज़ाम भी कर देगा। अगर आप क़र्ज़ से परेशान हैं तो इस सूरह को कसरत से पढ़े इंशाल्लाह आपकी यह मुसीबत दूर हो जाएगी। 

सूरह निसा 

अगर मिया बीवी में मनमुटाव हो गया है ये रिश्ते में दरार आ चुकी हैं तो इस सूरह को पानी पर दम करके अगर मिया बीवी को पिलाया जाये तो तो दोनों में फिर से मोहब्बत पैदा हो जाएगी और बिगड़ते रिश्ते सुधरने लग जायेंगे और आपसी मनमुटाव दूर हो जायेगा और इंशाल्लाह घर का माहौल फिर से खुशगवार हो जायेगा। 

सूरह आराफ़

इस सूरह को रोज़ कम से कम तीन मर्तबा पढ़ने वाला शख्स बालाओं और मुसीबतों से महफूज़ रहेगा। बड़ी से बड़ी आफत और मुसीबत उससे दूर रहेगी और बंदा शैतानी वस्वसे से भी दूर रहेगा। 

सूरह युसूफ 

अगर किसी को क़ुरान की कोई सूरह याद नहीं हो रही या कोई शख्स क़ुरान हाफिज बनना चाहता हैं तो उसे चाहिए की सबसे पहले सूरह युसूफ याद करे। इसकी बरकत से आपको पूरा क़ुरान मजीद याद हो जायेगा और हमेशा याद रहेगा। अगर किसी शख्स को बिना वजह से नौकरी से निकाल दिया गया हैं या गलत तरीके से उसे नौकरी छोड़ने के लिए मजबूर किया जा रहा हैं तो ऐसे शख्स को चाहिए की वह सूरह युसूफ रोज़ाना नमाज़ के बाद 13 मर्तबा पढ़े इंशाल्लाह उसकी नौकरी वापिस बहाल हो जाएगी और आगे भी नौकरी में कभी दिक्कत नहीं आएगी।

कोई गरीब आदमी या जिस के पास माल और दौलत खत्म हो रहा हैं और खाना पीना भी मुश्किल हो रहा हैं वह भी इस सूरह को पाबन्दी से रोज़ाना पढ़ कर अल्लाह से दुआ मांगे इंशाल्लाह उसकी गरीबी ख़त्म हो जाएगी। 

सूरह इब्राहिम 

अगर किसी शख्स पर जादू करके उसे नामर्द बना दिया गया हो या किसी की मर्दाना ताकत किसी वजह से ख़त्म हो गयी हो तो उसे चाहिए की वह रोज़ाना तीन बार यह सूरह पढ़े इंशाल्लाह जादू का असर खत्म हो जायेगा और उसकी मर्दाना ताकत वापिस बहाल हो जाएगी। 

सूरह बनी इसराइल 

घर में कोई बच्चा कमज़ोर दिमाग वाला हो या उसे बोलने में दिक्कत आती हो या बोल ही नहीं पाता हो और चीज़ो को समझ ही नहीं पाता हो तो मुश्क व ज़ाफ़रान से इस सूरह को लिख कर पानी में घोल कर पिए इंशाल्लाह बच्चा साफ़ बोलने लगेगा और उसका दिमाग एक नोर्मल बच्चे जैसा हो जायेगा। 

सूरह ताहा

अगर किसी लड़की का निकाह न हो रहा हो या निकाह में रुकावट आ रही हो ये यह सूरह दिन में 21 मर्तबा रोज़ पढ़े इंशाल्लाह जल्द ही अच्छे रिश्ते की खबर आएगी और नेक मर्द से उसकी शादी भी हो जाएगी और रिश्ते में भी आगे कोई रुकावट या नफरत पैदा नहीं होगी। 

सूरह मरियम और सूरह कौसर 

अगर किसी औरत के बच्चा ठहरने में दिक्कत आ रही हैं या किसी वजह या रुकावट से बच्चा न हो रहा हो तो ऐसी औरत को चाहिए की सूरह मरियम रोज़ाना एक मर्तबा वज़ू करके रोज़ पाबन्दी से पढ़े इसके साथ आप सूरह कौसर भी पढ़े इंशाल्लाह आपको जल्द ही खुशखबरी मिलेगी और बच्चा होने के वक़्त भी ज़्यादा तक़लीफ़ नहीं होगी। 

सूरह यासीन 

सूरह यासीन की फ़ज़ीलत के बारे में हमने एक पहले भी आर्टिकल लिखा हैं जिसे आप पढ़ सकते हैं हम वापिस इस सूरह को पढ़ने के फायदे के बारे में आपको बातएंगे। सूरह यासीन को क़ुरान का दिल कहा जाता है। इसे क़ुरान में सबसे बेहतरीन और बरकत वाली सूरह में शुमार किया जाता हैं। इसे पढ़ने के काफी सारे फायदे हैं जो इस तरह है,

  • अगर आप किसी मुसीबत में फंस चुके हो और कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा हो तो सूरह यासीन पढ़े इंशाल्लाह आपकी मुसीबत आसानी से दूर हो जाएगी। 
  • अगर किसी औरत के बच्चा होने के आखरी महीने में अगर आप चाहते हो की उसे कोई परेशानी न हो या कहे बच्चे की डिलीवरी आसानी से बिना किसी खतरे के हो जाये तो आपको चाहिए की यासीन शरीफ पानी पर दम करके वह पानी उस औरत को पिला दे इंशाल्लाह बच्चे की डिलीवरी आसानी से हो जाएगी। 
  • अगर आपका कोई दुश्मन हैं जो आपको मारना चाहता हैं या आपको परेशान करना चाहता हैं तो आप जुमे के दिन फज्र की नमाज़ के बाद एक मर्तबा यासीन शरीफ पढ़े और ऐसे लोगो से बचने की दुआ मांगे इंशाल्लाह वह दुश्मन आप के आस पास भी नहीं भटकेगा। 
  • सूरह यासीन को पढ़ने से बीमारी में भी शिफा हासिल होती है और इसको पाबन्दी से पढ़ने वाला शख्स कभी किसी गंभीर बीमारी का शिकार नहीं होता। 

सूरह बक़रह 

यह क़ुरान पाक की सबसे बड़ी सूरह हैं इसे पढ़ने का सवाब तो ही साथ ही साथ यह सूरह आपको काफी मुसीबतों और परेशानियों से भी बचाती हैं। जो शख्स इस सूरह को दिन में एक बार अगर दिन में न हो सके तो हफ्ते में एक बार इस सूरह को दिल से पढ़ता हैं तो उस शख्स की उम्र में बरकत होती हैं। अगर आपके घर पर या आस पास ज़हरीले जानवर जैसे सांप या कुछ और जिससे जान को खतरा हैं तो आपको चाहिए की सूरह बक़रह पढ़ कर पानी में दम करके उसमे थोड़ा और पानी मिलकर किसी बोतल में भर ले और वह पानी घर के चारो और जहाँ से जानवर घर में घुसता हैं वहां वह पानी थोड़ा थोड़ा डाले इंशाल्लाह घर में कभी कोई ज़हरीला जानवर नहीं घुसेगा। 

सूरह बक़रह आपको जादू टोन से भी बचाता है आप अगर कही जा रहे है और आपको लगता है यह जगह सही नहीं हैं मतलब उस जगह शैतान हवा में घूमते हैं तो आपको चाहिए की सूरह बक़रह पढ़ कर जाये तो आप शैतानी वसवसे से दूर रहेंगे और कोई जादू टोना आप पर असर नहीं करेगा। इसके अलावा भी इस सूरह के काफी फायदे हैं जो इंशाल्लाह हम आपको अगले आर्टिकल में बताने की कोशिश करेंगे।

अल्लाह हाफिज  

नफ़्ल नमाज़े और उसकी बरकतें (Nafl Namaze or Uski Barkaten)

नफ़्ल नमाज़े और उसकी बरकतें (Nafl Namaze or Uski Barkaten)

 

इस्लाम में पांच वक़्त की जो नमाज़े फ़र्ज़ हैं उन्हें तो अदा करना ही हैं अगर यह नमाज़े अदा नहीं करेंगे तो बेशक आप गुनहगार होंगे। इन पांच वक़्त की नमाज़ो के अलावा कुछ ऐसी नफ़्लें नमाज़े भी भी हैं जिन्हे अगर आप पाबन्दी से अदा करते हैं तो आप बेशक अल्लाह के महबूब बन्दे बन जायेंगे। एक हदीस की मुताबिक जो शख्स जो पांच नमाज़े फ़र्ज़ हैं उनके अलावा नफ़्ल नमाज़े भी पाबन्दी से अदा करता हैं। अल्लाह पाक ऐसे शख्स को हर मुसीबतो से बचाता हैं। उसके अलावा ऐसे शख्स को बेशुमार नेमतें हासिल होती हैं। 

इसलिए आज के इस आर्टिकल में हम आपको कुछ ऐसी नफ़्ल नमाज़ो में बारे में बताने वाले हैं जिनकी बरकत से अल्लाह पाक अपने बन्दे पर खास करम फरमाता हैं। इन नमाज़ो को अदा करने वाला शख्स हर बलाओं से महफूज़ रहता हैं। चलिए बात करते हैं इन खास नफ़्ल नमाज़ो के बारे में, 

तहियतुल वज़ू 

तिर्मिज़ी शरीफ की हदीस हैं अल्लाह के प्यारे रसूल ने फ़रमाया ! जो शख्स अच्छी तरह वज़ू करके दो रकात नमाज़ तहियतुल वज़ू पढ़ेगा उसके लिए जन्नत वाजिब हो जाती हैं और उसे दुनियावी ज़िन्दगी में बेशुमार नेअमतें हासिल होती हैं। 

इशराक की नमाज़ 

जो शख्स फज्र की नमाज़ जमाअत से अदा करके वहीं बैठा रहे और अल्लाह का ज़िक्र करता रहे यानि तिलावत, दरूद शरीफ, तस्बीह वगैरह पढ़ता रहे और सूरज निकलने के कुछ देर बाद 2 रकात नमाज़ नमाज़े इशराक पढ़े तो ऐसे शख्स को एक हज या उमरा का सवाब हासिल होता हैं। 

चाश्त की नमाज़

यह नमाज़ भी मुस्तहब नफ़्ल हैं। अल्लाह के प्यारे रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया जो शख्स चाश्त की 2 रकात नमाज़ दिन निकलने के एक घंटे बाद बाद पढ़ेगा। उसके गुनाह बख़्श दिए जायेंगे। 

तहज्जुद की नमाज़

यह नमाज़ हमारे प्यारे रसूल पर फ़र्ज़ थी। हमारे लिए सुन्नत हैं। इस नमाज़ में कम से कम 2 रकअतें और ज़्यादा से ज़्यादा 8 रकअतें होती हैं। इसका वक़्त ईशा की नमाज़ के बाद थोड़ी देर सो जाने के बाद आंख खुलने पर होता हैं। मतलब यह की इस नमाज़ को अदा करने के लिए ईशा की नमाज़ के बाद थोड़ी देर सोना ज़रूरी है। जब सेहरी के बीच के वक़्त में आंख खुले तो उस दौरान यह नमाज़ अदा करें। कहने के मतलब इस नमाज़ का वक़्त ईशा की नमाज़ के बाद से सेहरी के वक़्त तक रहता हैं। इस नमाज़ को हमेशा पढ़ने वाला शख्स अल्लाह के बहुत करीब रहता हैं। उसे बेशुमार फायदे हासिल होते हैं और वह हर परेशानियों और मुसीबतों से महफूज़ रहता हैं।

सालतुल तस्बीह

यह नमाज़ बड़ी बरकत वाली नमाज़ हैं। एक हदीस में आया हैं की अल्लाह के प्यारे रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने चाचा हज़रत अब्बास से फ़रमाया की अगर हो सके तो यह नमाज़ रोज़ पढ़ो रोज़ न पढ़ सको तो हफ्ते में एक बार पढ़ो अगर ये भी नहीं हो सके तो महीने या साल में एक बार अगर वो भी नहीं तो ज़िन्दगी में एक बार ज़रूर पढ़ना चाहिए। प्यारे रसूल ने इस नमाज़ को पढ़ने के लिए कितना ज़ोर दिया हैं ये आप समझ सकते हो और ये भी समझ सकते हो की अगर प्यारे रसूल ने इस नमाज़ को पढ़ने के लिए इतना ज़ोर दिया हैं तो यह नमाज़ कितनी बरकत वाली नमाज़ होगी। इसका अंदाज़ा आपकी कही बातों से लगाया जा सकता हैं। 

सालतुल तस्बीह नमाज़ का तरीका 

4 रकात नफ़्ल नमाज़ की नियत करे और नियत करने के बाद 15 बार सुब्हानल्लाहे वल्हम्दुलिल्लाहे व लाइलाहा इल्लल्लाहो वल्लाहो अकबर पढ़े अल्हम्दो और सूरत पढ़ने के बाद रुकू में जाने पहले यही तस्बीह 10 बार पढ़े रुकू में सुब्हान रब्बियल अज़ीम पढ़ लेने के बाद 10 बार रुकू से उठने के बाद सजदे में जाने से पहले 10 बार सजदे में जाने पर सुब्हान रब्बियल आला पढ़ लेने के बाद 10 बार फिर दूसरे सजदे में 10 बार यही तस्बीह पढ़े इस तरह हर रकात में 75 बार यह तस्बीह पढ़ी जाएगी और 4 रकात में 300 बार हो जाएगी।

नमाज़े हाजत

अबू दाऊद की हदीस है, हज़रत हुज़ैफ़ा रदियल्लाहो अन्हो का बयान हैं जब अल्लाह के रसूल का कोई अहम मामला पेश आ जाता या कोई मुसीबत या मुश्किल आ जाती तो इसके लिए आप दो या चार रकात नमाज़ अदा फरमाते। पहली रकात में सूरह फातेहा के बाद 3 मर्तबा आयतल कुर्सी, दूसरी में अल्हम्दो शरीफ के बाद एक बार कुल हुवल्लाह शरीफ, तीसरी में सूरह फ़लक़ और चौथी में सूरह नास पढ़ते और फिर नमाज़ के बाद अपनी हाजत के लिए दुआ मांगते जिसकी बरकत से अल्लाह पाक आपकी हर मुश्किल आसान फरमा देता।

अल्लाह पाक हम सबको पाबन्दी से नमाज़ अदा करने और इस्लामी शरीयत पर चलने की तौफीक अता फरमाए ताकि हम हमारी आख़िरत को सुधार सके आमीन । 

नमाज़ से जुड़े कुछ ज़रूरी मसाइल (Namaz ke Masail)

नमाज़ से जुड़े कुछ मसाइल (Namaz ke Masail)

 

आज के इस आर्टिकल में हम आपको नमाज़ से जुड़े कुछ मसाइल के बारे में बताएँगे। आप इन बताई गयी बातों को गौर से पढ़े और उस पर अमल करने की कोशिश करे और दुसरो भाइयों और बहनो को भी बताएं।


  • नमाज़ पढ़ने के लिए बदन का पाक साफ़ होना बहुत ज़रूरी हैं। नापाकी में नमाज़ पढ़ना गुनाहे कबीरा हैं।
  • जिस भी जगह नमाज़ पढ़ी जा रही है उस जगह का पाक होना ज़रूरी हैं। गीली या गन्दी जगह पर नमाज़ अदा न करे।
  • अस्सलामो कहते ही नमाज़ ख़त्म हो जाती हैं इसलिए अगर कोई आदमी इमाम के अस्सलाम कहते वक़्त जमाअत में शरीक हुआ तो नमाज़ नहीं होगी। 
  • नमाज़ शुरू करने से पहले उस नमाज़ की नियत करना बहुत ज़रूरी हैं। जो भी नमाज़ पढ़ रहे हैं उसकी नियत ज़रूर करे जैसे फज्र, ज़ोहर, मगरिब वगैरह। 
  • नमाज़ पूरी करने के लिए अस्सलामो अलैकुम व रहमतुल्लाह कहना सुन्नत हैं। 
  • अस्सलाम कहना वाजिब हैं अलैकुम कहना वाजिब नहीं। 
  • सुन्नत यह हैं की इमाम दोनों सलाम बुलंद आवाज़ से कहे लेकिन दूसरा सलाम पहले सलाम से कुछ आहिस्ता आवाज़ में कहे।
  • दाहिनी तरफ सलाम फेरने पर चेहरा इतना घूमना चाहिए की पीछे वालों के दाहिने रुखसार (गाल) नज़र आये और बाईं तरफ फेरने पर बाएं गाल नज़र आये। 
  • नमाज़ के बाद हाथ उठा कर दुआ मांगना और दुआ के बाद मुँह पर हाथ फेरना भी सुन्नत हैं। 
  • दुआ मांगते वक़्त दोनों हाथ बिलकुल मिले हुए न हो दोनों हाथो के बीच थोड़ा फ़ासला होना चाहिए।
  • नमाज़ में अंगड़ाई लेना और बार बार उबासी लेना मकरूहे तंज़ीही हैं। 
  • नमाज़ पढ़ने से पहले अच्छी तरह वज़ू करले। खासकरके मुँह को अच्छे से साफ़ करले नमाज़ के वक़्त बीड़ी सिगरेट तम्बाकू की बदबू आना मकरूह हैं। 
  • नमाज़ के दौरान अगर टोपी सर से गिर जाये तो एक हाथ से उठा कर सर पर रख लेना अफ़ज़ल हैं। दोनों हाथो से उठाना मकरूहे तहरीमी हैं। लेकिन कोशिश करे की टोपी बार बार न गिरे इससे नमाज़ से ध्यान भटकता है। 
  • नमाज़ के दौरान इधर उधर न देखे आपका पूरा ध्यान नमाज़ में होना चाहिए।
  • नमाज़ में सजदे के दौरान घुटनो के ज़मीन पर टिकने से पहले अपने हाथ ज़मीन पर रखना भी मकरूहे तन्ज़ीही हैं। 
  • नमाज़ में सजदे के दौरान अपने पैरों की अँगुलियों को उल्टा पीछे करना भी मकरूहे तन्ज़ीही हैं। 
  • सजदे के दौरान कम से कम एक अंगुली का ज़मीन से टिका होना फ़र्ज़ हैं। तीन अँगुलियों का टिका होना वाजिब और सारी अँगुलियों का टिका होना सुन्नत हैं। 
  • सजदा या रुकू की हालत में तीन बार से कम तस्बीह पढ़ना मकरूह हैं इसलिए जल्दबाज़ी कभी नमाज़ न पढ़े। 
  • सजदा करने पर अगर पेशानी पर धुल या घास वगैरह लग जाये तो उसे हटाना मकरूह हैं लेकिन अगर उसकी वजह से कुछ खुजली या जलन जैसा हो रहा हैं तो हटाने में हर्ज़ नहीं। 
  • फ़र्ज़ की एक रकात में किसी एक आयत या सूरत को बार बार पढ़ना मकरूह हैं लेकिन अगर उसके अलावा कुछ याद न हो तो कोई हर्ज़ नहीं। 
  • आँख बंद करके नमाज़ पढ़ना भी मकरूह हैं। 
  • घर पर भी नमाज़ अदा करे इससे शैतान का साया घर पर कभी नहीं आता। 


अल्लाह हम सबको पांच वक़्त की नमाज़ पाबन्दी से पढ़ने की तौफीक अता फरमाए और अल्लाह की बताई बातों और हदीसों पर अमल करने की तौफीक अता फरमाए आमीन 


इस्लामी शरीयत के कुछ ज़रूरी नियम और तौर तरीके

इस्लामी शरीयत के कुछ जरूरी नियम और तौर तरीके

इस्लामी तौर तरीके में कुछ ऐसे अल्फ़ाज़ मुकर्रर हैं जो इस्लामी अहकाम बयान करने के दौरान काम में लिए जाते हैं। अच्छे काम करने पर सवाब और बुरे काम करने पर अज़ाब मिलता हैं। नेक कामो की भी कई किस्मे हैं जो इस तरह है, 

पहला फ़र्ज़ 

दूसरा वाजिब 

तीसरा सुन्नते मुवक्किदह

चौथा सुन्नते गैर मुवक्किदह 

पांचवा मुस्तहब 

और आख़री मुबाह 

चलिए नेक कामों की इन किस्मों को थोड़ा तफ्सील से समझते हैं। 

फ़र्ज़ 

इस्लाम में जो चीज़े फ़र्ज़ है। इसका मतलब यह हैं की वह काम करना बहुत ज़रूरी हैं जिसका फ़र्ज़ होना क़ुरान और हदीस से साबित होता हैं। जैसे नमाज़, रोज़ा, हज, ज़कात वगैरह इनके फ़र्ज़ होने का इंकार करने वाला काफिर हो जाता हैं और जो आदमी बिना किसी शरई मज़बूरी के यह काम नहीं करता उसे फासिक (गुनाहगार) कहा जाता हैं। फ़र्ज़ इबादतों कामो से लापरवाही बरतना गुनाहे कबीरा हैं। ऐसा आदमी जहन्नम का हक़दार होता हैं। 

वाजिब 

वह काम जिनका करना भी ज़रूरी है जैसे ईद, बकरा ईद की नमाज़ पढ़ना सदक़ा खैरात और फितरा वगैरह करना। इसका इंकार करने वाला गुमराह और बदमज़हब होता हैं। बिना किसी शरई मज़बूरी के इसे छोड़ने वाला या इसे न करने वाला फासिक और जहन्नम के अज़ाब का हक़दार हैं। 

सुन्नते मुवक्किदह 

शरीयत में जिन कामो को सुन्नते मुवक्किदह कहा गया है उसे करना भी ज़रूरी हैं और बड़े सवाब का काम हैं। सुन्नते मुवक्किदह मुस्तफा जाने रहमत सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के किये वह काम हैं जिसे आपने हमेशा किया हो या कभी कभार छोड़ भी दिया हो। इसलिए इसे करना भी ज़रूरी हैं। छोड़ने वाले से अल्लाह व रसूल नाराज़ होते हैं और जो बिलकुल छोड़ दे वह जहन्नम के अज़ाब का हक़दार होगा। सुन्नते मुवक्किदह का हुक्म वाजिब के करीब करीब हैं। 

सुन्नते गैर मुवक्किदह 

वह काम जिसे हमारे आका ने कभी कभी किया हो और कभी कभी बिना किसी शरई मज़बूरी में न भी किया हो। इस पर अमल करने वाला सवाब का हक़दार होता हैं और न करने पर कोई अज़ाब नहीं हैं जैसे असर और ईशा में फ़र्ज़ से पहले 4 सुन्नते न पढ़ना।  

मुस्तहब 

वह नेक काम जिसे करने को अच्छा माना गया हो और न करने को बुरा भी न समझा जाता हो। 

मुबाह 

इसका दूसरा नाम जायज़ हैं। वह काम जिसका करना या न करना दोनों बराबर हो करने पर कोई सवाब नहीं और न करने पर कोई गुनाह नहीं। 


दूसरी तरफ इस्लामी तौर तरीको में कुछ ऐसे काम भी हैं जिन्हें करने को मना किया गया हैं इन कामों को करने वाले शख्स को इनसे बचना चाहिए यह गलत या बुरे काम कुछ इस तरह हैं 

हराम काम 

इस्लामी शरीयत में जिन कामों को करने से मना किया गया हैं उसे हराम कहा गया हैं। उससे बचना और दूर रहना बहुत ज़रूरी हैं। वह काम जिनका हराम होना क़ुरानहदीस से साबित हो। उससे इंकार करने वाला काफिर हैं। और एक मर्तबा भी करने वाला फासिक (गुनहगार) हो जाता हैं। ये काम कुछ इस तरह हैं जैसे शराब पीना जुआ खेलना सूद खाना, नाच गाने में शौक रखना, खुदखुशी करना वगैरह काम हराम हैं। इससे बचने वालो को सवाब मिलता हैं और इन कामो को करने वाला बहुत बड़ा गुनहगार हैं। 

मकरूहे तहरीमी 

उन कामो से बचना बेहद ज़रूरी हैं जिन्हे मकरूहे तहरीमी करार दिया जा चूका है। इनका गुनाह हराम से कम हैं लेकिन लगातार करते रहने वाला गुनाहे कबीरा व सज़ावार हो जाता हैं। जिसकी सजा जहन्नम का अज़ाब हैं इसका एक उदाहरण जैसे नमाज़ के वक़्त इधर उधर देखना। 

मकरूहे तन्ज़ीही 

जिन कामो को इस्लामी शरीयत में अच्छा नहीं माना गया हैं इसे मकरूहे तन्ज़ीही कहा जाता हैं। इसे कर गुजरने पर कोई गुनाह नहीं लेकिन आदत बना लेना भी अच्छा नहीं। इसका एक उदाहरण जैसे सुस्ती से बोझ समझ कर नमाज़ पढ़ना। 

ख़िलाफ़े औला 

वह काम जिसे करना तो नहीं चाहिए था लेकिन अगर कर दिया तो गुनाह नहीं जैसे एक वुज़ू से कई नमाज़ पढ़ना। 


अल्लाह हम सभी को इस्लामी तौर तरीको पर चलने की तौफीक अता फरमाए आमीन। 

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